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बुधवार, 17 फ़रवरी 2016 13:38

ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-26

ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-26

शीशे की कला उन कलाओं में है जिसका ईरान में इतिहास बहुत पुराना है। इसके सुंदर नमूने, इस कला के कलाकारों की कौशल और जनता के बीच इस कला की लोकप्रियता का पता देते हैं। ईरानी 3000 साल से शीशे की कला से परिचित हैं। जीवन के विभिन्न अवसरों से इसे इस्तेमाल करते हैं और सच कहें तो शीशे की कला ईरान की संस्कृति का हिस्सा है।

 

 

आठवीं हिजरी क़मरी में शीशे की कला के केन्द्र शीराज़ और समरक़न्द में बनाए गए। ईरानी कलाकारों ने शीशागरी में इतनी महारत हासिल की कि शायरों ने अपने शेरों में शीशे को स्थान दिया। मिसाल के तौर पर बहुत से शेरों में दिल टूटने को शीशे के जाम के टूटने से उपमा दी गयी है कि जिसमें अब टूटने के बाद वह सुंदरता नहीं रह गयी। इसलिए टूटे या चटख़े हुए जाम को सिर्फ़ उसका निर्माण करने वाले के पास ले जाने ही हल है ताकि वह कोई हल निकाल सके। ईरान के 17वीं ईसवी के  प्रसिद्ध ग़ज़ल शायर साएब तबरीज़ी ने अपनी एक ग़ज़ल में दिल टूटने को शीशा टूटने से उपमा दी है।             

शीशे की चीज़ों के निर्माण के लिए बहुत महारत की ज़रूरत होती है। इस उद्योग में काम करने वाले ज़्यादातर लोग वे होते हैं जिन्होंने वर्षों काम करके महारत व अनुभव हासिल किया होता है। ईरान में शीशागरी के कलाकार आम तौर जो चीज़ें बनाते हैं उनके डीज़ाइन का आधार ईरान के अस्ली व पारंपरिक डीज़ाइ हैं।

शीशे की चीज़ बनाने से पहले शीशागरी के डीज़ाइनर को पहले उस कारख़ाने का निरीक्षण करना होता है जहां वह अपने डीज़ाइन के अनुसार कोई चीज़ बनाना चाहता है। शीशागरी का डीज़ाइनर अमुक कारख़ाने जाकर, शीशागर की कला के कौशल को परखता है ताकि उसकी क्षमता के अनुसार, डीज़ाइन तय्यार करे। आम तौर पर शीशे की चीज़ों की डीज़ाइन का ख़ाका काग़ज़ पर तय्यार किया जाता है। उसके बाद शीशागरी के डीज़ाइनर को कारख़ाने में हाज़िर होकर, कलाकार को डीज़ाइन की बारीकियां वग़ैरह बतानी होती हैं।

 

 

हाथों से शीशागरी के उपकरण बहुत सादे होते हैं और इनकी संख्या ज़्यादा नहीं है। इस उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण साधन 100 से 120 सेंटीमीटर लंबा पाइप होता है। यह पाइप स्पात या विशेष धातु का होता है जिसे ‘दम’ कहा जाता है। यह पाइप खोखला होता है और इसे भट्टी से शीशा निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। शीशागर इस पाइप को पिघले हुए शीशे में डालता और थोड़े समय के लिए उसमें घुमाता है। भट्टी में पिघला हुआ थोड़ा शीशा पाइप में लेकर निकालते हैं और फिर उस पाइप में फूंकते हैं जिससे छोटी सी गेंद जैसा शीशा बनता है। जब यह गेंद नुमा शीशा सख़्त हो जाता है तो फिर पाइप को पिघले हुए शीशे में डालते हैं और दृष्टिगत चीज़ के निर्माण के लिए ज़रूरत भर का शीशा निकालते हैं।

कलाकार पहली बार में गेंद की तरह का जो गोला निकालता है उससे उसे दूसरे चरण में शीशे की मात्रा निकालने में मदद मिलती है ताकि सभी बिन्दुओं का व्यास एक जैसा हो और जो चीज़ बने उनका व्यास भी एक जैसा हो। चूंकि इस चरण में पिघले हुए शीशे का गाढ़ापन उसे रूप देने के लिए कम होता है और दूसरी ओर उसका व्यास एक जैसा होना चाहिए, इसलिए पाइप को, सरिया में डालते हैं और उसे घुमाते रहते हैं।

इसके बाद शीशागर स्पात के पाइप में ज़रूरत भर फूंकता है और उससे गेंद के आकार का शीशा वजूद में आता है। शीशे को रूप देने के लिए विशेष चरण अंजाम देने के बाद शीशागर, वस्तु को दोबारा भट्टी के पास ले जाता है और गर्माता है ताकि वह फिर से नर्म हो जाए और उसके मुहाने को दृष्टिगत आकार का बनाया जा सके।

 

 

 

शीशे को आकार व रूप देने के चरण के बाद, वह लगभग तय्यार हो जाता है और फिर उसकी सतह पर काम शुरु होता है। यह वह काम है जिसका शीशे के उत्पाद को सुंदर बनाने में बहुत अहम रोल होता है। इस चरण में शीशे की चीज़ पूरी तरह ठंडी होने से पहले कुछ सेकेन्ड के लिए ठंडे पानी में डाली जाती है। ऐसा करने से शीशे की चीज़ मज़बूत हो जाती है और उस पर सैकड़ों छोटे छोटे बाल पर पड़ जाते हैं लेकिन चूंकि शीशे की चीज़ भीतर से उस वक़्त तक गर्म रहती है इसलिए वह पूरी तरह नहीं टूटती बल्कि सिर्फ़ उसकी सतह पर बाल पड़ता है। इस चरण के बाद शीशागर, शीशे की चीज़ को और मज़बूती देने के लिए उसे कुछ समय के लिए भट्टी के सामने रखता है।

शीशे के बर्तन के साथ धातु का इस्तेमाल एक शैली है जिसे शीशागर, शीशे के बर्तन में विविधता लाने के लिए उपयोग करते हैं। आम तौर पर यह शैली गिलास, गुलदान और अन्य बेलनाकार चीज़ों में अपनायी जाती है। इस तरह से कि पहले तांबा या पीतल की धातु से एक बेलनाकार  जालीदार चीज़ बनायी जाती है। शीशे और धातु के संयोग के लिए पहले शीशे को गोलाकार देते हैं उसके बाद उसे बेलनाकार सांचे में रख कर उसमें फूंकते हैं। फूंकने से शीशा फैलता है और धातु के बेलनाकार सांचे को भर देता है।     

 

      

अगर शीशे की चीज़ को आम हवा में रख दे तो कुछ ही मिनट में उसकी सतह ठंडी हो जाती है जिससे वह चटख़ जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि शीशे की चीज़ को धीरे-धीरे ठंडा किया जाए। ऐसा करने के लिए हर कारख़ाने में ऐसे कमरे होते हैं जिनका तापमान कुछ घंटों में 450 से 550 सेंटीग्रेड तक करने के बाद, तापमान बढ़ाने की प्रक्रिया बंद कर देते हैं और उसमें शीशे के उत्पाद रखते हैं। 24 से 48 घंटों के दौरान इन कमरों का तापमान नीचे आ जाता है और उसमें से चीज़ें निकाली जा सकती हैं। ये उत्पाद पूरी तरह चमकदार और मज़बूत हो जाते हैं और वह बाज़ार में भेजने लायक़ होते हैं और अगर इन उत्पादों पर चित्र बनाना, या उन्हें तराशना या धुंधला करना हो तो दूसरे कारख़ाने भेजना होता है।

मिसाल के तौर पर शीशे के उत्पाद को सुंदर बनाने के लिए एक काम उस पर नक़्क़ाशी या चित्र बनाना है। आम तौर पर शीशे पर नक़्क़ाशी के लिए जिन रंगों का इस्तेमाल होता है वे पाउडर के रूप में मेटल ऑक्साइड होते हैं जिसमें तारपीन और विशेष प्रकार का तेल मिलाते हैं। दृष्टिगत गाढ़ापन आने के बाद उसके ज़रिए शीशे की चीज़ पर चित्रकारी करते हैं। शीशे की वस्तु पर चित्रकारी के बाद उस पर रंगों को स्थायित्व देने का चरण होता है। इस चरण के लिए शीशे की चीज़ को 2 से 4 घंटे तक 500 से 600 सेंटीग्रेड के तापमान में भट्टी में रखते हैं। उसके बाद भट्टी को बुझा देते हैं और जब वह पूरी तरह ठंडी हो जाती है तो उसमें से चीज़े निकालते हैं।

हाथों से शीशागरी का एक अहम तत्व, शीशे के रंग के निर्माण की शैली है। क्योंकि रंगों में जितनी विविधता होगी, शीशे की चीज़ें उतनी ज़्यादा सुंदर लगेंगी। शीशागर ज़रूरत का रंग बनाने के लिए पाउडर के रूप में मेटल ऑक्साइड का इस्तेमाल करते हैं। मिसाल के तौर पर कोबाल्ट ब्लू रंग के लिए पीतल और क्रोमियम के ऑक्साइड का इस्तेमाल करते हैं।

 

 

हाथ से बने शीशे के बहुत से उत्पादों पर तराशे हुए चित्रों के साथ बाज़ार में उतारते हैं जिससे उनका सौन्दर्य और मूल्य बढ़ जाता है। इस तरह के उत्पाद को तराशने के लिए विशेष प्रकार का पत्थर इस्तेमाल करते हैं जो शीशे से ज़्यादा मज़बूत होता है।

शीशे के उत्पाद को डिस्क की तरह के पत्थर के ज़रिए तराशा जाता है। तराशने वाली डिस्क और तराशने वाली चकरी की तेज़ी, तराश के प्रकार पर निर्भर होती है। शीशे को जितनी गहराई से तराशना होगा, चकरी को भी उतना ही ज़्यादा तेज़ी से घुमाना होता है और अगर शीशे के उत्पाद पर गहरी तराश न करनी हो तो चकरी को कम रफ़्तार से घुमाते हैं। तराशने के बाद, तराशे हुए स्थान पर पॉलिश करते हैं और फिर उसे पैक करके देश-विदेश के बाज़ार भेजते हैं। 

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