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रविवार, 31 जनवरी 2016 16:56

ईश्वरीय वाणी-७३

ईश्वरीय वाणी-७३

सूरे अर्रहमान में बयान किये गये विषय व्यापक रूप से इस प्रकार से हैं। सृष्टि की बड़ी नेअमतें, शिक्षा व प्रशिक्षा प्रल्य के दिन इन्सान के कर्म का हिसाब- किताब, नाप- तौल, इंसान के आराम व कल्याण के साधन, इंसान की शारीरिक एवं आत्मिक मूखा, इंसान और जिन्नात की रचना, धरती और आकाश में महान ईश्वर की निशानियां, स्वर्ग की नेअमतें जैसे बाग, नहर, और बहुत ही सुन्दर पत्नियां और हर प्रकार के कल्याण की सुविधायें और अपराधियों व पापियों का दर्दनाक अंजाम।

 

 

इस सूरे में स्वर्ग में मिलने वाली नेअमतों की विशेषता इस प्रकार बयान की गयी है कि ये नेमतें मोमिनों के दिले को आशा और खुशी से भर कर दुःख को उनके दिलों से दूर करती हैं।  

इस सूरे में महान ईश्वर ने इंसान और जिन्नात को संबोधित करके बार- बार कहा है कि तुम यानी इंसान और जिन्नात किन- किन नेअमतों को झुठलाओगे। कहने का तात्पर्य यह है कि महान ईश्वर द्वारा प्रदान की गई नेअमतें इतनी अधिक हैं कि इंसान और जिन्नात दोनों मिलकर उन्हें झुठला नहीं सकते और बार- बार इस आयत की पुनरावृत्ति ने कि तुम इंसान और जिन्नात ईश्वर की किन -किन नेअमतों को झुठलाओगे, इस सूरे को विशेष व आकर्षक अर्थ व स्वरूप प्रदान कर दिया है।  पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं “हर चीज़ की दुल्हन होती है और कुरआन की दुल्हन सूरे अर्रहमान है।“

सूरे रहमान की 1से 4 तक की आयतों का अनुवाद इस प्रकार है” ईश्वर बड़ा दयालु व कृपालु है उसी ने कुरआन सिखाया है उसी ने इंसान की रचना की और उसे बोलना सिखाया। अर्रहमान महान ईश्वर के नामों एवं उसकी विशेषताओं में से है। अल्लाह शब्द के बाद रहमान शब्द के उल्लेख का व्यापक अर्थ होता है यानी यह महान ईश्वर की वह विशेषता है जिसमें नास्तिक और ग़ैर नास्तिक सब शामिल हैं और उसकी कृपा व दया सब पर है जबकि रहमत विशेष दया व कृपा है और उसमें महान ईश्वर के केवल अच्छे बंदे ही शामिल हैं। महान ईश्वर अद्वितीय नेअमत पवित्र कुरआन के बयान करने के बाद इंसान के पैदा करने की बात करता है।

 

 

 

वास्तव में इंसान इस ब्रह्मांड की अद्वितीय नेअमत है। इंसान महान ईश्वर की कृपा की छत्रछाया में परिपूर्णता का वह चरण पूरा करता है जहां सर्वश्रेष्ठ प्राणी ही पहुंच सकता है। पवित्र कुरआन के बाद इंसान का उल्लेख विचारयोग्य है। क्योंकि कुरआन और इंसान दोनों इस विस्तृत व विशाल ब्रह्मांड की अद्वितीय नेअमते हैं। महान ईश्वर इंसान के पैदा करने के बाद एक महत्वपूर्ण नेअमत की ओर संकेत करता और फरमाता है हमने उसे यानी इंसान को बोलना सिखाया। इंसान की परिपूर्णता और प्रगति में बोलने का जो असाधारण महत्व है वह किसी से छिपा नहीं है। अगर यह बड़ी नेअमत न होती तो इंसान अपने ज्ञानों व अनुभवों को दूसरों तक स्थानांतरित नहीं कर सकता था जो ज्ञान, सभ्यता, व्यवहार और धर्म में प्रगति का कारण बनता है। उसके बाद की आयत एक बहुत ही महत्वपूर्ण भौतिक व आध्यात्मिक नेअमत का उल्लेख करती है और संबोधक को इस महान नेअमत के वास्वविक स्वामी से अवगत कराती और कहती है” सूरज और चांद एक नियत हिसाब से चल रहे हैं।“

सूरज इंसान और दूसरे समस्त प्राणियों के लिए बहुत ही मूल्यवान नेअमत है क्योंकि प्रकाश और गर्मी के बिना ज़मीन पर जीवन ही संभव नहीं है और सूरज की गर्मी और प्रकाश ज़मीन पर हर गति का स्रोत है। ज़मीन पर वनस्पतियों का बढ़ना, खाद्य पदार्थों का तैयार होना, वर्षा का होना और हवा का चलना यह सब ईश्वरीय नेअमत सूरज के कारण ही है।

 

 

चांद की भी इंसान के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है। चांद रात के अंधेरों का दीपक है और उसके ही प्रभाव से सागरों व महासागरों में ज्वारभाटा आता है और वह समुद्रों में जीवन के बाक़ी रहने का महत्वपूर्ण कारक है।  

सिद्धांतिक रूप से सूरज का चलना और ज़मीन का अपने ध्रुव और सूरज के चारों ओर चक्कर लगाना रात- दिन और विभिन्न मौसमों का कारण बनता है। साथ ही वह इंसान के जीवन के व्यवस्थित होने का कारण है अगर यह सूक्ष्म व्यवस्था न होती तो इंसान का जीवन कदापि व्यवस्थित नहीं हो सकता था। सूरज, चांद और ज़मीन सहित ब्रह्मांड की जितनी भी चीज़ें चल रही हैं उनकी चाल बहुत ही सूक्ष्म है यही नहीं उनमें से हर एक की दूसरे से दूरी और एक दूसरे की ओर खिंचाव बहुत ही सूक्ष्म है। निः संदेह अगर इनमें से कोई एक दूसरे से टकरा जाये तो ब्रह्मांड की जो व्यवस्था है उसमें और इंसान के जीवन में विघ्न उत्पन्न हो जायेगा यहीं नहीं अगर एक ग्रह दूसरे ग्रह से टकरा जाये तो दुनिया का जीवन ही समाप्त हो जायेगा। दूसरे शब्दों में इस ब्रह्मांड की व्यवस्था इतनी सूक्ष्म है कि भविष्य में होने वाली बहुत सी घटनाओं की सूचना मिनट और सेकेन्ड के साथ दी जा सकती है। जैसे सूर्यग्रहण या चांद ग्रहण।

सूरे रहमान की 6ठी आयत इस ओर संकेत करती है कि महान ईश्वर के समक्ष वनस्पति और वृक्ष सहित समस्त चीज़ें  नतमस्तक हैं। आयत कहती है।” वनस्पति और वृक्ष उसका सज्दा करते हैं।“

 

 

वनस्पति और वृक्षों द्वारा सज्दे का अर्थ महान ईश्वर और सृष्टि के कानूनों के समक्ष इंसानों के हितों के लिए उनका नतमस्तक होना है। महान ईश्वर ने जो कार्य व मार्ग उनके लिए निर्धारित किया है किसी प्रकार की कमी के बिना वे उसे तय कर रहे हैं। साथ ही यह आयत उनके एकेश्वरवाद की ओर भी संकेत करती है क्योंकि वनस्पति के हर पत्ते और हर दाने में महान ईश्वर के असीम ज्ञान की विचित्र निशानियां मौजूद हैं और वे उसके आदेश से ज़मीन को चीर कर निकलती और बड़ी होती हैं।

सूरे रहमान की 7 से 9 तक की आयतों का अनुवाद इस प्रकार है” उसी ने आसमान को ऊंचा किया और तराज़ू को क़ाएम किया ताकि तुम नाप- तौल में सीमा से आगे न बढ़ो और न्याय से ठीक तौलो और उसमें कमी न करो।“

इन आयतों में ईश्वरीय नेअमत आसमान की ओर संकेत किया गया है। हमारे जीवन में आसमान के अननिगत लाभ हैं वह हानिकारक किरणों और आसमानी पत्थरों के मुकाबले में कवच की भांति हमारी रक्षा करता है। दूसरे शब्दों में आसमान वह अद्वितीय ईश्वरीय नेअमत है जिसके बिना इंसान का जीवन संभव नहीं है।

 

 

जी हां प्रकाश और गर्मी जीवन का स्रोत है और वह आसमान की ओर से आती है और जो वर्षा होती है वह भी आसमान से होती है। इसके अतिरिक्त इतने बड़े आसमान का किसी प्रकार के स्तंभ के बिना खड़ा होना स्वयं अपने आप में महान ईश्वर की बहुत बड़ी निशानी है। वह महान ईश्वर को पहचानने और उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करने में इंसान की सहायता करता है। जब बुद्धिमान लोग आसमान के बारे में सोचते हैं तो वे बरबस कह उठते हैं कि महान ईश्वर ने इतने बड़े आसमान को अकारण पैदा नहीं किया है। उसके बाद पवित्र कुरआन की आयत तराज़ू व नाप- तौल की ओर संकेत करती है। आयत में मीज़ान शब्द का प्रयोग किया गया है। हर उस चीज़ को मीज़ान कहते हैं जिससे मापा जाता है। जैसे इंसान की बुद्धि भी एक प्रकार की मीज़ान है क्योंकि इससे सत्य-असत्य को मापा जाता है और इससे इंसानों के मूल्यों एवं विभिन्न सामाजिक चरणों में उसके अधिकारों व बातों को तौला जाता है। उसी तरह तराज़ू को भी मीज़ान कहा जाता है।

सारांश यह कि शब्दकोष में मीज़ान का अर्थ तराज़ू है परंतु जिस तराज़ू की ओर आसमान की सृष्टि के बाद संकेत किया गया है उसका अर्थ विस्तृत है और उसमें हर मापक शामिल है। सिद्धांतिक रूप से आसमान का फैला होना और आसमान में मौजूद वस्तुओं के मध्य सूक्ष्म क़ानून व व्यवस्था का होना सही माप के बिना संभव नहीं है। एक नतीजा निकालते हुए बाद की आयत कहती है कि ब्रह्मांड में मापक क़रार देने का उद्देश्य यह है कि तुम भी न्याय का ध्यान रखो और नाप- तौल में कमी न करो और उसमें उद्दंडता न करो। चूंकि इंसान भी इस विशाल ब्रह्मांड का एक भाग है इसलिए वह एक अनुचित पैवंद की भांति इस ब्रह्मांड में नहीं रह सकता।

 

 

सूरे रहमान की नवीं आयत एक बार फिर न्याय पर बल देती और कहती है” और न्याय के साथ तौलो और तौलने में कमी न करो।“

इंसान के जीवन में न्याय का महत्व इतना अधिक है कि अगर एक दिन इसी तराज़ू को जीवन से हटा दें तो जीवन में चीज़ों के आदान- प्रदान में बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना होगा। इन आयतों के दृष्टिगत यह स्पष्ट हो जाता है कि समूचे ब्रह्मांड, मानव समाज, सामाजिक संबंध या कारोबार एवं व्यापार में तराज़ू का होना बहुत महत्वपूर्ण ईश्वरीय नेअमत है।

इस प्रकार महान ईश्वर ने ब्रह्मांड में मीज़ान व मापदंड क़रार दिया है ताकि इंसान उसमें उद्दंडता न करें और न्याय के मार्ग से न हटें। इसी प्रकार आयत में न्याय के विशेष अर्थ पर ध्यान दिया गया है और इस आयत में महान ईश्वर इंसानों का आह्वान करता है कि वे लेन- देन में कम न तौलें।

10वीं आयत ज़मीन की ओर संकेत करते हुए कहती है” ईश्वर ने ज़मीन को सृष्टि के लिए क़रार दिया है।“

 

 

महान ईश्वर की इस बड़ी नेअमत को इस और दूसरी आयतों में पालने के रूप में याद किया गया है। ज़मीन इंसान, जिन्नात और दूसरे समस्त प्राणियों व चीज़ों के लिए सुकून चैन का ठिकाना है। हममें से अधिकांश ज़मीन के महत्व और उसमें मौजूद आराम पर ध्यान नहीं देते हैं पंरतु जब हल्का सा भूकंप अधिकांश चीज़ों को दरहम- बरहम कर देता है और उनमें विध्न उत्पन्न कर देता है तो हमारा ध्यान इस वास्तविकता की ओर जाता है कि यह आराम व शांतिदायक ज़मीन, कितनी बड़ी ईश्वरीय नेअमत है। विशेषकर जब हम ज़मीन के अपने और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने की तीव्रता के बारे में सोचें तो उस समय इतनी तीव्र चाल के साथ उसके शांत होने के महत्व को अधिक बेहतर ढंग से समझेंगे।

सूरे रहमान की 11वीं आयत में महान ईश्वर कहता है और उसमें मेवे और खजूर के पेड़ हैं।

पवित्र कुरआन की यह आयत विभिन्न प्रकार के फलों के साथ खजूर की ओर संकेत करती है। संभव है कि खजूर के नाम का उल्लेख इंसान के लिए इस फल की विशेषता और उसके लाभ के कारण हुआ हो। यह भी संभव है कि खजूर के फल की इस प्रकार विशेषता उसकी सुन्दरता के कारण हो या उन हितों व लाभों के कारण हो जो उस पर चढ़े ग़लाफों में नीहित हैं।

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