यह वेबसाइट बंद हो गई है। हमारी नई वेबसाइट हैः Parstoday Hindi
सोमवार, 22 फ़रवरी 2016 17:16

तकफ़ीरी आतंकवाद-5

तकफ़ीरी आतंकवाद-5

अहमद बिन हंबल के मत से संबंध रखने वाले धर्मगुरुओं का मानना है कि सलफ़ी समुदाय का अहमद बिन हंबल के विचारों से कोई संबंध नहीं है।

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहने वाले सहाबियों के बारे में सलफ़ी समुदाय का जो विचार है वह अहमद बिन हंबल के मत को मानने वालों के विचार से भिन्न है। सलफ़ियों के निकट पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहने वालों तथा उन लोगों में जो पैग़म्बरे इस्लाम के इस दुनिया से चले जाने क बाद इस्लाम धर्म में शामिल हुए कोई अंतर नहीं है। वे सबको सलफ़े सालेह का नाम देते हैं और स्वयं को उनका अनुयायी मानते हैं जबकि सुन्नी धर्मगुरुओं का विचार इस बारे में अलग है। सुन्नी समुदाय के प्रख्यात धर्मगुरू ग़ज़ाली सलफ़ के बारे में कहते हैं कि जो कुछ हमें पैग़म्बरे इस्लाम से मिला उसे हमने दिलो जान से स्वीकार कर  लिया लेकिन जो हमें सहाबियों से मिला उसमें कुछ को स्वीकार किया और कुछ को छोड़ दिया। जो लोग ताबेईन के अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबियों का अनुसरण करने वालों की श्रेणी में आते हैं वे भी इंसान हैं और हम भी इंसान हैं। शिया समुदाय के निकट तो पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन और पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनी तथा क़ुरआन का ही अनुसरण करने का आदेश है।

इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो सलफ़ी विचारधारा की जड़े चौथी शताब्दी में भी नज़र आती हैं किंतु चूंकि मुसलमानों के विचारों से इसका टकराव था अतः बहुत कम समय में ही सलफ़ी विचारधारा दब गई। सातवीं शबादती हिजरी में इब्ने तैमीया ने सलफ़ी विचारधारा को नया जीवन दिया तथा इस्लामी जगत में फूट का बीज बो दिया। उसके बाद इब्ने तैमीया के शिष्य इब्ने क़ैइम जौज़ी ने इस विचारधारा को जीवित रखने का बड़ा प्रयास किया किंतु वह भी कुछ ख़ास नहीं कर पाए। बारहवीं शताब्दी हिजरी में हेजाज़ और भारतीय उपमहीद्वीप में सलफ़ी विचारधारा कुछ अंतर के साथ फिर उभरी और विशेष रूप से ब्रिटेन के समर्थन के कारण इसे विशेष रूप से हेजाज़ के क्षेत्र में फैलने का मौक़ा मिला। इस समय सलफ़ी विचारधारा इस्लामी देशों में अपने स्वार्थों को पूरा करने का अमरीकी हथकंडा बनी हुई है। इस समय सलफ़ी विचारधारा की कई शाखाएं अस्तित्व में आ  चुकी हैं जो अलग अलग आस्थाएं रखती हैं। सलफ़ी विचारधारा की मूल विशेषता यह है कि यह विचारधारा सभी इस्लामी मतों का इंकार करती है और सभी मुसलमानों को यह निर्देश देती है कि वह आंख बंद करके सलफ़ कहे जाने वाले सभी सहाबियों का अनुसरण करें।

 

 

 

सुन्नी धर्मगुरू सईद रमज़ान अलबूती ने सलफ़ी विचारधारा पर गहरी टिप्पणी करते हुए लिखा है कि सलफ़ी समुदाय एक नई चीज़ है जो केवल स्वयं को मुसलमान मानता है और अपने अलावा सब को काफ़िर समझता है। यह स्वयंभू मत जो सभी मतों को नकारकर एकता स्थापित करने का दावा करता है वास्तव में एकता का विरोधी है। सलफ़ी या वहाबी समुदाय यह दावा करता है कि कोई मत और समुदाय नहीं है, सबको चाहिए कि पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों और इन साथियों का अनुसरण करने वालों तथा इन अनुसरणकर्ताओं का अनुसरण करने वालों के व्यवहार को कसौटी बनाया जाए। सलफ़ी विचारधारा के लोगों का मानना है कि सभी मतों को छोड़ देना  चाहिए, शताब्दियों तक धर्मगुरुओं और विद्वानों ने मेहनत करके जिस इस्लामी संस्कृति की निर्माण किया और अपनी मेहनत से इस्लामी फ़िक़ह को विकास के जिस चरण तक पहुंचाया तथा उसे नए युग की आवश्यकताओं की पूर्ति के योग्य बनाया सलफ़ी सबको रद्द कर देने पर तुले हुए हैं। सुन्नी धर्मगुरू सईद रमज़ान अलबूती सलफ़ी विचारधारा पर टिप्पणी करते हुए सलफ़ी मत या ग़लत शुरुआत नामक अपनी पुस्तक में महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित करते हैं। वह कहते हैं कि सलफ़ी निमंत्रण के लिए हाथ बढ़ाते हैं और कहते हैं कि आईए सभी मतों का इंकार करके एकरूपता की ओर क़दम बढ़ाएं लेकिन दूसरे हाथ में वह तकफ़ीर के तलवार उठाए होते हैं और यह संदेश देते हैं कि दूसरे मतों के लोगों की हत्या करके तथा उन्हें काफ़िर घोषित करके हम इस्लामी समाज को समरूपी बनाना चाहते हैं। मतों का इंकार कर देने के इस निमंत्रण में वस्तुतः एक विशेष मत का प्रचार निहित होता है। एसा मत जो शिथिलता से भरा हुआ है, एसी संकीर्ण सोच रखने वाला मत जो इस्लाम को आत्मा और आकर्षण से ख़ाली एक बेजान धर्म के रूप में पेश करता है तथा हिंसा और द्वेष के माध्यम से आपसी समरसता के सभी रास्ते बंद कर देना चाहता है।

 

 

सलफ़ी विचार धारा सलफ़े सालेह की जो परिभाषा पेश करती है और जो इस्लामी परिभाषा से बिल्कुल अलग है उससे हटकर भी सलफ़ी विचारधारा के सामने विचारों और ऐतिहासिक तथ्यों के स्तर पर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। जिनमें से कुछ का हम यहां उल्लेख करेंगे। सलफ़ी विचारधारा का अस्तित्व पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबियों और उनके अनुसरणकर्ताओं के बारे में विशेष सोच पर टिका हुआ है लेकिन धार्मिक पुस्तकों में भी सलफ़ का शब्द इस अर्थ में प्रयोग नहीं हुआ जिस अर्थ में सलफ़ी मत के मानने वाले प्रयोग करते हैं। धार्मिक पुस्तकों में इस शब्दों का यदाकदा ही कहीं प्रयोग हुआ हैं। क़ुरआन में सलफ़ का शब्द कुछ स्थानों पर आया है लेकिन केवल एक ही स्थान ऐसा है जहां सलफ़ का अर्थ पीछे गुज़र चुके लोग हैं वहां भी यह शब्दे बुरे लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। क़ुरआन के सूरए ज़ुख़ुरुफ़ की आयत संख्या 55 और 56 मे सलफ़ का शब्द प्रयोग किया गया है। इन आयतों में ईश्वर कहता है कि और जब उन्होंने हमें आक्रोश दिया तो हमने उनसे प्रतिशोध ले लिया और सबको डुबे दिया और उन्हें पीछे गुज़र चुके लोग तथा पाठ बना दिया दूसरों के लिए। दूसरी आयतों में सलफ़ का शब्द अधिकतर अप्रिय कार्यों के लिए प्रयोग किया गया है जो इस्लाम से पहले किए जाते थे और इस्लाम आने के बाद उन्हें हराम घोषित कर दिया गया।

रवायतों में भी यही स्थिति है। रवायतों और हदीसों में भी सलफ़ शब्द को उस अर्थ में कहीं नहीं प्रयोग किया गया है जो अर्थ सलफ़ी समुदाय निकालता है। शायद यह कहा जाए कि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में कोई एसा नहीं था जिसे सलफ़ या पूर्वज कहा जाए बल्कि यही लोग बाद वालों के लिए सलफ़ कहे गए। लेकिन चूंकि धर्म विश्वव्यापी और सर्वव्यापी होता है अतः यदि सलफ़ का यह अर्थ जो सलफ़ी समुदाय के दृष्टिगत है, उसकी धार्मिक मान्यता होती तो पैग़म्बरे इस्लाम उसकी ओर संकेत ज़रूर करते। क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने कथनों में आख़िरी ज़माने में उठने वाले फ़ितनों और कठिनाइयों का उल्लेख किया है और इस बारे में सावधान किया है। अतः यदि सलफ़ का कोई विशेष स्थान होता तो वह पैग़म्बरे इस्लाम की दृष्टि से छिपा नहीं रहता। इब्ने तैमीया के शिष्य इब्ने क़ैइम ने सलफ़ी मत को धार्मिक रंग देने के लिए उसके पक्ष में कुछ आयतों को उद्धरित किया है। क़ुरआन के सूरए तौबा की आयत नंबर 100 को भी उन्होंने अपने विचार की दलील के रूप में पेश किया है। इस आयत में ईश्वर ने कहा है कि मोहाजेरीन अर्थात मक्का से पलायन करके मदीना पहुंचने वाले तो अंसार अर्थात मदीना के असली निवासी जिन्होंने मोहाजेरीन को शरण दी, उनमें जो सबसे पहले के लोग हैं और वह लोग जिन्होंने भलाई से उनका अनुसरण किया। ईश्वर उनसे ख़ुश और वह ईश्वर से ख़ुश हैं, ईश्वर ने उनके लिए बाग़ तैयार किए हैं जहां पेड़ों के नीचे नहरें जारी हैं।

 

 

वह हमेंशा उनमें रहेंगे, यही बड़ी सफलता है। इब्ने क़ैइम का कहना है कि यह आयत मुसलमानों को सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करने वालों का अनुसरण करने की दावत देती है। किंतु उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इस आयत में केवल उस काम में उनका अनुसरण करने की दावत दी गई है जो उन्होंने सबसे पहले किया अर्थात इस्लाम स्वीकार करना और ईश्वर तथा उसके रसूल का अनुसरण करना। इस आयत  में यह कदापि नहीं कहा गया है कि इन लोगों के विचारों का अनुसरण किया जाए। यदि पैग़म्बरे इस्लाम के अनुसरण के साथ सलफ़ का अनुसरण भी महत्वपूर्ण होता तो ईश्वर और उसके रसूल अनुसरण का जहां आदेश है वहीं उनके साथ ही सलफ़ का नाम भी लिया जाता और उनका अनुसरण भी वाजिब घोषित किया जाता। यदि पैग़म्बरे इस्लाम के सहाबियों या इन सहाबियों का अनुसरण करने वालों या अनुसरणकर्ताओं का अनुसरण करने वालों ने लोगों को उस चीज़ की दावत दी जिसका आदेश ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम ने दिया है तो वास्तव में उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की सुन्नत पर अमल करने का आदेश दिया है किंतु यदि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से कोई बात कही तो क़ुरआन ने उसे भ्रांति का नाम दिया है। दूसरी बात यह है कि यदि यह आयत सहाबियों की जीवनी को भी किसी अमल के सही होने की कसौटी मानती है तो एक प्रकार का विरोधाभास सामने आएगा। क्योंकि इस प्रकार बाद के मुसलमानों को सलफ़ की जीवनशैली का अनुसरण करने की दावत दी गई है जबकि बहुत से मामले ऐसे हैं जिनमें सलफ़ समझे जाने वाले लोगों ने अपने पूर्वजों का अनुसरण नहीं किया है बल्कि खुल्लम खुल्ला विरोध किया है। यह मतभेद सहाबियों के बीच भी था।

 

 

श्री हकीम के अनुसार जब हज़रत उमर का निधन हुआ तो सलाह मशविरे के दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सामने हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर की जीवनशैली को पेश किया गया किंतु हज़रत अली ने उनकी जीवन शैली का अनुसरण करने से इंकार कर दिया और इसी लिए ख़िलाफ़त हज़रत उसमान को मिल गई। हज़रत उसमान ने भी अमल में कई मामलों में अपने से पहले को दो ख़लीफ़ाओं की शैली के विरुद्ध काम किया। जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम ख़लीफ़ा बने तो तीसरे ख़लीफ़ा की शैली के बिल्कुल विपरीत अमल किया उन्होंने राजकोश का धन और सरकारी ओहदे बांटने की शैली पूरी तरह बदल दी। पहले और दूसरे ख़लीफ़ के बीच भी शैली का अंतर मौजूद है। अबू बक्र ने टैक्स से मिलने वाली रक़म को बांटने में बराबरी को आधार बनाया लेकिन दूसरे ख़लीफ़ा ने अंतर के साथ इसे बांटा। तलाक़ के बारे में दोनों के विचार अलग अलग थे। उमर ने मुता को हराम घोषित कर दिया जबकि पहले ख़लीफ़ा ने ऐसा नहीं किया था। इस प्रकार के उदाहरण बहुत अधिक हैं।

   फ़ेसबुक पर हमें लाइक करें, क्लिक करें 

 

 

Media

Add comment


Security code
Refresh