मंगलवार, 07 जून 2011 16:18

इमाम अली नक़ी (अ स) की शहादत

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजन ऐसे परिपूर्ण और चुने हुये इन्सान हैं जिनके शब्द, व्यवहार और प्रवृत्ति सब कुछ पवित्र मानव जीवन के लिये कसौटी और आदर्श तथा महान ईश्वरीय मूल्यों का दर्पण है। महान ईश्वरीय विशेषताओं और गुणों के इन अमर प्रतीकों की पहचान और उनके आचरण एवं व्यवहार का अनुसरण,लोक-परलोक की सफलताओं की प्राप्ति का मार्ग है।आज इमाम अलीनक़ी (अ) की शहादत की बर्सी है। वर्ष २५४ हिजरी क़मरी में आज ही के दिन इमाम अली नक़ी (अ) को अब्बासी शासक ने षड्यन्त्र रच कर शहीद किया था। धर्म की रक्षा और लोगों में ज्ञान व चेतना के विस्तार के लिये प्रयास पैग़म्बरे इस्लाम(स) के परिजनों के सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की मुख्य विशेषताओं में से थे। इमाम अली नक़ी(अ) के जीवन में कि जिनका एक उपनाम हादी अर्थात मार्गदर्शक भी है, ऐसी अनेक घटनायें घटीं जो कभी जनता की अज्ञानता और कभी शक्ति और धन के पुजारियों और भ्रष्ट शासकों के षड्यन्त्रकारी क्रिया-कलापों के कारण इस्लामी समाज के लिये ख़तरा उत्पन्न कर देती थीं। इमाम हादी(अ) की इमामत के काल में इस्लामी समाज में विभिन्न आस्थायें और विचारधारायें फैल गयी थीं। उदाहरण स्वरूप ईश्वर को आखों से देखने की विचारधारा, या मनुष्य की अपने सभी कर्मों के लिये विवशता जैसी विचाधारा अर्थात मनुष्य सभी अच्छे बुरे कर्म ईश्वर की इच्छा से ही करता है, या इसके विपरीत अर्थात मनुष्य अपने समस्त कर्मों या उसके जीवन में जो कुछ होता है उस सब के लिये स्वयं ही जिम्मेदार है, ईश्वर की ओर से कुछ नहीं है, इसी प्रकार यह विचारधारा कि ईश्वर शरीर धारण किये हुये है तथा सूफी विचारधारा आदि यह सब विचारधारायें उस समय के समाज में व्याप्त थीं। इन ग़लत विचारधाराओं का स्रोत अब्बासी शासन की सांस्कृतिक नीतियां थीं। जबकि दार्शनिक व भौतिक विचारधारायें दूसरे राष्ट्रों से आकर इस्लामी-समाज में फैली थीं। अब्बासी शासक मामून के काल से यूनानी दर्शन शास्त्र की पुस्तकों के अरबी में अनुवाद का कार्य आरंभ हुआ था। बताया जाता है कि अनुवादकों को अनुवादित पुस्तकों के भार के बराबर सोना दिया जाता था। अलबत्ता, इतना बड़ा ख़र्चा ज्ञान प्रेम और ज्ञान विस्तार के लिये नहीं था बल्कि ये शासक, गै़र इस्लामी शिक्षाओं और ज्ञानों को मुसलमानों के बीच फैलाना चाहते थे और इसके लिये वे अन्य मतों और विचारधाराओं के बुद्धिजीवियों के साथ पैगम्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के शस्त्रार्थ की सभायें भी आयोजित करवाते थे। इन सभाओं का एक अन्य उद्देश्य पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के मत और विचारधारा को कमज़ोर सिद्ध करना भी होता था, यह और बात है कि उन्हें अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में कभी सफलता नहीं मिल सकी। दूसरी ओर शासकों की इस प्रकार की कार्यवाहीयों और बाहरी व ग़लत विचारधाराओं के समाज में व्याप्त होने से इस्लामी समाज की एकजुटता भी प्रभावित हो रही थी और उसका लाभ भी अब्बासी शासक पैग़म्बरे इस्लाम(स) के परिजनों से अपनी शत्रुता करने और उनकी विचारधारा के प्रसार को रोकने की दिशा में उठा रहे थे।

इमाम अली नक़ी(अ) अपने काल में अपनी बुद्धीमत्ता और उपायों से अब्बासी शासकों की धर्म विरोधी योजनाओं को जनता के सामने स्पष्ट कर देते थे। यद्यपि इमाम(अ) पर अब्बासी शासकों द्वारा कड़ी दृष्टि रखी जाती थी और अपने मानने वालों से इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का सम्पर्क बहुत सीमित था फिर भी वे समाज की वैचारिक पथभ्रष्टता को रोकने के लिये उपाय करते रहते थे। इमाम अली नक़ी(अ) क़रआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम(स) के कथनों के आधार पर इन पथभ्रष्टताओं से बचने के लिये बुद्धि के प्रयोग पर विशेषरूप से बल देते थे। वे एक वाक्य में बुद्धि के महत्व पर पर बल देते हुये कहते हैं - "मनुष्य के लिये ईश्वर की प्रथम अनुकंपा उसकी बुद्धि का स्वस्थ होना है। ईश्वर ने बुद्धी की परिपूर्णता द्वारा ही मनुष्य को अपनी अन्य रचनाओं पर श्रेष्ठता प्रदान की है।" इमाम अली नक़ी(अ) ने बुद्धि और विचार के स्थान की व्याख्या करके मनुष्य को उसकी विशेष व असाधारण क्षमताओं से अवगत करवाया है और बुद्धि को पहचान के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में प्रस्तुत किया है।वास्तव में बुद्धि मनुष्य को मार्गदर्शन के स्रोत अर्थात ईश्वर,उसके दूतों और दूतों के उत्तराधिकारियों की ओर ले जाती है और इनसे जुड़ कर व्यक्ति, सही और ग़लत मार्ग की पहचान कर सकता है। इमाम अली नक़ी(अ) के काल में समाज में फैलने वाली ग़लत विचारधाराओं में से एक सूफ़ी विचारधारा थी। इस विचारधारा का अनुसरण करने वाले लोग, स्वंय को ईश्वर की पहचान रखने वाले उपासक और त्यागी का रुप बनाकर लोगों को सही मार्ग से भटका देते थे। वे मस्जिदुन्नबी जैसे पवित्र स्थलों पर एकत्रित होकर, एक साथ ईश्वर का जाप करके और मनगढ़ंत उपासनाओं द्वारा स्वंय को एकेश्वरवादी एवं अत्यन्त सदाचारी दिखाने का प्रयास करते थे।इमाम अली नक़ी अ ने इस गुर से निपटने के लिये समय पर अचित प्रतिक्रिया दिखायी और उनकी धूर्तता का पर्दा फ़ाश कर दिया। एक अन्य गुट, जिसे " मुजस्समीया" के नाम से जाना जाता था, ईश्वर के साकार होने में विश्वास रखता था। उन्हें धर्म का बहुत ही कम ज्ञान था और भौतिकता से परे किसी अस्तित्व की कल्पना करने की क्षमता नहीं रखते थे। अत: वे सृष्टि की वास्तविकता को जो तत्व या पर्दाथ की सीमा से बाहर हो उसको स्वीकार नहीं करते थे या फिर उसे भौतिकता की सीमा तक नीचे खींच लाते थे। मुसलमानों के बीच इस प्रकार की विचार धारा के फैलने का समाचार इमाम हादी के पास भी पहुंचा। इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम ने एक पत्र लिखकर ईश्वर को इन बातों से परे बताया। आप सदैव विभिन्न अवसरों पर बताते रहते थे कि दर्शक केवल उस वस्तु को अपनी आखों से देख सकता है जो स्वंय उसी की भान्ति भौतिक शरीर रखती हो अत: केवल इसी स्थिति में ईश्वर को देखा जा सकता है, वे इस संबन्ध में लिखते हैं पवित्र है वह ईश्वर जिसकी कोई सीमा नहीं है। उसे कदापि इस प्रकार परिभाषित नहीं किया जा सकता। उसका कोई समकक्ष नहीं है और वह सुनने वाला एवं सर्वज्ञानी है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों के वैचारिक एवं सांस्कृतिक प्रयासों का एक भाग मुसलमानों के बीच इमामत अर्थात धार्मिक नेतृत्व के महत्व की व्याख्या से विशेष है। इस विषय की हर समय से अधिक इमाम हादी अलैहिस्सलाम के काल में आवश्यकता थी क्योंकि उस काल में पैग़म्बरे इस्लास सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों की विचारधारा के मुक़ाबले पर अनेक मतों और विचारधाराओं को लाया जा रहा था। यद्यपि अब्बासी शासकों की ओर से इमाम की कड़ी निगरानी की जाती थी, किन्तु इमाम हादी अ ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों के महत्व व उच्च स्थान को ब्यान करने में कभी संकोच नही किया। वे ज़्यारते जामेउ के नाम से प्रसिद्ध दुआ में लिखते हैं": सलाम हो मार्ग दर्शक इमामों पर, अंधकार के चिराग़ों पर, सदाचारिता के ध्वजों और बुद्धिमान व्यक्तित्वों पर। आप पर सलाम हो हे कृपा की रवान! और ईश्वरीय पहचान के खज़ाने! आप ने ईश्वर को उसकी महानता के साथ याद किया और उसकी महानता की प्रशंसा की। ईश्वर की उपसना को निरंतरता प्रदान की, और उससे किये हुये वादों को निभाया और आपने लोगों को तर्क, तत्वदर्शिता और अपदेशों के साथ सत्य की ओर बुलाया। धर्म की स्थापना में (अपने प्रयासों से) ईश्वर को प्रसन्न किया और ईश्वरीय पैग़म्बरों द्वारा दिये गये सभी आदेशों की पुष्टि की।इस प्रकार कड़ी राजनैतिक घुटन और आस्था एवं विचार संबंधी संदेह जो उस समय के मुस्लिम समाज में फैले हुये थे वह कठिनाईयां थीं जो यदी इमाम अली नक़ी अ की सूझ बूझ और युक्तियां न होती तो इस्लाम के विचार और अस्था संबधी आधारों को कमज़ोर बना देतीं। इमाम अ द्वारा अपना वकील और प्रतिनिधि नियुक्त करने की प्रक्रिया बहुत ही दूरदर्शिता वाला कार्य था। ऐसा कार्य जिसने इस्लामी समाज को, इमाम अली नक़ी अ की शहादत के पश्चात अनेक संकटों से बड़ी सीमा तक सुरक्षित रखा। यह गुप्त संपर्क जो जनता और इमाम के बीच उनके प्रतिनिधियों द्वारा निरन्तर स्थापित था उसने जनता के वैचारिक मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई।इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का एक स्वर्ण कथन हैः लोग संसार में धन और सुख समृद्धि द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं परन्तु परलोक में उनके कर्मों के आधार पर उनका हिसाब किताब होगा और प्रतिदान दिया जायेगा।

 

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