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बुधवार, 03 फ़रवरी 2016 13:33

डाक्टर अबुलहसन नजफी और उनकी आशंकाएं

डाक्टर अबुलहसन नजफी और उनकी आशंकाएं

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने बड़ी ख़ामोशी के साथ सेवा की और सफल जीवन गुज़ार कर इस दुनिया से चले गए। वह महान साहित्यकार थे। वह आधुनिक और प्राचीन साहित्य दोनों का गहरा ज्ञान रखते थे। उन्हें भाषा की गहराई और कोमलता का पूरा बोध था। वह धीरे धीरे साहित्य की दुनिया में बहुत ऊंचाई पर पहुंच गए। उन्होंने अपनी रचनाओं से लोगों के हृदय में जगह बनाई। उन्होंने फ़्रांसीसी लेखकों की कई रचनाओं का फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया।

 

 

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी की आयु का बड़ा भाग टेक्स्ट एडिटिंग में बीता। उन्होंने ईरान में संपादन के नियम निर्धारित किए। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी को यह देखकर बड़ा दुख होता था कि फ़ारसी भाषा में व्याकरण की ग़लतियां फैल रही हैं और कुछ लोग अपनी बातचीत में और लेखन में यह ग़लतियां कर रहे हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि इस दौर में जब फ़ारसी भाषा को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है और लोग लेखन से दूर होते जा रहे हैं तो संपादकों की ज़िम्मेदारी है कि सही लेखन को प्रचलित करने का रास्ता खोजें। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ग़लत न लिखें। पहली बार यह पुस्तक वर्ष 1987 में छपी और उसके बाद इसका बार बार प्रकाशन हुआ। यह पुस्तक उन्होंने उस समय लिखी जब वो युनिवर्सिटी के प्रकाशन विभाग से सहयोग कर रहे थे। यह ईरान का बहुत पुराना पब्लिकेशन माना जाता है। इस पुस्तक में डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने फ़ारसी बोलचाल और लेखन में आम तौर पर होने वाली ग़लतियों को एकत्रित किया है। इसमें इमला की ग़लतियां भी रेखांकित की गई हैं और व्याकरण की ग़लतियों के बारे में भी बताया गया है। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने यह पुस्तक लिखी जिसे बहुत पसंद किया गया लेकिन बाद में उन्होंने इस पुस्तक की आलोचना भी लिखी और पुस्तक की कमियों को रेखांकित किया। उनका कहना था कि जिस तरह की किताब वह लिखना चाहते थे नहीं लिख पाए। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का कहना था कि मैंने अपनी पुस्तक में शब्दों की ग़लतियॉं पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जबकि वाक्यों की ग़लतियों अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने यह तय कर लिया था कि वह अपनी पुस्तक का संपादन करेंगे और उसके बाद इसे अधिक संपूर्ण रूप में प्रकाशित करेंगे यदि उनकी यह इच्छा पूरी होती तो यह पुस्तक कम से कम तीन खंडों पर आधारित होती मगर मौत ने उन्हें इतनी मोहलत नहीं दी।

 

 

आप जब कोई किताब उठाकर उसके पन्ने पलटते हैं तो आपको यह अंदाज़ा नहीं होता कि इन पंक्तियों को लिखने में और एक एक पृष्ठ पर विचारों को शब्दों के रूप में ढालने में कितनी मेहनत की गई है। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने एक किताब लिखी  जिसका नाम था फ़रहंगे फ़रसिए आमियाने, इस पुस्तक में उन्होंने तेहरान शहर के रहने वालों की बोलचाल और मुहाविरों को एकत्रित किया है। उन्होंने उदाहरणों के चयन के लिए मोहम्मद अली जमालज़ादे की दो पुस्तकों का सहारा लिया।

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी ने फ़्रांस में शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने भाषा विज्ञान की शिक्षा ली और यही सबजेक्ट उन्होंने पढ़ाया। उन्होंने भाषा विज्ञान और उसकी उपयोगिता नाम की पुस्तक में बड़े सादे अंदाज़ में भाषा विज्ञान का उल्लेख किया है।

 

 

अनुवाद भी डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी की साहित्यिक सेवा का एक बड़ा भाग है। उन्होंने फ़्रांसीसी भाषा की पुस्तकों का अनुवाद फ़ारसी भाषा में किया। वह शुरू में ही लोगों के लिए नमूना बन गए और बाद के साहित्यकारों ने उन्हीं के अंदाज़ में साहित्यिक काम किए। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी तथा उनके जैसे अनुवादकों की देन है कि बीसवीं शताब्दी का फ़्रांसीसी साहित्य ईरानियों तक पहुंचा और यह भी पता चला कि साहित्यिक पुस्तकों का अनुवाद किस तरह किया जाना  चाहिए।

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी कहते थे कि यह ज़रूरी नहीं है कि किसी को फ़ारसी भाषण के साथ ही विदेशी भाषा भी आती हो तो वह अच्छा अनुवादक भी है। दोनों भाषाओं के ज्ञान के साथ ही कुछ दक्षताओं का होना भी ज़रूरी है। जैसे कि विषय का पूरा ज्ञान भी अनुवाद पर गहरा असर डालता है। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का कहना था कि अनुवाद में केवल शब्दों को रापांतरित कर देना काफ़ी नहीं है बल्कि इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है कि अर्थ सही रूप में स्थानान्तरित होना चाहिए। उनका कहना था कि अनुवाद में बस यह काफ़ी नहीं है कि हम पढ़ने वाले को समझा दें कि इस पुस्तक के लेखक ने क्या लिखा है बल्कि  यह बताना भी ज़रूरी है कि लेखक ने किस अंदाज़ से अपनी यह बात बयान की है।

 

 

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का अनुवादकों पर बड़ा एहसान है। उन्होंने वैज्ञानिक विषयों तथा साहित्यिक विषयों की पुस्तकों के अनुवाद के अलग अलग तरीक़े बयान किया है और यह समझाया है कि दोनों प्रकार की पुस्तकों के अनुवाद की शैली अलग अलग है। उनका कहना था कि सबसे पहले यह निर्धारित होना चाहिए कि किस प्रकार की पुस्तक का अनुवाद किया जाना है। विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद करना हो तो अर्थों को स्थानान्तरित करना आवश्यक होता है यह महत्वपूर्ण नहीं होता कि अनुवाद साहित्य की दृष्टि से कितनी उच्च कोटि का है। उसमें यह ज़रूरी नहीं है कि बहुत अच्छे मुहावरों और उपमाओं का प्रयोग किया जाए। जबकि साहित्य की पुस्तक का अनुवाद करते समय जितना अर्थ को स्थानान्तरित करना ज़रूरी होता है लेखन के साहित्यिक रूप को भी स्थानान्तरित करना भी उतना ही ज़रूरी होता है। डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का कहना था कि अनुवाद करने वाले को चाहिए कि अनुवाद करते समय बार बार वाक्यों को पढ़े और यह देखे कि एक पाठक के रूप में क्या यह सारे वाक्य उसके लिए सरलता से समझ में आने वाले हैं या नहीं। उसके मन में यह बात हो कि लेखक ने जो किताब लिखी है यदि वह उसी किताब को उस भाषा में लिखता जिसमें अनुवाद किया जा रहा है तो किस प्रकार लिखता और किन वाक्यों का प्रयोग करता। शब्दशः अनुवाद ठीक नहीं है। ईमानदारी के साथ अनुवाद उसे कहा जाता है जिसमें अर्थ पूरी तरह स्थानान्तरित हो।

 

 

डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का जन्म वर्ष 1929 में इराक़ के नजफ़ नगर में हुआ था। उन्होंने हमेंशा फ़ारसी साहित्य में रूचि ली और इसी मैदान में काम किया। उन्होंने बड़ी संख्या में पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद किया। हर शुक्रवार को उनके घर साहित्यकारों की बैठक होती थी जहां बड़ी मज़ेदार चर्चाएं हुआ करती थीं। वर्षों की बीमारी के बाद जनवरी 2016 में डाक्टर अबुल हसन नजफ़ी का निधन हुआ और वह अपने साथियों को दुखीकर इस संसार से सिधारे।

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