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शनिवार, 12 मार्च 2016 17:03

हज़रत फ़ातेमा(स) की शहादत

हज़रत फ़ातेमा(स) की शहादत

अभी मदीना नगर पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के शोक से उबर नहीं पाया था। इस नगर में उनका ख़ाली स्थान देख कर अभी भी लोगों की आंखों में आंसू आ जाते थे। उनके सभी साथी अपने ईमान व निष्ठा के अनुपात से उनके रिक्त स्थान का आभास कर रहे थे और शोक में ग्रस्त थे लेकिन सबसे अधिक शोक पैग़म्बरे इस्लाम की इकलौती बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के घर में दिखाई देता था। पैग़म्बर की वही बेटी, जिन्हें वे अपनी माता और अपने शरीर का टुकड़ा कहा करते थे, जो बचपन से ही अपने पिता का एक माता की तरह ध्यान रखती थीं, वही बेटी जिन्हें पैग़म्बर पूरे संसार के लिए गौरव बताया करते थे, वही बेटी कि जब भी पैग़म्बर को स्वर्ग की याद आती थी तो वे उनके हाथों को चूमा करते थे। पैग़म्बर की वही इकलौती बेटी उनके स्वर्गवास से शोकाकुल थीं और उनका शोक दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। उन्हें किसी कल चैन नहीं था क्योंकि न सिर्फ़ यह कि पैग़म्बर को बल्कि उनके संदेश को भी भुलाया जा रहा था। इसी लिए वे अपनी जान न्योछावर करके इस्लाम के शरीर में एक नई आत्मा फूंकना चाहती थीं।

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम के निधन के बाद हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के कांधों पर भारी ज़िम्मेदारी थी। वे उस फूल की तरह, जो प्रकाश के अभाव के कारण मुरझा जाता है, पैग़म्बर के ख़ाली मदीने में मुरझा गई थीं। तो क्या मदीने में पैग़म्बर का प्रकाश नहीं था? हज़रत फ़ातेमा बेजोड़ गुणों की स्वामी एकमात्र ऐसी महिला थीं जो संसार की सभी महिलाओं व पुरुषों से उत्तम थीं। पैगम़्बर कहा करते थे। फ़ातेमा, मानवीय रूप में हूर हैं, जब भी वे नमाज़ के लिए खड़ी होती हैं तो उनका प्रकाश फ़रिश्तों के लिए उसी प्रकार होता है जिस प्रकार धरती वालों के लिए सितारों का प्रकाश और ईश्वर कहता है। हे मेरे फ़रिश्तो! मेरी दासी और मेरे दासों की सरदार फ़ातेमा को देखो जो मेरे उपासना के लिए खड़ी है। उसके शरीर का हर भाग मेरे भय से कांप रहा है, वह पूरे हृदय से मेरी उपासना कर रही है। मैं तुम्हें गवाह बनाता हूं कि उसके अनुसरणकर्ताओं को मैंने नरक की आग से मुक्त कर दिया है।

पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद हज़रत फ़ातेमा दिन प्रतिदिन टूटती जा रही थीं। पैग़म्बर इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं। पिता के निधन ने हज़रत फ़ातेमा के हृदय को दुख से भर दिया था। इसी कारण ईश्वर के निकटतम फ़रिश्ते जिब्रईल लगातार उनके पास आते थे, उन्हें सांत्वना प्रदान करते थे और उन्हें उनके पिता व स्वर्ग में उनके स्थान से सूचित करते थे और इसी प्रकार उनके निधन के बाद उनकी संतान पर पड़ने वाली मुसीबतों से अवगत कराते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम, जिब्रईल की बताई हुई बातों को लिखते जाते थे। हज़रत फ़ातेमा, इससे पहले भी फ़रिश्तों से बात किया करती थीं और इसी लिए उनका एक उपनाम ‘मुहद्देसा’ अर्थात फ़रिश्तों से बात करने वाली था। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम इस संबंध में कहते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा, पैग़म्बर नहीं थीं बल्कि मुहद्देसा थीं। उन्हें इस लिए मुहद्देसा का नाम दिया गया क्योंकि फ़रिश्ते आसमान से उनके पास आते थे और हज़रत मरयम की तरह उनसे भी बातें किया करते थे।

 

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम की इकलौती सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा की शहादत केवल 18 वर्ष की आयु में हो गई थी और उस समय वे चार बच्चों की माता थीं। उनके व्यक्तित्व की वास्तविकता को समझ पाना केवल इमामों के लिए ही संभव है। हज़रत फ़ातेमा इस्लामी इतिहास की ऐसी एकमात्र आदर्श महिला हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रकाशमान उपस्थिति दर्ज कराई है। उनकी महानता और वैभव के बारे में पैग़म्बर व उनकी परिजनों की अनेक हदीसें हैं। पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम कहते हैं। निःसंदेह, ईश्वर ने मेरी बेटी फ़ातेमा के हृदय और पूरे शरीर को उसकी हड्डियों तक ईमान से परिपूर्ण कर दिया है। इस प्रकार से कि वे ईश्वर के आज्ञापालन में अत्यंत गंभीर हैं। पैग़म्बरे इस्लाम की पत्नी हज़रत आयशा कहती हैं कि मैंने पैग़म्बर को कहते सुना स्वर्ग की महिलाओं की चार महिलाएं हैं, इमरान की बेटी मरयम, मुहम्मद की बेटी फ़ातेमा, ख़ुवैलिद की बेटी ख़दीजा और फ़िरऔन की पत्नी आसिया।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा उपासना व पवित्रता में इस स्तर पर पहुंची हुई थीं कि ईश्वर ने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहा कि हे पैग़म्बर! अगर आप न होते तो में इस संसार की रचना न करता और अगर अली न होते तो मैं आपको पैदा न करता और अगर फ़ातेमा न होतीं तो मैं आप दोनों को अस्तित्व प्रदान न करता। हज़रत फ़ातेमा का व्यक्तित्व, उनकी पवित्रता, ज्ञान, ईमान, निष्ठा और पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा उनका प्रशिक्षण ऐसी बातें हैं जो उन्हें सही ढंग से समझने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति के सामने नए क्षितिज खोलती हैं लेकिन अंततः उसे हार कर यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि मनुष्य की बुद्धि हज़रत फ़ातेमा के संपूर्ण गुणों को समझने में अक्षम है। इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का कथन है कि क़ुरआने मजीद की आयत “इन्ना अंज़लनाहो फ़ी लैलतिल क़द्र” अर्थात निश्चित रूप से हमने क़ुरआने मजीद को क़द्र की रात में नाज़िल किया है, में रात से तात्पर्य हज़रत फ़ातेमा और क़द्र से तात्पर्य ईश्वर है तो जो कोई हज़रत फ़ातेमा को उस प्रकार जान जाएगा जिस प्रकार जानने का अधिकार है तो वह शबे क़द्र को भी समझ जाएगा।

 

फ़ातेमा कौन थीं? उनकी महानता का कारण केवल यह नहीं है कि वे पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री थीं बल्कि ईश्वर की दृष्टि में उनका जो महत्व, प्रतिष्ठा व स्थान था, वह उन्हें दूसरों से भिन्न करता था। अपने महान व उच्च स्थान व बेजोड़ ईमान के साथ हज़रत फ़ातेमा ज़हरा केवल अपने पिता के निधन से टूट नहीं सकती थीं। उनके पिता के निधन के कुछ ही दिन बाद इस्लाम के तथाकथित दावेदारों ने उन पर इतने अत्याचार किए कि वे बिस्तर पर पड़ गईं। उनके शरीर पर जलता हुआ दरवाज़ा गिरा दिया गया, दरवाज़े और दीवार के बीच दबने के कारण उनके पेट में पल रहे शिशु की मौत हो गई और इसी प्रकार इस्लामी क़ानूनों व शिक्षाओं द्वारा प्राप्त उनके अधिकारों से उन्हें वंचित कर दिया गया। उन्होंने अपने हक़ के लिए मस्जिदे नबी में बड़ा भावुक भाषण दिया और तथ्यों को उजागर किया लेकिन जो लोग अपने आपको इस्लाम का ठेकेदार समझ बैठे थे उन्होंने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा को तनिक भी महत्व नहीं दिया जिससे आहत हो कर वे घर आ गईं और मरते दम तक उनसे बात नहीं की।

 

 

शिया व सुन्नी इतिहास की किताबों में लिखा है कि जब हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम बीमार पड़ गईं तो मदीने की महिलाएं उन्हें देखने के लिए आईं। इस अवसर पर हज़रत फ़ातेमा ने कहा कि ईश्वर की सौगंध! मुझे तुम्हारे इस संसार से घिन आती है, मैं तुम्हारे पुरुषों से क्रोधित हूं। मैंने इम्तेहान लेने के बाद उन्हें दूर फेंक दिया है। तो देखो कि गति के बाद ढिलाई कितनी कुरूप है और गंभीरता के बाद खिलवाड़ कितना बुरा है। यह उसकी बात है जिसके बारे में पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा था कि निश्चित रूप से ईश्वर, फ़ातेमा के क्रोध से क्रांतित होता है और उनकी प्रसन्नता से प्रसन्न होता है लेकिन पैग़म्बर की युवा बेटी उनके निधन के कुछ ही महीने बाद थकी और घायल बीमारी के बिस्तर पर पड़ गई और मौत की काना करने लगी, यहां तक कि उसके विरह से उसके बच्चों के विलाप की आवाज़ आकाश तक पहुंचने लगी।

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ने अपने पति हज़रत अली अलैहिस्सलाम को वसीयत की थी कि हे अली! निधन के पश्चात मेरे शव को रात में नहलाना, रात में कफ़न देना और रात ही में दफ़्न करना जब सब लोग सो रहे हों। मैं नहीं चाहती कि जिन लोगों ने मुझ पर अत्याचार किया है वे मेरे अंतिम संस्कार में भाग लें। अली ने भी रात के अंधकार में कुछ लोगों के साथ फ़ातेमा के अनाथ व बिलकते बच्चों से चुप रहने का आग्रह करते हुए, उनके शव को अज्ञात स्थान पर दफ़्न कर दिया। अगले दिन सुबह जब कुछ लोग पैग़म्बर की इकलौती बेटी के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए आए तो उन्हें, रात के समय ही उन्हें दफ़्न किए जाने की बात पर अचरज हुआ। एक गुट क्रोधित हुआ और उसने कहा कि हम फ़ातेमा की क़ब्र खोल कर उनके शव को बाहर निकालेंगे और पुनः उनका अंतिम संस्कार करेंगे। यह सुन कर हज़रत अली अलैहिस्सलाम इतने क्रोधित हुए कि युद्धों में उनका रणकौशल देख चुके लोग, वहां से वापस चले गए। आज चौदह शताब्दियां बीत जाने के बाद भी पैग़म्बर की प्राण प्रिय बेटी की क़ब्र का लोगों को पता नहीं है। पैग़म्बर की इकलौती बेटी की क़ब्र का अज्ञात होना, कई संदेश लिए हुए है जिनके बारे में लोगों को विचार करना चाहिए।

 

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जब रात के अंधकार में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को दफ़्न कर लिया तो पैग़म्बर की क़ब्र की ओर मुख करके कहा। मुझे इतना दुख है जिससे मेरा दिल ख़ून हुआ जा रहा है, कितनी जल्दी हम सब बिखर गए और हमारे बीच जुदाई पड़ गई। मैं कवेल ईश्वर से शिकायत करता हूं। शीघ्र ही आपकी सुपुत्री आपके पास पहुंचेगी और आपको सूचित करेगी कि आपके मानने वाले उसका अधिकार छीनने के लिए किस प्रकार एकजुट हो गए। आप फ़ातेमा से सारी बातें पूछिएगा क्योंकि उनके दिल में इतनी पीड़ाएं हैं जिनसे उनका दिल फटा जा रहा था और उनके पास दुनिया में उन्हें बताने का कोई मार्ग नहीं था। वे अब सारी बातें आपको बताएंगी और ईश्वर फ़ैसला करेगा कि वही सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है।

 

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