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सोमवार, 22 फ़रवरी 2016 16:06

ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-27

ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-27

दुनिया में शीशागरी की कला या शीशे का काम में बहुत विविधता मौजूद है। मूल रूप से यह कला औद्योगिक व कलात्मक दो भाग में बटी हुयी है। औद्योगिक दृष्टि से दुनिया में 2500 से ज़्यादा प्रकार के शीशों का उत्पादन होता है जिनमे से हर एक की विशेष रासायनिक व भौतिकी विशेषता होती है। कलात्मक शीशागरी में कई शैलियां प्रचलित हैं। ईरान में पश्चिमी आज़रबाइजान को शीशागरी की कला का केन्द्र माना जाता है।

 

 

पिछले कार्यक्रम में आपको ईरान में शीशागरी के लंबे इतिहास से आपको परिचित कराया और इस बात का उल्लेख किया कि ईरान में रंगीन शीशागरी का इतिहास 1000 साल पुराना है। रंगीन शीशे के निर्माण के लिए पहले काग़ज़ पर उसकी डीज़ाइन तय्यार की जाती है। फिर डीज़ाइन के हर भाग का रंग तय किया जाता है, उस पर नंबर डाला जाता है और फिर कच्चे शीशे की संरचना के अनुसार उसकी दिशा निर्धारित की जाती है कि किस रंगीन टुकड़े को कहां जड़ना है। उसके बाद शीशों की दूरी को मद्देनज़र रखते हुए डीज़ाईन को रंगीन शीशे की चादर पर चिपकाते हैं और फिर हीरे की क़लम से उसे काटते हैं। उसके बाद फ़्रेम के लिए कटे हुए शीशे के टुकड़ों को डीज़ाइन के अनुसार बिछाते हैं और फिर गर्म सॉड्रिग रॉड और मिश्र धातु से चिपकाते हैं। बाद में उसे खिड़की के फ़्रेम में लगाते हैं और इस प्रकार रंगीन शीशागरी रौशनी व धूप के सामने अपना सौंदर्य दिखाती है। प्राचीन शीशों के नमूने और ईरान में इस उद्योग के इतिहास के बारे में विस्तृत ब्योरा तेहरान के आबगीने म्यूज़ियम या शीशों की वस्तुओं के म्यूज़ियम में मौजूद हैं।

डिज़ाइन में रंगीन शीशे जड़ने से, किसी परिवेश में विभिन्न अंतराल पर अलग अलग रंगों का आनंद ले सकते हैं। रंगीन शीशे का ईरानी वास्तुकला में विशेष स्थान है। इसे सिर्फ़ ऐतिहासिक इमारतों में ही नहीं बल्कि आम लोग अपने घर की इमारतों में भी इस्तेमाल किया करते थे। इसी प्रकार रंगीन शीशों की चीज़ें भी बनाते थे। ईरानी वास्तुकला के ऐसे कलाकार भी गुज़रे हैं जो खिड़कियों में रंगीन शीशे को इस तरह जड़ते थे कि रंग से इंद्रधनुष बन जाता था।

 

 

ईरान में ज़्यादातर मरुस्थलीय इलाक़ों में रंगीन शीशे का इस्तेमाल दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि मरुस्थलीय इलाक़ों में धूप तेज़ होती है और भौगोलिक कारणों में प्राकृति में रंगों की विविधता कम होती है। दूसरी बात यह कि ईरानी वास्तुकला की विशेषताओं के मद्देनज़र रंगीन शीशा लगाने का उद्देश्य सिर्फ़ एक सुंदर वस्तु का प्रदर्शन नहीं था बल्कि अमुक क्षेत्र की जनता की जीवल शैली की ज़रूरतें भी इस शैली के प्रचलन में प्रभावी रही हैं।

खिड़कियों में रंगीन शीशे के जड़ने से साल की विभिन्न फ़सलों में धूप की तेज़ी संतुलित रहती है। इसी प्रकर बाहर से घर के भीतर का भाग साफ़ दिखाई नहीं देता जिससे घर के भीतर लोग एक प्रकार की शांति का आभास करते हैं।

 

 

रंगीन शीशे सुंदर दिखने के साथ मनौवैज्ञानिक प्रभाव भी डालते हैं। इस संदर्भ में ईरान की एक ऐतिहासिक इमारत का एक हाल का उल्लेख किया जा सकता है। ईरान के काशान शहर में ख़ानए तबातबाईहा नामक ऐतिहासिक इमारत की वास्तुकला अपनी विशेषता के लिए मशहूर है। इस इमारत की एक विशेषता यह है कि इसकी खिड़कियों में रंगीन शीशे इस्तेमाल किए गए हैं। दिन में सूरज का कोण बदलने से, खिड़की में लगे रंगीन शीशों में से किसी एक रंग के शीशे का वातावरण कमरे में छाया रहता है। मिसाल के तौर पर दोपहर के वक़्त कमरे में लाल रंग का वातावरण छाया रहता है जिससे तेज़ भूख लगती है। जब कमरे में बैगनी रंग का वातावरण छाया रहता है तो कमरे से कीड़े मकोड़े भाग जाते हैं। चूंकि उस समय कीड़े मकोड़े दोपहर के बाद घर के रहने वालों के आराम में बाधा बनते थे इसलिए बैगनी रंग का इस्तेमाल किया जाता था कि उन्हें भगाया जा सके।

इसी प्रकार घर में रंगीन शीशों वाली खिड़की से व्यक्ति शांति का आभास करता है और तनाव दूर होता है। इन खिड़कियों पर सूरज की किरणे पड़ने से घर का भीतरी वातावरण दिन के हर घंटे में बदलता है जिससे घर में एक प्रकार की ख़ुशी का आभास होता है।

 

 

आज के दौर में भी रंगीन शीशे को घर में पार्टीशन के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार मेट्रो स्टेशन, एयरपोर्ट और दूसरे सार्वजिनक स्थलों पर रंगीन शीशे के इस्तेमाल से बहुत ही सुंदर दृश्य वजूद में आता है।

वास्तुकला के अलावा, चित्रकारी की कला का भी शीशागरी से गहरा संबंध है। शीशे के बर्तनों पर चित्रकारी ऐसी कला है जो विभिन्न राष्ट्रों के बीच शताब्दियों से लोकप्रिय रही है और इसके बहुत से नमूने दुनिया के अनेक म्यूज़ियमों में देखे जा सकते हैं।

शीशा चित्रकारी के लिए सबसे उचित पृष्ठिभूमि मुहैया करता है क्योंकि रंगों की विविधता बहुत ही अच्छे रूप में प्रदर्शित होती है। इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि शीशे के बहुत अच्छे बर्तन पर दक्ष चित्रकारी या जटिल तक्षणकला बहुत सुंदर लगती है कभी कभी सादा शीशे का बर्तन, आम रंगीन डीज़ाइन के कारण बहुत सुंदर लगता है।

ईरान में इस प्रकार की चित्रकारी का इतिहास स्पष्ट नहीं है किन्तु कुछ लोगों का अनुमान है कि शीशे पर चित्रकारी जर्मनी से ईरान आयी होगी। कुछ दस्तावेज़ों से यह भी पता चलता है कि यह शैली बंदरगाहों के ज़रिए पूरी दुनिया में पहुंची और इसी प्रकार ईरान की दक्षिणी बंदरगाह पहुंची और लोगों ने इस कला को अपनाया।

 

 

ईरान की कलाओं में रूचि रखने वाले जानते हैं कि 16वीं ईसवीं में ईरान में सफ़वी शासन काल की स्थापना के साथ ही ईरान में कला का स्वर्णिम दौर शुरु हुआ और उस दौर के शीशागरी के कुछ मूल्यवान नमूने अभी भी मौजूद हैं। ज़न्दिया शासन शंख्ला की स्थापना और करीम ख़ान ज़न्द का शासन शुरु होते ही शीराज़ शहर में शीशागरी के कारख़ाने सहित बड़े औद्योगिक कारख़ाने लगने शुरु हुए। शीशागरी के इन कारख़ानों के उत्पाद पूरी तरह सफ़ेद नहीं थे किन्तु इस शहर के कलाकार रंगीन शीशे के उत्पादन में माहिर थे और वे गहरे नीले, गहरे हरे और भूरे रंग के शीशे के बर्तन का उत्पादन करते और उसे बड़ी सूक्ष्मता से सजाते थे।

क़ाजारी शासन काल में क़ाएम मक़ाम फ़राहानी नामक अधिकारी और अमीर कबीर जैसी हस्तियों ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में शीशागरी के नए कारख़ाने की स्थापना में बहुत योगदान दिया। इन कारख़ानों में शीशे की शीट का उत्पादन होता था जिन्हें विशेष रंग की चित्रकारी के लिए इस्तेमाल करते थे। उसी समय से यह कला जनता के बीच लोकप्रिय हुयी और बड़ी संख्या में कलाकार, कला के इस क्षेत्र में सक्रिय हुए।

 

शीशे पर चित्रकारी विषयवस्तु की दृष्टि से दो तरह की होती हैं। एक धार्मिक चित्रकारी और दूसरे सजावटी चित्रकारी। धार्मिक चित्रकारी लीपि व आइक्नॉग्राफ़ी पर जबकि सजावटी चित्रकारी बेल-बूटों, तस्वीर और लैंडस्केप या भूध्श्य पर आधारित होती है। इसके अलावा शीशे पर चायख़ानों में बने चित्रों की चित्रकारी करते हैं।

 

 

क़ाजारी शासन काल में शीशे पर चित्रकारी, फूल बूटे के अपने पारंपरिक चित्रों से बाहर आयी और कलाकारों ने पुल और योरोपीय गिराजघरों के चित्र बनाने शुरु किए। इस प्रकार के नमूनों का उत्पादन इस्फ़हान में होता था।

आज शीशे पर चित्रकारी के लिए विशेष रंग का इस्तेमाल होता है। ये रंग तीन प्रकार के होते हैं। पानी में मिलाए हुए रंग जिन्हें भट्टी में गर्म करने की ज़रूरत नहीं होती। भट्टी में गर्म किए गए विशेष रंग और थिनर में मिलाए हुए रंग।

शीशे पर चित्रकारी करने वाले कलाकारों का मानना है कि शीशे की वस्तु छोटी और उपयोगी हो जैसे 35 सेंटीमीटर लंबी और 45 सेंटीमीटर चौड़ी हो तो उसके ख़रीदार ज़्यादा होंगे। इसी प्रकार आज कल लोग अपलाइड आर्ट को ज़्यादा पसंद करते हैं और रंगीन या चित्रकारी वाले शीशों के बर्तन, आइना, विभिन्न प्रकार व आकार के डिब्बे और घर की सजावट व वास्तुकला के लिए पैनल बनाए जाते हैं। 

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