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सोमवार, 09 फ़रवरी 2015 12:52

22 bahman

 22 bahman

                                                    

३६ वर्ष पूर्व २२ बहमन १३५७ हिजरी शम्सी अर्थात ११ फरवरी १९७९ को ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हुई थी। उस समय से आज तक इस अवसर पर पूरे ईरान में खुशी और जश्न मनाया जाता है। ईरान की इस्लामी क्रांति के आरंभ से उसके शत्रुओं ने इस्लामी जगत में एकता को लक्ष्य बनाया है ताकि जागरुकता के केन्द्र ईरान की इस्लामी क्रांति के समक्ष नाना प्रकार की चुनौतियां उत्पन्न कर सकें परंतु ईरान की जनता ने अपनी जागरुक व एकजुट उपस्थिति से शत्रुओं के षडयंत्रों पर पानी फेर दिया है। २२ बहमन की विराट रैली में लोगों की उपस्थिति इस्लामी क्रांति के मूल्यों के प्रति कटिबद्ध रहने की सूचक है। साथ ही  यह महारैली इस बात की भी परिचायक है कि ईरानी राष्ट्र इस्लामी क्रांति के संदेशों व आकांक्षाओं की सुरक्षा हेतु कुर्बानी देने में न तो किसी प्रकार के संकोच से काम लिया है और न लेगा।

 

 

गत ३६ वर्षों के दौरान ईरान की इस्लामी क्रांति को नाना प्रकार की समस्याओं का सामना रहा है और वह समस्त समस्याओं का सामना करते हुए आगे बढ रही है और उसने कभी भी इस बात की अनुमति नहीं दी कि वर्चस्ववादी शत्रु राजनीतिक,आर्थिक या सैनिक धमकी से ईरान को प्रगति से रोक दें। आज विकास और प्रगति की दृष्टि से ईरान, क्षेत्रीय देशों के मध्य पहले स्थान पर है और यह समस्त सफलताएं व प्रगतियां शत्रुओं के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने प्राप्त की हैं और उसकी यह सफलताएं ईरानी राष्ट्र की प्रतिष्ठा के शत्रुओं का करारा उत्तर हैं। ईरानी राष्ट्र का प्रतिरोध विश्व के स्वतंत्रता प्रेमी राष्ट्रों के लिए आशा की किरण बन चुका है। ईरान की इस्लामी क्रांति ने विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियों के राजनीतिक समीकरणों को परिवर्तित कर दिया है। ईरान की इस्लामी क्रांति ने विश्व की ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

वास्तव में आज पूरा विश्व जनमत ईरानी राष्ट्र की महानता को २२ बहमन की रैली में नहीं देख रहा है बल्कि वह समस्त क्षेत्रों में ईरान की असाधारण व ध्यान योग्य प्रगति को उसकी प्रतिष्ठा के रूप में देख रहा है और उसकी इस सफलता से विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियां विशेषकर अमेरिका क्रोधित है। इसी कारण विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियां  इस्लामी क्रांति और ईरानी राष्ट्र की शक्ति के समस्त प्रतीकों को कमज़ोर करने की चेष्टा में हैं।

 

 

ईरान गत ३६ वर्षों से वर्चस्ववादी शक्तियों के समक्ष पूरे साहस के साथ डटा हुआ है और उसने अपने प्रतिरोध से यह दर्शा दिया है कि इस्लामी मूल्यों व आकांक्षाओं पर प्रतिबद्ध रहकर विश्व साम्राज्य के समक्ष चुनौती खड़ी की जा सकती है। ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रभाव को हालिया वर्षों में उत्तरी अफ्रीक़ा से लेकर क्षेत्र में आने वाली जनक्रांतियों में देखा जा सकता है और साम्राज्यवादी तथा उन पर निर्भर शक्तियां ईरान के इस्लामी क्रान्ति के प्रभाव से भयभीत हो गयीं और उनकी प्रतिक्रिया को ईरान की इस्लामी क्रांति एवं इस्लामी व्यवस्था से शत्रुता के रूप में देखा जा सकता है।

 

गत ३६ वर्षों के दौरान ईरानी राष्ट्र ने अपनी मांगों व आकांक्षाओं पर बल दिया है और वह कभी भी ईरान के शत्रुओं के समक्ष नतमस्तक नहीं हुआ। ईरान के शत्रुओं ने इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के वर्षों में आर्थिक और सैनिक क्षेत्रों में विभिन्न समस्याएं उत्पन्न करके बहुत प्रयास किया तेहरान को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दें परंतु उनके दबावों से न केवल ईरान ने घुटना नहीं टेका बल्कि इस्लामी मूल्यों के महत्व में कोई कमी नहीं आई। क्योंकि लोग सदैव शत्रुओं की अवैध मांगों के समक्ष डटे हुए हैं और यह २२ बहमन को होने वाली महारैली का शत्रुओं के नाम महत्वपूर्ण एवं स्पष्ट संदेश है।

अगर हम ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध को देंखे तो हमारी समझ में आ जायेगा कि लोगों को सही रास्ता मिल गया और वे भलिभांति जानते हैं कि सुरक्षा, स्वतंत्रता व स्वाधीनता और प्रगति उनकी एकता का परिणाम है। इस प्रतिरोध के मुकाबले में सैनिक और आर्थिक परिवेष्टन तथा इस्लामी क्रांति के विरोधियों का समर्थन एवं इस्लामी क्रांति को कमज़ोर करने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियों की दूसरी गतविधियां प्रभावहीन हो चुकी हैं। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी राष्ट्र ने जो कदम उठाया है उससे बड़ी शक्तियों के समीकरण बिगड़ गये हैं। इस समय वे शायद ईरानी राष्ट्र की महानता को स्वीकार न करें परंतु इस समय उनके वार्ता की मेज़ पर आने का अर्थ ईरान की इस्लामी क्रांति और उसकी उपलब्धियों को स्वीकार करना है। इस आधार पर अगर ईरान की इस्लामी क्रांति के शत्रु २२ बहमन की महारैली में जनता की उपस्थिति की वास्तविकता को छिपाना चाहें तो इसे वे छिपा नहीं सकते और इस्लामी क्रांति के संदेशों को शत्रुओं द्वारा स्वीकार किए जाने की आवश्यकता नहीं है।

 

 

वास्तविकता यह है कि ईरानी राष्ट्र और इस्लामी व्यवस्था हर समय से अधिक मज़बूत है और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में, ईरानी राष्ट्र इरादों के युद्ध में सूझ बूझ, जागरुकता, इरादे और प्रयास से अवश्य विजयी होगा। इस आधार पर २२ बहमन ईरानी राष्ट्र के लिए केवल क्रांति की सफलता का प्रतीक नहीं है बल्कि वह ईरानी राष्ट्र के मध्य इस्लामी क्रांति के प्रति वचनबद्धता की पुनरावृत्ति है।

इस वर्ष भी ईरानी जनता २२ बहमन की महारैली में इस स्थिति में भाग ले रही है जब ईरानी राष्ट्र शत्रुओं के प्रतिबंधों और दबावों के मुकाबले में पूरी शक्ति के साथ डटा हुआ है। आज ईरान की इस्लामी क्रांति ने कठिन परिस्थितियों को पार कर लिया है और वह प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है। इस मार्ग पर चलते हुए इस्लामी क्रांति के मूल्यों व आकांक्षाओं से लेशमात्र भी पीछे नहीं हटे।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के तीन महत्वपूर्ण आधार हैं। स्वतंत्रता प्रेमी विचारों को परवान चढ़ाना, स्वतंत्रता व स्वाधीनता से प्रेम और साम्राज्य को नकारना। ये वह आधार हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान के स्थान को और बेहतर बना दिया है और ईरान की इस्लामी क्रांति के संदेश भौगोलिक व राजनीतिक सीमाओं को पार कर गये हैं तथा वे पीड़ित राष्ट्रों के दिलों में विशेष स्थान रखते हैं।

 

 

स्पष्ट है कि २२ बहमन की महारैली में जनता की भव्य उपस्थिति और जनता द्वारा उसके मूल्यों व सिद्धांतों का समर्थन एसा साधन है जिससे शत्रुओं के षडयंत्रों पर पानी फिर जाता है और इस्लामी व्यवस्था के प्रति जन समर्थन इस बात का सूचक है कि ईरानी जनता और अधिकारी कठिनाइयों का सामना करके देश की प्रगति का दृढ़ संकल्प रखते हैं। इस आधार पर वर्तमान समय की संवेदनशील स्थिति में २२ बहमन की महारैली में जनता की उपस्थिति का अंतर्राष्ट्रीय संदेश है। वर्तमान समय में जब ईरान और अमेरिका के मध्य परमाणु वार्ता हो रही है और अमेरिका ईरान को धमकी दे रहा है ताकि वह विशिष्टता प्राप्त कर सके। २२ बहमन की महारैली में जनता की उपस्थिति अधिक महत्व रखती है और वह इस बात की परिचायक है कि जनता अब भी इस्लामी क्रांति के मूल्यों व आकांक्षाओं के प्रति कटिबद्ध है। २२ बहमन की महारैली इस बात की सूचक है कि गत ३६ वर्षों से ईरानी राष्ट्र क्रांति के मूल्यों के प्रति कटिबद्ध है और जो राष्ट्र इज़्ज़त, प्रतिष्ठा, सुरक्षा और अपनी पहचान चाहता है उसे  प्रतिरोध और परित्याग के लिए तैयार रहना चाहिये। ईरान की इस्लामी क्रांति सरलता से हाथ नहीं आई। गत ३६ वर्षों से ईरानी जनता को निराश करने के लिए शत्रुओं ने अपना पूरा प्रयास किया। शत्रु, जनता को निराश करके और उस पर आर्थिक दबाव डालकर उसे इस्लामी क्रांति से विमुख कर देना चाहते थे परंतु शत्रुओं की इच्छा के विपरीत ईरानी जनता में प्रतिरोध की भावना और मज़बूत हुई। इस समय ईरान की इस्लामी क्रांति विश्व के पीड़ित राष्ट्रों के लिए आदर्श बन गयी है और उसने विश्व व क्षेत्र में बड़े परिवर्तन की भूमि प्रशस्त कर दी है। ईरानी राष्ट्र इन समस्त वर्षों में ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाली शक्तियों के मुकाबले में प्रतिरोध का बेहतरीन उदाहरण बन गया है और उसका यह प्रतिरोध एकता का परिणाम है जिसने यह सिद्ध कर  दिया है कि ईरान की इस्लामी क्रांति के पास वह क्षमता व शक्ति मौजूद है जिसने धमकियों और प्रतिबंधों को बड़ी सफलताओं को प्राप्त करने के अवसर में परिवर्तित कर दिया है।            

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