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सोमवार, 30 नवम्बर 2015 17:44

पश्चिमी देशों के युवाओं के लिए वरिष्ठ नेता का दूसरा महत्वपूर्ण पत्र

पश्चिमी देशों के युवाओं के लिए वरिष्ठ नेता का दूसरा महत्वपूर्ण पत्र

ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई ने पश्चिमी देशों के युवाओं के नाम एक महत्वपूर्ण संदेश में कई बुनियादी बिंदुओं की ओर उनका ध्यान आकर्षित कराया।

 

पेरिस आतंकी हमलों के हृदय विदारक दृष्यों का उल्लेख करने के बाद इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि दुनिया में किसी भी स्थान पर किसी भी इंसान की पीड़ा अपने आप में पूरी मानवता के लिए दुखदायी होती है। उन्होंने कहा कि जिसके अंदर तनिक भी प्रेम और मानवता है, यह दृष्य देखकर प्रभावित और दुखी होगा। चाहे वह फ़्रांस में दिखाई दें या फ़िलिस्तीन, इराक़, लेबनान और सीरिया में। निश्चित रूप से डेढ़ अरब मुसलमानों की यही भावनाएं हैं और वह इन त्रासदियों को अंजाम देने वालों और ज़िम्मेदारों से घृणा करते हैं।

 

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने अलक़ायदा और तालेबान जैसे आतंकी संगठनों के गठन में अमरीका की सर्वविदित भूमिका और पश्चिमी देशों की ओर से रूढ़िवादी सरकारों के समर्थन को खुले विरोधाभास की संज्ञा दी। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि विरोधाभास का एक और रूप इस्राईल का सरकारी आतंकवाद है। फ़िलिस्तीन की मज़लूम जनता साठ साल से अधिक समय से अत्यंत भयानक आतंकवाद का सामना कर रही है। यदि आज यूरोप के लोग कुछ दिन अपने घरों में शरण लेने पर मजबूर हैं और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर जाने से परहेज़ कर रहे हैं तो फ़िलिस्तीनी परिवार दसियों साल से यहां तक कि अपने घर में भी ज़ायोनी शासन की विध्वंसकारी और जनसंहारी तंत्र से सुरक्षित नहीं हैं।

 

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि दुनिया के बहुत से देश अपनी राष्ट्रीय एवं स्थानीय संस्कृति पर गर्व करते हैं। उन संस्कृतियों पर जो उत्थान और प्रगति की स्थिति में सैकड़ों साल से मानव समाजों को विधिवत रूप से तृप्त करती आई हैं। इस्लामी जगत भी इससे अपवाद नहीं है। लेकिन वर्तमान काल में पश्चिमी जगत आधुनिक साधनों की मदद से दुनिया की संस्कृतियों को एकरूपी बना देने पर अड़ा हुआ है। मैं अन्य राष्ट्रों पर पश्चिमी संस्कृति थोपे जाने और स्वाधीन संस्कृतियों को महत्वहीन ठहराए जाने को एक ख़ामोश और अत्यंत विनाशकारी हिंसा मानता हूं।

 

पूरा पत्र पढ़ने और सुनने के लिए क्लिक करेंः पश्चिमी देशों के युवाओं के लिए वरिष्ठ नेता का दूसरा महत्वपूर्ण पूरा पत्र

 

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि मैं सांस्कृति रिश्तों के महत्व और मूल्य का इंकार नहीं करता। यह रिश्ते जब भी स्वाभाविक वातावरण में और मेज़बान समाज का सम्मान करते हुए स्थापित किए गए हैं उनसे उत्थान, ऊंचाई और समृद्धि मिली है। इसके विपरीत विषम और थोपे गए रिश्ते नाकाम और नुक़सानदेह साबित हुए हैं। बड़े ही खेद के साथ मुझे कहना पड़ता है कि दाइश जैसे पस्त गुट आयातित संस्कृतियों से इन्हीं विफल रिश्तों की पैदावार हैं।

 

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह सवाल पूछना चाहिए कि वह लोग जो यूरोप में जन्में और उसी वातावरण में वैचारिक एवं मनोवैज्ञानिक परवरिश पायी, इस प्रकार के गुटों की ओर क्यों उन्मुख हो रहे हैं? क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि कुछ लोग युद्धग्रस्त क्षेत्रों की एक दो यात्रा करके अचानक इतने चरमपंथी बन जाएं कि अपने ही देश के लोगों पर गोलियों की बौछार कर दें?

 

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने पश्चिमी युवाओं से कहा कि आप ही को अपने समाज की ऊपरी तहों को हटाकर इन ग्रंथियों और द्वेषों को खोजना और समाप्त करना है। खाईं को और गहरा करने के बजाए उसे पाटना चाहिए।

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