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रविवार, 08 फ़रवरी 2015 15:10

इस्लामी क्रांति की सफलता-9

इस्लामी क्रांति की सफलता-9

 

इस्लामी क्रांति की सफलता और इस्लामी व्यवस्था के गठन को 36 वर्ष हो गये हैं। इन वर्षों में विभिन्न उतार चढ़ाव के बावजूद, इस्लामी व्यवस्था ने विभिन्न क्षेत्रों में विकास और प्रगति की चोटियों को सर किया है। इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था और ईरानी राष्ट्र को इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभिक वर्षों में विभिन्न प्रकार की समस्याओं और अड़चनों का सामना करना पड़ा जो पश्चिमी देशों और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के ठेकेदारों की ओर से थोपी गयी थीं। युद्ध, सुरक्षा संकट, आर्थिक व वित्तीय प्रतिबंधों, क्षेत्र व अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मीडिया वॉर जैसे विभिन्न चरणों से ईरानी राष्ट्र पूरी सफलता के साथ गुज़रा और इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था और इस राष्ट्र के लिए गर्व और आत्म विश्वास का इतिहास रच दिया गया।

 

 

चूंकि इस्लामी गणतंत्र ईरान का आधार, इस्लामी क्रांति और विश्व की दो ध्रुवीय व्यवस्था में पूर्ण स्वतंत्रता पर रखा गया था, इसीलिए क्रांति के आरंभ से ही ईरानी राष्ट्र को शत्रुओं के विभिन्न षड्यंत्रों और उनकी कायराना योजनाओं का सामना रहा है।

 

वर्षों तक चलने वाले युद्ध को थोपने और उससे होने वाली भारी हानियों विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाली भारी तबाही के अतिरिक्त विभिन्न आर्थिक प्रतिबंध, सदैव से ही पश्चिमी देशों और ईरानी राष्ट्र की स्वतंत्रता प्रेमी भावनाओं का विशेष करने वाले देशों का हथकंडा रहा है। वर्ष 1980 में तेहरान में अमरीका के जासूसी के अड्डे पर छात्रों द्वारा नियंत्रण किए जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अमरीका ने सबसे पहले ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध थोप दिया। इस प्रतिबंध के अंतर्गत, इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व अमरीका से होने वाले सैन्य उपकरणों के लिए लाखों डालर के समझौते को रद्द कर दिया गया और ईरान को सैन्य उपकरण बेचना ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसी प्रकार अमरीका में मौजूद ईरान की अरबों डालर की संपत्ति सील कर दी गयी और ईरान व अमरीका के मध्य हर प्रकार के व्यापारिक लेन देन पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।

 

यूरोपीय संघ और जापान भी अमरीका के साथ हो लिए और उन्होंने ईरान को ऋण और सैन्य उपकरण देने से इन्कार कर दिया और ईरान से तेल ख़रीदने का क्रम भी रोक दिया। इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गये आठ वर्ष युद्ध के काल में अमरीका ने सद्दाम का खुलकर समर्थन किया और बासी शासन और इराक़ी सेना की खुलकर वित्तीय और सामरिक सहायता की। अक्तूबर 1987 में अमरीकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसके आधार पर अमरीकी सामानों के ईरान निर्यात पर प्रतिबंध लग गया। यह प्रतिबंध धीरे धीरे विस्तृत हो गया और इसमें आर्थिक क्षेत्र वैज्ञानिक व सैन्य तकनीक भी शामिल हो गयी।

 

 

1991 के युद्ध में इराक़ की पराजय के बाद, इराक़ पर ईरान के प्रभाव को रोकने और क्षेत्र में शक्ति के संतुलन को बिगाड़ने के लिए वर्ष 1992 में अमरीकी सरकार ने ईरान और इराक़ के सैन्य उपकरणों के विस्तार पर प्रतिबंध का क़ानून पारित कर एक बार फिर ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों का घेरा तंग कर दिया।

 

ईरान के विरुद्ध अमरीका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध हालिया वर्षों में भी जारी रहे और इन देशों का सदैव से ही यह प्रयास रहा है कि ईरानी राष्ट्र समस्याओं में ग्रस्त रहे। हालिया वर्षों में ईरान का शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम भी ईरान पर प्रतिबंध लगाने का एक बहाना बन गया: पश्चिम ने अपने विचार में ईरान पर विभिन्न प्रतिबंध लगाकर, इस देश के विकास और प्रगति के मार्ग में बड़ी रुकावट पैदा करने की कोशिश की।

 

 

यह प्रतिबंध विभिन्न राजनैतिक, वैज्ञानिक और आर्थिक क्षेत्रों में ईरानी राष्ट्र पर थोपे गये । इन प्रतिबंधों में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिबंध, ईरान के सेंट्रल बैंक और तेल निर्यात पर प्रतिबंध था जो तेल की आय पर ईरान की अर्थव्यवस्था की निर्भरता के दृष्टिगत, अपनी तुच्छ सोच में, जनता की अर्थव्यवस्था को ख़राब करने और इस्लामी व्यवस्था को घुटने टेकने पर विवश करने के लिए पश्चिमी देशों की ओर से लगाया गया था।

 

ईरान पर पश्चिम के अत्याचारपूर्ण प्रतिबंधों के दृष्टिगत जिसमें दवाओं, खाद्य पदार्थों और दैनिक प्रयोग की चीज़ों को निशाना बनाया गया, परमाणु कार्यक्रम को रोकने सहित पश्चिम के विस्तारवाद के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र के डटे रहने के संकल्प को तनिक भी डिगा नहीं सका। इसके अतिरिक्त ईरानी जनता के हाथ एक सुनहरा अवसर लग गया ताकि वह अपनी अपार आंतरिक क्षमताओं पर भरोसा करते हुए देश के विकास और प्रगति के लिए नये नये कार्यक्रम बनाये।

 

आधिकारिक संस्थाओं की रिपोर्ट के आधार पर ईरान वैश्विक अर्थव्यस्था में 18वें स्थान है और विश्व में तेल उत्पादन करने वाले देशों में चौथे नंबर है तथा विश्व में दूसरे सबसे बड़े गैस भंडार का मालिक ईरान है तथा पर्यटन के क्षेत्र में दसवें स्थान पर है। उत्तरी अफ़्रीक़ा तथा मध्यपूर्व क्षेत्र में उद्योग के क्षेत्र में उच्च स्थान पर है। इसी प्रकार पूरी दुनिया में एल्मोनियम, मैग्निशियम और तांबे के भंडार में ईरान उच्च स्थान पर है जबकि कृषि उत्पादन में विविधता के क्षेत्र में दुनिया में चौथे नंबर पर है।

 

 

इसी आधार पर वर्ष 2007 में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की ओर से प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था का विषय पेश किया गया जिसमें आंतरिक क्षमताओं पर भरोसा करते हुए देश पर आर्थिक दबाव के लिए शत्रुओं की योजनाओं का मुक़ाबला करने और नौकरियों में कटौती को रोकने तथा राष्ट्रीय कल्याण व विकास पर बल दिया गया था।

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई की ओर से प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था की मूल नीति, तीनों पालिकाओं और इस्लामी व्यवस्था हित संरक्षक परिषद के प्रमुखों को भेजी गयी जिसमें आतंरिक क्षमताओं पर भरोसा करने को महत्त्वपूर्ण और मूलभूत तत्व बताया गया है।

 

प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था का विषय ऐसी स्थिति में पेश किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने राष्ट्रीय हितों को बुरी तरह ख़तरे में डाल दिया था। इस आधार पर ईरान की अर्थव्यवस्था को ऐसे आधारों और सिद्धांतों पर आगे बढ़ना था जिससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों पर विजय प्राप्त की जाए और प्रतिबंधों की धमकियों को विकास के अवसर में परिवर्तित कर दिया जाए।

 

 

प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था ने इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था और ईरानी राष्ट्र की नर्म शक्ति के रूप में प्रतिबंधों के चक्रव्यूह से निकलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और समस्त समस्याओं और रुकावटों के बावजूद, देश का प्रगति चक्र पूरी शक्ति के साथ अपने मार्ग पर अग्रसर है।

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