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रविवार, 14 फ़रवरी 2016 13:32

ज़िन्दगी की बहार-32

ज़िन्दगी की बहार-32

युवाओं में विभिन्न प्रकार की विशेषताएं पायी जाती हैं। जवानों की महत्वपूर्ण विशेषता, आदर्शवाद है। चूंकि वह क्योंकि जीवन के मंच पर अभी अभी प्रविष्ट हुआ है और उसके सामने प्रकाशमयी क्षितिज है इसलिए वह हमेशा वांछित स्थिति की खोज में रहता है। वह अपनी दिली उमंगों की ओर नज़र डालता है और समस्याएं उसका अधिक रास्ता नहीं रोक पातीं और वह अपनी उमंगों को व्यवहारिक बनाने के लिए अधिक हिसाब किताब भी नहीं करता। यह ऊंची उड़ान और आदर्शवाद, क्रांतिकारी भावना के जागृत होने और बाक़ी रहने में बहुत अधिक प्रभावी होती है। दूसरी ओर आशा और आशा की किरण युवाओं की स्पष्ट विशेषताएं हैं। वह इसी प्रकार अपने साहस और प्रफुल्लता व उत्साह पर भरोसा करते हुए अपने मार्ग से बड़ी बड़ी बाधाओं को दूर कर देता है।

 

इन्हीं विशेषताओं के कारण जब ईश्वरीय दूतों की विचारधाराओं और इसी प्रकार जनक्रांतियों में संघर्ष या प्रतिरोध का मुद्दा सामने आता है तो युवा अग्रिम पंक्ति में होते हैं। इस्लाम धर्म के उदय काल में भी युवा ही पैग़म्बरे इस्लाम की ओर रुझान का महत्वपूर्ण कारक थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जो इन्हीं युवाओं में से एक हैं, पूरे तन मन से इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम का बचाव किया। उन्होंने किशोरावस्था में ही सबसे पहले सत्य के निमंत्रण को स्वीकार किया और पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पूरे साहस और तत्वदर्शिता से हर मामले में पैग़म्बरे इस्लाम की सहायता की और उनका साथ दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने युवाओं को व्यक्तित्व प्रदान करते हुए, यहां तक कि अपनी आयु के अंतिम क्षणों में, समस्त महापुरुषों व अनुभवी लोगों के बावजूद ओसामा को जो एक युवा थे, इस्लामी सेना का कमान्डर नियुक्त किया और बाक़ी लोगों से कहा था कि उनका अनुसरण करें। यह विश्वास उन क्षमताओं व संभावनाओं के कारण है जो युवाओं में पायी जाती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम को जब ख़िलाफ़त मिली तो सरकार कामों का एक बड़ा भाग युवाओं के हवाले कर दिया। उदाहरण स्वरूप मुहम्मद बिन अबी बक्र की ओर संकेत किया जा सकता है जिन पर हज़रत अली को बहुत भरोसा था और उनसे विशेष लगाव  रखते थे। यही भावना इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथियों में आशूरा और करबला के आंदोलन में दिखाई दी जिसने इस आंदोलन को अमर बना दिया।

 

 

वास्तव में हर समाज में युवा वर्ग अपनी क्षमताओं, ऊर्जा और योग्यताओं के दृष्टिगत, समाज के भविष्य में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है। हमारे काल में मेधावी, बुद्धिजीवी और जागरूक युवा, इस्लामी चेतना के अग्रणी व अगुवा हैं जो अध्यातम व व्यक्तिगत तथा सामाजिक शिष्टाचार से संपन्न होकर समाज सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ईरान में भी युवा पीढ़ी, क्रांतिकारी भावनाओं व ज़िम्मेदारियों के एहसास से देश के विकास व परिवर्तनों में भूमिका निभा रही है और क्रांति तथा क्रांति की सफलता सहित विभिन्न स्तरों पर युवाओं की उपस्थिति के साक्षी रहे हैं। इस पावन धरती के युवा, होशियार, कटिबद्ध और विशेषज्ञ हैं जिन्होंने विभिन्न कालों में अनेक अवसरों पर उपस्थिति दर्ज कराई और सभी ने देश के विकास और उसकी प्रगति में योगदान दिया।

 

वर्ष 1979 में इस्लामी क्रांति के दौरान कोई भी क्रांतिकारी युवा, पद, स्थान और संपत्ति की चाह में नहीं थे बल्कि वे अपने उद्देश्य प्राप्त करने के लिए जान हथेली पर लिए अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे।  उन्होंने उस समय एक इतिहास रच दिया। इस्लामी क्रांति के दौरान ईरानी युवा, उत्साह और प्रफुल्लता से ओतप्रोत तथा सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक ज़िम्मेदारियों से संपन्न थे और बाजवूद इसके उनके पास क्रांतिकारी अनुभव नहीं थे, अत्याचारी और साम्राज्यवादी विचार धाराओं के विरुद्ध उठ खड़े हुए और ईमान और आत्म विश्वास से क्रांति को सफलता तक पहुंचाया। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह सदैव इन युवाओं से प्रेम करते थे और कहते थे कि आप प्रतिष्ठित व प्रतिभाशाली युवा, आप शिक्षित युवा जो मेरी आशा हैं, मेरी शुभ सूचना हैं, आप जहां कहीं भी हों, ईरान में जहां पर भी हों, जागरूक रहें और पूरी चेतना के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करें।

 

वह युवा जिनमें इस्लामी क्रांति और इमाम ख़ुमैनी के प्रकाशमयी विचारों की छत्रछाया में बदलाव आया, उन्होंने इस्लामी क्रांति के दौरान विशेषकर इराक़ द्वारा थोपे गये ईरान पर असमान्य युद्ध के वर्षों में अपनी भरपूर क्षमताओं और योग्यताओं तथा बलिदान का अद्वितीय नमूना पेश किया। इन्हीं युवाओं में से एक तेरह वर्षीय शहीद हुसैन फ़हमीदे था जिसने शत्रुओं की बढ़त को रोकने के लिए हाथ में हथगोला लिया और शत्रु के टैंक के नीचे लेट गया। इमाम ख़ुमैनी ने इस कार्यवाही को युवाओं की जागरूकता, चेतना और ईमान से उतपन्न कार्यवाही बताया और शहीद फ़हमीदे को समाज का नेता क़रार दिया।

 

पवित्र प्रतिरक्षा के आठ वर्षीय काल के इतिहास का पृष्ठ पलटने और इस मंच पर मूल्यवान शहीदों के चित्रों को देखकर यह पता चलता है कि इस युद्ध में प्रतिरोध और बासी शत्रु पर विजय, इन्हीं युवाओं के सही फ़ैसले लेने, युद्ध का प्रबंध और तत्वदर्शिता की देन है। इन्हीं युवाओं के बलिदान व त्याग पर क्रांति के नेता ने विश्वास किया। उस समय इमाम ख़ुमैनी की ओर से बहुत ही कम ऐसे बयान जारी होते थे जिनमें युवाओं को निमंत्रण न दिया गया हो। जैसा कि इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद थोपे गये युद्ध के दौरान युवा ही प्रतिरोध के केन्द्र थे और युद्ध में सैन्य कमान्डर भी बहुत ही छोटी आयु के युवा थे और इन्हीं लोगों ने पवित्र प्रतिरक्षा का इतिहास रचा।

 

एक इराक़ी सैनिक एक युवा ईरानी बंदी की यादगार कहानी बयान करते हुए कहता है कि हमने एक ईरानी युवा को पकड़ा। उसे हमारे मोर्चे में लाया गया। उससे हमने कहा कि क्या ईरान में सैना में भर्ती होने की उम्र 18 साल नहीं है। उसने हां में सिर हिलाया। मैंने कहा कि अभी तो तुम 18 साल के नहीं हुए? उसके बाद हमने उसकी खिल्ली उड़ाई और कहा शायद युद्ध के कारण, तुम्हारे ख़ुमैनी की यह नौबत आ गयी कि वह तुम बच्चों का सहारा ले रहे हैं और सैन्य भर्ती की आयु भी कम कर दी है किन्तु उसने जो जवाब दिया, उससे मुझे बहुत पीड़ा हुई। उसने फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में कहा, नहीं, सैन्य भर्ती की आयु में कमी नहीं की गयी है, प्रेम की आयु कम हो गयी है।

 

इमाम ख़ुमैनी सदैव इस प्रकार के युवाओं पर गर्व करते थे और कहते थे कि मैं इस प्रकार के बलिदानी, प्रतिबद्ध और साहसी युवाओं से संपन्न होने के कारण जिनका दुनिया में कोई उदाहरण नहीं मिलता और इतिहास में भी नहीं मिलता, ईरानी राष्ट्र को बधाई देता हूं। मैं, सत्य की राह में जान न्योछावर करने वाले इन युवाओं से संपन्न होने के कारण जो इस्लाम और अपनी इस्लामी धरती के लिए हर चीज़ न्योछावर कर रहे हैं, महान इस्लाम की सेवा में बधाई प्रस्तुत करता हूं कि इन्होंने न केवल दुनिया और आगामी पीढ़ी के सामने ईरान का सिर भी ऊंचा किया बल्कि इस्लाम का सिर भी ऊंचा किया कि जिसकी शिक्षाओं और प्रेरणाओं से ऐसा महा परिवर्तन उत्पन्न हुआ।

 

इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध की समाप्ति के बाद ईरान को युद्ध से होने वाले नुक़सानों की भरपाई और पुनर्निमाण की आवश्यकता थी। इस अवसर पर यह युवा सक्रिय हुए और पुनर्निमाण संस्था के सदस्य बन कर देश में नवीन आंदोलन आरंभ किया। सभी युवा एकत्रित हुए और उन्होंने अधिकारियों के कांधे से कांधा मिलाकर देश के पुनर्निमाण का कार्यक्रम बनाना आरंभ कर दिया। वह युवा जिनके हाथ में कल तक हथियार थे और शत्रु से युद्धरत थे, अब अब दूसरे प्रकार के हथियार के साथ पश्चिमी दुश्मनों के विरुद्ध संघर्ष के लिए उठ खड़े हुए और वह निर्माण और देश बनाने का हथियार था। पुनर्निमाण के काल के बाद ईरानी युवाओं ने नवीन विज्ञान विशेषकर परमाणु उद्योग के क्षेत्र में जो दुनिया के बहुत से देशों सहित हमारे देश का महत्वपूर्ण और मूल्यवान उद्योग है, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संबंध में वरिष्ठ नेता कहते हैं कि हमारे युवा, बहुत ही उत्साहित हैं, हमने जब जब भी अपने युवाओं की क्षमताओं व पहल पर भरोसा किया, तब तब उनकी क्षमताएं निखर कर सामने आयीं, परमाणु मुद्दे, दवा के मामले, विभिन्न उपचारों में, स्टेम सेल्स में, नैनो में, प्रतिरक्षा उद्योग के कार्यक्रम जैसे मामलों में।

 

चूंकि बहुत से इस्लामी देशों में बहुत से युवा, इस्लाम के नाम पर इस्लामी न्याय की सरकार की कामना में राजनैतिक, सांस्कृतिक व सामाजिक जेहाद करते हैं और विदेशी साम्राज्यवाद के वर्चस्व और उसकी थोपी गयी चीज़ों के मुक़ाबले में डटे रहने का संकल्प, अपने समाज में फैलाते हैं। इस्लामी जगत के एक क्षेत्र फ़िलिस्तीन में बहुत से पुरुष और महिलाएं, इस्लाम के ध्वज तले अपनी जानों की आहुति देकर स्वाधीनता, प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता के नारों से अमर इतिहास रच रही हैं और उन्होंने साम्राज्यवादियों की भौतिक शक्तियों के सामने अपने साहस और शौर्य का अद्वितीय नमूना पेश किया है। जागरूकता और तत्वदर्शिता के साथ युवाओं ने साम्राज्यवादियों के सारे समीकरणों पर पानी फेर दिया है। (AK)

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