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सोमवार, 11 अप्रैल 2016 12:43

ईश्वरीय वाणी-७४

ईश्वरीय वाणी-७४

सूरे अर्रहमान की 14वीं और 15वीं आयतों में महान ईश्वर इंसान और जिन्नात को पैदा करने में अपनी शक्ति को बयान करता और कहता है” उसी ने इंसान को ठीकरे की तरह खनखनाती मिट्टी से पैदा किया है और उसी ने जिन्नात को आग की ज्वाला से पैदा किया है।“

 

 

पवित्र क़ुरआन में इंसान को पैदा करने के बारे में विभिन्न शब्दों का प्रयोग किया गया है जो इस बात का सूचक है कि इंसान आरंभ में मिट्टी था। उसके बाद मिट्टी में पानी मिलाया गया फिर वह कीचड़ में परिवर्तित हो गया और उसके बाद उसमें लस और चिपक पैदा हो गयी और उसके पश्चात वह सूखी मिट्टी बन गया।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये विशेषताएं इस बात की सूचक हैं कि इंसान का आरंभ और उसके अस्तित्व में आने का मूल स्रोत मूल्यहीन चीज़ मिट्टी थी परंतु महान ईश्वर ने उस मूल्यहीन चीज़ से ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ प्राणी की रचना की। साथ ही वह इस बात की भी सूचक है कि इंसान का वास्तविक मूल्य उसी आत्मा के कारण है जिसे महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने उसके शरीर में डाल दिया है।

15वीं आयत में महान ईश्वर जिन्नात के पैदा करने के बारे में फरमाता है। उसी ने जिन्नात को आग की ज्वाला व लपटों से पैदा किया है”

महान ईश्वर ने इंसान को मिट्टी और पानी से पैदा किया है जबकि जिन्नात को हवा और आग से पैदा किया है।  दोनों की रचना की जो अलग -अलग चीज़ें हैं वे इंसान और जिन्नात के अंदर बहुत से अंतरों का स्रोत हैं। सूरे रहमान की 17वीं आयत में सूर्योदय और सूर्यास्त की ओर संकेत किया गया है। महान ईश्वर इस आयत में कहता है” वही जाड़े- गर्मी के दोनों पूरबों और दोनों पश्चिमों का मालिक है।“

 

 

सही यह है कि वर्ष के हर दिन सूरज के निकलने का एक स्थान होता है और उसके डूबने का भी एक स्थान होता है किंतु यहां पर उसके सूर्यास्त के पहले और अंतिम और इसी प्रकार सूर्यादय के पहले व अंतिम स्थान को दृष्टिगत रखा गया है तथा सूर्यादय व सूर्यास्त के शेष स्थान इन दोनों के बीच में है और सूरज,चांद,तारों और ज़मीन का चक्कर लगाना उनकी बहुत ही सूक्ष्म रचना का परिचायक है और इसी चक्कर लगाने के परिणाम में ही चार ऋतुओं होती हैं। इसी संबंध में सूरे मआरिज की 40वीं आयत में आया है” पूरब और पश्चिम के ईश्वर की सौगन्ध।” इस आयत में पूरे साल सूरज के निकलने और उसके डूबने के स्थान को दृष्टि में रखा गया है।  

सूरे रहमान की 26वीं आयत इंसान के मरने की ओर संकेत करती और कहती है” जो भी ज़मीन पर है उसे मौत आयेगी और केवल तुम्हारे ईश्वर की अस्तित्व, बाक़ी रहेगी जो महानता और श्रेष्ठता वाली है।“

पवित्र कुरआन के व्याख्याकर्ताओं के अनुसार इस आयत में जो यह कहा गया है कि जो भी प्राणी इस ज़मीन पर है उसे मौत आयेगी और वह मिट जायेगा इसका यह मतलब नहीं है कि वह बिल्कुल मिट जायेगा बल्कि मौत, सदैव बाक़ी रहने वाले जीवन का प्रवेशद्वार है और सदैव बाक़ी रहने वाले में जीवन में पहुंचने के लिए मौत का आना आवश्यक है। यह आयत वास्तव में याद दिलाती है कि दुनिया सदैव रहने की जगह नहीं है उससे दिल नहीं लगाना चाहिये क्योंकि दुनिया से दिल लगा बैठना ईश्वरीय मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। सूरे रहमान की 27वीं आयत महान ईश्वर की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत करती है। जैसे महान ईश्वर ज्ञानी, शक्तिशाली और जीवित है। इसी प्रकार महान ईश्वर हर प्रकार के दोष व त्रुटि से पवित्र है और केवल वह है जो इस ब्रह्मांड में बाक़ी रहेगा और उसके अतिरिक्त जो चीज़ें भी हैं सब नष्ट हो जायेंगी। सूरे रहमान की 29वीं आयत में महान ईश्वर कहता है जो भी आसमान और ज़मीन में है वह उससे अपनी आवश्यकता की मांग करता है और हर दिन उस की एक काम है।“

 

 

ब्रह्मांड की समाप्ति पर महान ईश्वर के अलावा न केवल समस्त चीज़ों का अंत हो जायेगा बल्कि अब भी महान ईश्वर के मुक़ाबले में समस्त चीज़ें कुछ भी नहीं हैं और उनका बाक़ी रहना महान ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है अतः अगर एक क्षण के लिए भी वह इस ब्रह्मांड से अपनी कृपा दृष्टि हटा ले तो समस्त चीज़ों का अंत हो जायेगा। साथ ही उसके अलावा क्या कोई है जिससे ज़मीन और आसमान में रहने वाले अपनी आवश्यकता की मांग करेंगे? सृष्टि व रचना सदैव महान ईश्वर की हर हालत व दशा में मोहताज है। अलबत्ता रचना की यह मोहताजी महान ईश्वर की असीम कृपा दृष्टि चाहती है। उसके बाद सूरे रहमान की 29वीं आयत कहती है प्रतिदिन उसके एक कार्य है यानी वह लगातार चीज़ों की रचना कर रहा है और मांगने वालों के सवालों का जवाब दे रहा है। ऐसा नहीं है कि महान ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना करने के बाद उसे उसकी हालत पर छोड़ दिया है बल्कि सदैव उसके मामलों का संचालन कर रहा है। सूरे रहमान की 31वीं और उसके बाद की आयतें प्रलय के दिन हिसाब- किताब और इस दिन की कुछ दूसरी विशेषताओं के बारे में बात करती हैं। यह आयतें जहां अपराधियों को चेतावनी देती हैं वहीं मोमिनों के लिए प्रशिक्षा, जागरुकता और आशा का कारण हैं। प्रलय के दिन महान ईश्वर समस्त इंसानों और जिन्नातों के समस्त कर्मों का सूक्ष्म हिसाब­- किताब लेगा और उन्हें उनके कर्मों का पूरा- पूरा बदला देगा। अलबत्ता इस विषय के विश्वास का हमारे जीवन में बहुत लाभ है। इंसान का इस विषय पर विश्वास दुनिया की नेअमतों से लाभ उठाने में प्रभावी है।

 

इस सूरे में प्रलय के दिन से संबंधित आयतों से भलिभांति स्पष्ट हो जाता है कि उस दिन ब्रह्मांड की समस्त व्यवस्था बिखर जायेगी और समूचे ब्रह्मांड में बड़ी ही भयावह घटनाएं पेश आयेंगी। ज़मीन, आसमान और तारों में परिवर्तन उत्पन्न हो जायेगा और अप्रत्याशित मामले व घटनाएं पेश आयेंगी। जैसाकि महान ईश्वर सूरे रहमान की 37वीं आयत में कहता है” फिर जब आसमान फटकर तेल की तरह लाल हो जायेगा।“

 

 

महान ईश्वर की ओर से इन ख़तरनाक घटनाओं की घोषणा समस्त अपराधियों और मोमिनों के लिए जहां चेतावनी है वहीं यह ईश्वरीय कृपा भी है। अतः इसके बाद फिर महान ईश्वर दोहराता और कहता है कि ईश्वर की किन -किन नेमतों को झुठलाओगे? प्रलय के दिन अपराधियों को उनके चेहरों से पहचाना जायेगा। इसका मतलब यह है कि प्रलय के दिन इंसान की सोच और उनके कार्य उनके चेहरों से दिखाई देंगे। उसके बाद अपराधियों को बहुत ही अपमान के साथ, सिर को आगे के बाल और पैर पकड़ कर नरक में फेंक दिया जायेगा। यह वही नरक होगा जिसका सदैव अपराधी व पापी इंकार करते थे। वास्तव में स्वर्ग, नरक और प्रलय का विश्वास न रखना इंसान के नरक में जाने का कारण बनेगा और वे आग और खोलते हुए पानी के मध्य होंगे। सूरे रहमान की 46वीं आयत इसके बाद स्वर्ग में जाने वालों की चर्चा करती है और स्वर्ग की कुछ नेमतों का वर्णन करती है ताकि नरकवासियों को मिलने वाले कड़े दंड के मुक़ाबले में उनमें से हर एक का महत्व स्पष्ट हो सके। महान ईश्वर कहता है जो अपने पालनहार के स्थान से डरता है उसके लिए दो स्वर्ग है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि महान ईश्वर अपने भले बंदों को स्वर्ग में विभिन्न बाग़ देगा जिसमें वे हमेंशा-2 रहेंगे और उसमें कभी भी उन्हें मौत नहीं आयेगी।

 

 

इसके बाद महान ईश्वर दो बागों की विशेषता बयान करते हुए कहता है इन दो बागों में भिन्ना –भिन्न फिल होंगे और इन दोनों बागों में दो हमेशा सोते उलबले होंगे और उस बाग़ में हर फल दो प्रकार के होंगे। स्वर्ग के फल विभिन्न प्रकार के होंगे और उनमें से हर एक दूसरे से बेहतर व उत्तम होगा। साथ ही में स्वर्ग में रहने वाले रेशम के बने हुए बहुत ही उच्चकोटि के फर्श पर तकिया लगाये बैठे होंगे। प्रायः इंसान उस समय तकिया लगाता है जब वह आराम में होता है और यह परिभाषा स्वर्ग में रहने वालों की पूर्ण शांति की परिचायक है। निश्चित रूप से परलोक में महान ईश्वर की ओर से जो नेअमतें मिलने वाली हैं उनका और उनकी विशेषताओं को शब्दों में नहीं बयान किया जा सकता है और इन नेअमतों के बारे में जो कुछ बयान किया गया है वह केवल इसलिए है कि हम केवल अपनी क्षमता के अनुसार उसे समझ सकें। स्वर्ग में रहने वाले इंसान जब चाहेंगे स्वर्ग के फल खुद उनके पास आ जायेंगे और उन्हें तोड़ने का भी कष्ट नहीं करना पड़ेगा। स्वर्ग में हर इंसान को बहुत ही सुन्दर व पवित्र महिलाएं मिलेंगी। सूरे रहमान की 56 वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” उसमें पाक दामन और दूसरों की तरफ नज़र न उठाकर देखने वाली महिलाएं होंगी जिनको उनसे पहले न किसी इंसान ने हाथ लगाया होगा और न किसी जिन्नात ने।“

 

 

इस आधार पर वे कुवाड़ी और हर दृष्टि से पवित्र हैं। स्वर्ग की महिलाएं केवल अपने पतियों से प्रेम करेंगी। यह पत्नी की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य के बारे में न सोचे और किसी दूसरे से प्रेम न करे। स्वर्ग की महिलाएं लालमणि और मूंगे की भांति हैं। पवित्र कुरआन ने लालमणि और मूंगे की उपमा देकर उनकी सुन्दरता की ओर संकेत किया है। सूरे रहमान की 60वीं आयत आशा से भरे बिन्दु को पेश करती और कहती है क्या एहसान और भलाई का बदला भलाई के अलावा कुछ और है? यानी जिन लोगों ने इस दुनिया में अच्छे काम किये हुए हैं उन्हें परलोक में उसका अच्छा ही बदला मिलेगा। इस प्रकार सूरे रहमान की अंतिम आयतों में स्वर्ग और स्वर्ग में मिलने वाली नेअमतों के बारे में आया है कि सुन्दर और हरे-भरे बाग़, उबलते सोते,खजूर और अनार सहित विभिन्न प्रकार के फल, बहुत ही सुन्दर व पवित्र महिलाएं जो स्वर्ग के महलों में हैं और वे कुवांरी हैं और किसी भी इंसान या जिन्नात ने उन्हें इससे पहले हाथ नहीं लगाया है। यह ऐसी में है कि जब स्वर्गवासी स्वर्ग के मूल्यवान सुन्दर तख्तों पर बैठे होंगे और वह बहुत ही सुन्दर हरे रंग के वस्त्रों से ढ़के होंगे। सूरे रहमान महान ईश्वर की दया और नेअमतों के बयान के साथ आरंभ होता है और महान ईश्वर की विशेषताओं के बयान के साथ समाप्त होता है। 

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