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| सूरए बक़रह ३४-१८३से १८६ तक की आयतें |
सूरए बक़रह की 183वीं आयत इस प्रकार हैःيَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
इस आयत का अनुवाद है। हे, ईमान लाने वालो, तुम्हारे लिए रोज़ा अनिवार्य किया गया जिस प्रकार तुमसे पहले वाले लोगों पर अनिवार्य किया गया था ताकि शायद तुम पवित्र और भले बन सको। ईश्वर का एक आदेश रोज़ा रखना है जो केवल इस्लाम से विशेष नहीं है बल्कि इस्लाम से पूर्व के धर्मों में भी ये आदेश था। रोज़ा एक ऐसी उपासना है जिसे देखा नहीं जा सकता। नमाज़ या हज जैसी उपासनाओं को तो लोग देख सकते हैं परन्तु रोज़े को नहीं इसीलिए इसमें दिखावे की संभावना कम होती है। रोज़ा मनुष्य के संकल्प को दृढ़ करता है। जो व्यक्ति दिनभर और एक महीने तक खाने पीने और अवैध आनंदों से स्वयं को दूर रख सकता है वो अन्य लोगों की संपत्ति और इज़्ज़त के प्रति भी स्वंय को नियंत्रित रख सकता है। रोज़ा मानवीय और धार्मिक भावनाओं को जगाता और उन्हें दृढ़ बनाता है। जिस व्यक्ति ने एक महीने तक भूख का मज़ा चखा हो, वो भूखे के दुख का आभास करता है और उनके बारे मे विचार करता है। रोज़ा पाप न करने की भूमि समतल करता है, अधिकांश पापों तथा अपराधों का स्रोत वासना या पेट होता है, रोज़ा इन दोनों स्रोतों को नियंत्रित करके पाप में कमी और पवित्रता में वृद्धि का कारण बनता है। अलबत्ता खाना पीना छोड़ना रोज़े का विदित रूप है, पवित्र और महान लोग खाना पीना छोड़ने के अतिरिक्त रोज़े के मूल उद्देश्य पर भी ध्यान देते हैं और पाप नहीं करते। सूरए बक़रह की आयत नंबर १८४ इस प्रकार हैः أَيَّامًا مَعْدُودَاتٍ فَمَنْ كَانَ مِنْكُمْ مَرِيضًا أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ فَمَنْ تَطَوَّعَ خَيْرًا فَهُوَ خَيْرٌ لَهُ وَأَنْ تَصُومُوا خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ
इस आयत का अनुवाद है। रोज़ा कुछ सीमित दिनों में तुम पर अनिवार्य किया गया है परन्तु तुम में से जो कोई ही उन दिनों में बीमार या यात्रा में हो तो वो, उतने ही दिन, अन्य दिनों में रोज़ा रखे। और जिन लोगों के लिए रोज़ा रखना बहुत कठिन है जैसे वृद्ध लोग तो उन्हें एक दरिद्र को खाना खिलाकर उस रोज़े का बदला देना चाहिए और जो कोई अपनी मर्ज़ी से अधिक भलाई करे तो वो उसके लिए बेहतर है और बहरहाल यदि तुम समझो तो रोज़ा रखना तुम्हारे लिए बेहतर है। ईश्वरीय आदेश कठिन और जटिल नहीं हैं बल्कि हर मनुष्य अपनी शक्ति और क्षमता के अनुसार उनके पालन के लिए बाध्य है। रोज़ा रखना भी वर्ष के एक भाग अर्थात रमज़ान के महीने में अनिवार्य है। यदि कोई इस महीने में बीमार हो या यात्रा पर हो तो इसके स्थान पर किसी अन्य महीने में रोज़ा रखेगा, और यदि वो रोज़ा रख ही नहीं सकता हो चाहे रमज़ान हो या कोई अन्य महीना, तो उसे रोज़े की भूख सहन करने के स्थान पर भूखों को याद रखना चाहिए और हर रोज़े के बदले एक भूखे को खाना खिलाना चाहिए। अलबत्ता स्पष्ट सी बात है कि रोज़ा न रखने के बदले में यदि कोई एक से अधिक लोगों को खाना खिलाए तो बेहतर है। इसी प्रकार यदि कोई रमज़ान में रोज़ा रखने के महत्व को समझ जाए तो वो कभी भी ये नहीं चाहेगा कि उसे रमज़ान मे रोज़े न रखने पड़े। सूरए बक़रह की आयत नंबर १८५ इस प्रकार हैः شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآَنُ هُدًى لِلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ وَمَنْ كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَى مَا هَدَاكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
इस आयत का अनुवाद है। रमज़ान का महीना वो महीना है जिसमें क़ुरआन ईश्वर की ओर से उतरा है, जो लोगों का मार्गदर्शक है तथा, असत्य से सत्य को अलग करने हेतु स्पष्ट तर्कों व मार्गदर्शन को लिए हुए है, तो तुम में से जो कोई भी ये महीना पाए तो उसे रोज़ा रखना चाहिए और जो कोई बीमार या यात्रा में हो तो वो उतने ही दिन किसी अन्य महीने में रोज़ा रखे, ईश्वर तुम्हारे लिए सरलता चाहता है, कठिनाई नहीं, तो तुम रोज़ा रखो यहां तक कि दिनों की संख्या पूरी हो जाए और तुम्हें मार्ग दर्शन देने के लिए ईश्वर का महिमागान करो और शायद तुम (ईश्वर के प्रति) कृतज्ञ हो। पिछली आयत ने रोज़े के अनिवार्य होने तथा उसके कुछ आदेशों का वर्णन किया था, ये आयत रोज़े के समय को/कि जो रमज़ान का महीना है/निर्धारित करती है। अलबत्ता रमज़ान का महीना, रोज़ो का महीना होने से पूर्व क़ुरआन उतरने का भी महीना है। मूल रूप से रमज़ान का महत्व क़ुरआन के कारण है जो इस महीने की एक महत्वपूर्ण रात्रि शबेक़द्र में उतरा है। साल भर के महीनों में केवल रमज़ान का नाम ही क़ुरआन में आया है जिसका अर्थ है जलाना, अर्थात इस महीने में रोज़ा रखने वालों के पापों को जला दिया जाता है। इस्लाम एक सरल धर्म है तथा उसका आधार सरलता पर रखा गया है अतः जिन लोगों के लिए रमज़ान में रोज़ा रखना कठिन और असंभव हो उन्हें अनुमति है कि वे उसी वर्ष के अन्य दिनों में ३० रोज़े रखे और यदि उनके लिए रोज़ा रखना ही संभव न हो तो उसके बदले दान दे, जैसा कि यदि किसी के लिए (वुज़ू करना कठिन हो तो वो उसके स्थान पर तयम्मुम करे और यदि कियी के लिए) खड़े होकर नमाज़ पढ़ना संभव न हो तो वो बैठकर या लेटकर नमाज़ पढ़ सकता है। अतः मनुष्य को ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि वो अपने आदेशों के पालन में मनुष्य की क्षमता से अधिक नहीं चाहता और उसपर कठिनाई नहीं थोपता। सूरए बक़रह की १८६वीं आयत इस प्रकार हैः وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ
इस आयत का अनुवाद है। और जब भी मेरे बंदे मेरे बारे में तुमसे पूछें तो (हे पैग़म्बर) कह दो कि मैं समीप (ही) हूं। जब भी कोई पुकारने वाला मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार सुनता हूं। अतः उन्हें भी मेरा निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए और मुझपर ईमान लाना चाहिए ताकि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो जाए। एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से पूछा कि ईश्वर हमसे सीमप है कि हम धीमे स्वर में उससे प्रार्थना करें या हमसे दूर है कि हम उसे तेज़ आवाज़ में पुकारें। ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी कि ईश्वर, बंदों के समीप है। वह अपने बंदों से इतना समीप है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जैसाकि सूरए क़ाफ़ की १६वीं आयत में कहा गया है कि हम मनुष्य से उसकी गर्दन की रग से भी अधिक समीप हैं। प्रार्थना के लिए कोई विशेष समय नहीं है। मनुष्य जब भी और जिस अवस्था में चाहे ईश्वर को पुकार सकता है परन्तु रमज़ान का महीना चूंकि प्रार्थना और प्रायश्चित का महीना है अतः प्रार्थना की यह आयत रमज़ान और रोज़े की आयतों के बीच में आई है। इस छोटी सी आयत में ईश्वर ने सात बार अपने पवित्र अस्तित्व और सात बार अपने बंदों की ओर संकेत किया है ताकि अपने और अपने बंदों के बीच के अति निकट रिश्ते और संबन्ध को दर्शा सके। आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा। ईमान की एक निशानी रोज़ा रखना है। रोज़ा मनुष्य में पापों से बचने की भावना उत्पन्न और उसे सुदृढ़ करता है। ईश्वरीय आदेशों का पालन स्वयं हमारे लिए आवश्यक है न ये कि ईश्वर को हमारी नमाज़ या रोज़ों की आवश्यकता है। इस्लाम एक व्यापक धर्म है। उसने प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और स्थिति के अनुसार उचित क़ानून प्रस्तुत किये हैं। जैसाकि रमज़ान में यात्री, रोगी और वृद्ध का आदेश अन्य लोगों से भिन्न है। रमज़ान के महीने में रोज़ा रखकर हमें अपनी आत्मा को पाप से पवित्र कर लेना चाहिए तथा अपने हृदय में क़ुरआन के प्रभाव की भूमि प्रशस्त करनी चाहिए। ईश्वर हमारी प्रार्थना और पुकार को सुनता है तथा हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है अतः हमें भी उससे प्रार्थना करनी चाहिए और केवल उसी के आदेशों का पालन करना चाहिए क्योंकि हमारा मोक्ष व कल्याण उसपर ईमान रखने में ही निहित है। |
| अंतिम अद्यतन ( शनिवार, 30 अप्रैल 2011 17:14 ) |



सूरए बक़रह की 183वीं आयत इस प्रकार हैः





