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सोमवार, 22 फ़रवरी 2016 17:17

तकफ़ीरी आतंकवाद-6

तकफ़ीरी आतंकवाद-6

हमने शिया और सुन्नी मुसलमानों की दृष्टि से सलफीवाद के विश्वासों की समीक्षा की थी। इसी प्रकार हमने सलफियों की दृष्टि से सलफ़ शब्द की परिभाषा की और शिया- सुन्नी विद्वानों की ओर से इस परिभाषा पर टिप्पणी की चर्चा की थी। साथ ही हमने इस ओर संकेत किया था कि सलफ का पारिभाषिक अर्थ उस बिदअत में है जिसे सातवीं शताब्दी में इब्ने तैय्मिया ने उत्पन्न किया है। उसने अतीत के विद्वानों के विपरीत सलफ का अर्थ निकाला और उसने सलफ का प्रयोग उस अर्थ में किया जिसका प्रयोग उस समय तक किसी भी इस्लामी विद्वान ने नहीं किया था। इब्ने तैय्मिया और उसके बाद सलफियों ने जिस महत्वपूर्ण बिदअत की बुनियाद रखी, वह यह है कि उसने धार्मिक स्रोतों को विस्तृत कर दिया। पहले चार चीज़ों को धार्मिक स्रोत समझा जाता था यानी चार चीज़ों के माध्यम से इस्लामी आदेशों को समझा जाता था। पवित्र कुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा, इजमाअ यानी इस्लामी विद्वान जिस चीज़ पर एकमत हों और बुद्धि किन्तु इब्ने तैय्मिया और सलफियों ने उसमें विस्तार कर दिया और पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों, उनके साथियों के साथी और उन साथियों के साथी। यानी इन लोगों की कथनी और करनी भी इस्लामी आदेश समझने का स्रोत  बन गयी।

 

 

इब्ने तैय्मिया के कथनानुसार सलफ़ वे लोग हैं जो इस्लाम की आरंभिक तीन शताब्दियों में ज़िन्दगी करते थे और उनके अंदर समस्त अच्छाइयां पाई जाती थीं और वे किसी समस्या के समाधान के लिए दूसरों से बेहतर व योग्य हैं। वह इसके बाद कहता है” सलफ़ के चिन्ह तुम्हारे लिए मुबारक हों। जो कुछ शिफा और पर्याप्त होने का कारण है वे उसे ले आये और उसके बाद कोई वह चीज़ नहीं लाया जिसे वे नहीं जानते थे। इब्ने तैय्मिया इतना आगे बढ़ जाता है कि पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम की परम्परा के साथ इस गुट को भी एक धार्मिक स्रोत के रूप में पेश करता है। वह कहता है इस्लामी आदेश तीन चीज़ों से सिद्ध होते हैं। पहले ईश्वरीय किताब क़ुरआन, दूसरे पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा और तीसरे वह चीज़ जिस पर आरंभिक मुसलनमानों ने अमल किया है और इन तीन चीज़ों से हटकर धार्मिक आदेश को सिद्ध करने के लिए किसी चीज़ को आधार मानना सही नहीं है। वह एक अन्य स्थान पर कहता है।

 

कार्यों का मुस्तहब होना और उन्हें धर्म में दाखिल करना/ ईश्वर की किताब, पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा और इस्लाम के आरंभ में इस्लाम लाने वालों के आचरण के आधार पर मुस्तहब होना साबित होता है और इसके अलावा समस्त चीज़ें नई हैं और वह मुस्तहब नहीं हैं। सुन्नी विद्वान सलफ़ के इस अर्थ को स्वीकार नहीं करते हैं। सलफ़ के अनुसरण के बारे में सुन्नी मुसलमानों के प्रसिद्ध विद्वान अबू हामिद ग़ज़ाली का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम से जो कुछ हम तक पहुंचा है उसे हमने दिलो-जान से स्वीकार कर लिया है और जो कुछ पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों से हम तक पहुंची है उसमें से हमने कुछ को ले लिया और कुछ को छोड़ दिया किन्तु जो कुछ पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों के अनुयाइयों से हम तक पहुंचा है तो जान लो कि वे मर गये हैं और हम भी मर जायेंगे।

शीया मुसलमानों की दृष्टि से पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों का केवल वह गुट धार्मिक स्रोत है जिसके अनुरण का आदेश ईश्वर की किताब और पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा में दिया गया है ये लोग अनुसरण के योग्य हैं।

 

 

सलफ़ के अनुसरण को वैधता प्रदान करने के लिए सलफियों ने जिस चीज़ को प्रमाण के रूप में पेश किया है वह एक हदीस अर्थात कथन है जिसके बारे में कहा गया है कि पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। वह कथन यह है सबसे अच्छे मेरी शताब्दी के लोग हैं उसके बाद वे लोग हैं जो उनके बाद आयेंगे और उसके बाद वे लोग हैं जो उनके बाद आयेंगे। इन लोगों के बाद वे लोग आयेंगे जिनमें से हर एक की शपथ को दूसरा इंकार करेगा। सलफियों ने इसी हदीस को आधार बनाकर इस्लाम की तीन आरंभिक शताब्दियों को बेहतरीन शताब्दी बताया है। इसी कारण जिन लोगों ने आरंभिक तीन शताब्दियों में ज़िन्दगी की, सलफ़ी विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें आदर्श मानते हैं। सलफ़ियों की आस्था के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम ने न केवल आरंभिक शताब्दियों के मुसलमानों के बेहतरीन होने की गवाही दी है बल्कि उसके बाद के मुसलमानों की भर्त्सना भी की है और इस प्रकार की स्थिति आरंभिक तीन शताब्दियों के मुसलमानों के अनुसरण की आवश्यकता की सूचक है कि सलफ़ी उसे क़ूरूने मुफज़्ज़ेलहा कहते हैं।

 

 

पहली बात तो यह है कि तर्क की दृष्टि से इस हदीस का सही साबित होना कठिन है। दूसरे यह कि हदीस एतिहासिक वास्तविकताओं से भी विरोधाभास रखती है। दूसरे शब्दों में यह हदीस आरंभिक तीन शताब्दी को बेहतरीन शताब्दी बताती है जबकि उसके बाद की शताब्दियों की भर्त्सना करती है जबकि आरंभिक तीन शताब्दियों में ऐसी बहुत सी घटनाएं घटीं हैं जो पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत हैं। इस्लाम की आरंभिक तीन शताब्दियों के बेहतर होने से अगर तात्पर्य यह है कि आस्था के क्षेत्र में यह शताब्दियां बेहतर हैं तो इस्लाम की तीन आरंभिक शताब्दियों में बहुत से धर्मभ्रष्ट गुट व पंथ अस्तित्व में आये। खवारिज नाम का पथभ्रष्ट गुट हिजरी क़मरी के तीसरे दशक में अस्तित्व में आया और अपनी ग़लत आस्थाओं के आधार पर इस गुट ने मुसलमानों के खून बहाने को वैध क़रार दिया। ख़वारिज वह गुट था जिसकी भविष्यवाणी पैग़म्बरे इस्लाम ने कर दी थी। इस गुट की एक आस्था यह थी कि वह ईमान और अमल को अनिवार्य समझता था जबकि उसके मुकाबले में मुरजेया नामक एक अन्य गुट अस्तित्व में आया और उसकी आस्थाएं ख़वारिज से पूर्णतः भिन्न थीं। वह ईमान एवं अमल को आवश्यक नहीं मानता था। इस गुट ने बनी उमय्या के अन्याय व अत्याचार की भूमि प्रशस्त कर दी। इस गुट के अनुसरणकर्ताओं का मानना था कि अगर कोई ईमानदार हो और वह पाप करे तो इससे उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा वह सफल है। उसके बाद आरंभिक शताब्दियों में करामिया, जहमिया और कलाबिया जैसे दिग्भ्रमित गुट अस्तित्व में आये।

 

 

सलफियों ने जो यह कहा था कि आरंभिक शताब्दियां बेहतरीन शताब्दियां थीं और उसके लिए उन्होंने एक गढ़ी हुई झूठी हदीस को प्रमाण के रूप में पेश किया उनकी इस आस्था को ग़लत सिद्ध करने के लिए दूसरा प्रमाण यह पेश किया जा सकता है कि अगर इस्लाम की आरंभिक तीन शताब्दियों के बेहतरीन शताब्दी होने से तात्पर्य इस्लामी जगत में शांति व सुरक्षा है तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि पहली शताब्दी में कटु घटनाएं व जघन्य अपराध हुए हैं। जैसे पहली ही शताब्दी में मुहाजिर और अंसार मुसलमानों की नज़रों के सामने उसमान की हत्या कर दी गयी, जमल, सिफ्फीन और नहरवान नामक युद्ध हुए और उनमें से हर एक में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में पैग़म्बरे इस्लाम के सैकड़ों साथियों ने तलवार उठाई। हज़रत अली, इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम को शहीद किया गया, हुर्रा नामक अपराध हुआ और काबे में आग लगाने की घटना, अत्याचारी शासक हज्जाज बिन यूसुफ़ सक़फी द्वारा किया जाने वाला नरसंहार। इस प्रकार की घटनाओं के साथ इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों को किस प्रकार बेहतरीन शताब्दी कहा जा सकता है?

 

 

अगर यह कहा जाये कि इस्लाम की आरंभिक तीन शताब्दियों के बेहतरीन होने का तात्पर्य यह है कि उस समय के लोग श्रेष्ठ थे तो पैग़म्बरे इस्लाम, उनके साथियों, उनके साथियों के साथी और उन साथियों के साथी और बहुत से लोग व गुट ऐसे हैं जिनके अयोग्य होने की गवाही पवित्र क़ुरआन ने दी है। पैग़म्बरे इस्लाम के काल में मुनाफ़िक़ व मित्थ्याचारी, बेईमान, और भ्रष्ट लोग मौजूद थे। तो किस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों के बेहतर होने का तात्पर्य उस समय के लोगों का श्रेष्ठ होना है। सुन्नी मुसलमानों के वरिष्ठ विद्वान और सलफ़ से सलफियों के निष्कर्ष निकाले जाने के मुखर विरोधी ग़ज़ाली कहते हैं जिन व्यक्तियों ने ग़लती व भूल की है और यह भी साबित नहीं है कि उन लोगों ने अपनी ग़लती व पापों से तौबा कर ली है तो उनकी बात को आधार व प्रमाण नहीं बनाया जा सकता जबकि उनके बारे में ग़लती की संभावना भी मौजूद है तो किस प्रकार उन्हें मासूम समझा जा सकता है? मासूम उस व्यक्ति को कहते हैं जिससे कोई पाप न हो। बहरहाल ऐसी रवायतें मौजूद हैं जो सलफ़ के सार्वजनिक अर्थ को ग़लत सिद्ध करती हैं। यानी सलफ़ का वह अर्थ ग़लत है जिसमें सलफ से तात्पर्य यह लिया जाता है कि सलफ अपने बाद की पीढ़ियों के लिए आदर्श व मार्गदर्शक हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम फरमाते हैं” प्रलय के दिन हमारे कुछ साथी हमारे पास आयेंगे परंतु उन्हें हौज़े कौसर के पास से भगा दिया जायेगा। मैं कहूंगा कि हे ईश्वर ये मेरे साथी हैं? ईश्वर कहेगा आप नहीं जानते कि आपके बाद इन लोगों ने क्या किया? ये लोग इस्लाम से पलट गये और अपने पूर्वजों से जा मिले।

 

 

बिदअत के अर्थ से हटकर जो चीज़ सलफियों को इस्लाम की शिक्षाओं से दूर करती है वह यह है कि वह समस्त मामलों में सोच- विचार और बुद्धि से काम लिये बिना सलफ़ का अनुसरण करते हैं। सुन्नी मुसलमानों के एक विद्वान सामिर इस्लांबूली सलफीवाद की सूक्ष्म परिभाषा करते हैं। उनके अनुसार सलफीवाद आने वाली पीढ़ियों पर पिछले समाजों के वर्चस्व के मार्ग को प्रशस्त करने की चेष्टा में है मानो अतीत के लोग भावी लोगों के शरीर में जीवित हैं और पूर्वज अपने बेटों व संतान के शरीर में जीवित हैं। सलफी, सलफ को महत्व देने के लिए समस्त क्षेत्रों में उन्हें आधार व आदर्श बनाने के प्रयास में हैं। सलफियों का प्रयास है कि सलफ को धार्मिक वैधता प्रदान करके वह उनके समस्त कार्यों और कथनों को अपने समय में आदर्श बनाये। साथ ही सलफियों की चेष्टा है कि वे भावी पीढ़ियों से हर प्रकार के सोच -विचार की क्षमता छीन लें।

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