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शनिवार, 07 फ़रवरी 2015 15:00

ईरान की ओर से फ़िलिस्तीनी विषय का समर्थन

ईरान की ओर से फ़िलिस्तीनी विषय का समर्थन

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से वर्चस्ववादी शासनों के विरुद्ध संघर्ष का नया चरण आरंभ हुआ।  ईरान में होने वाले परिवर्तनों ने, संघर्ष करने वाले आन्दोलनों विशेषकर फ़िलिस्तीनियों की विचारधारा को बहुत प्रभावित किया है।

 

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के आन्दोलन के आरंभिक नारों में से एक, अत्याचारग्रस्तों विशेषकर फ़िलिस्तीनियों का समर्थन करना था।  वास्तव में इस्लामी क्रांति का मुख्य संदेश, ईश्वर पर भरोसा और उसके आदेशों का पालन करना है।  इस्लामी क्रांति के संदेशों में से एक, अत्याचार के मुक़ाबले में प्रतिरोध करना है।

इस इस्लामी और मानवीय सोच के दृष्टिगत ईरान में इस्लामी शासन व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने क्रांति के आरंभिक वर्षों में वर्चस्ववादी शक्तियों से मुक़ाबले का समर्थन किया।

 

 

सन 1960 के दशक से यह विशेषता, जारी थी किंतु इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरान और ज़ायोनी शासन के कूटनैतिक संबन्ध विच्छेद हो गए।  इसके बाद इस्राईल के दूतावास को फ़िलिस्तीन के दूतावास में बदल दिया गया।  इस आन्दोलन ने धीरे-धीरे वैश्विक आयाम धारण करना आरंभ कर दिया।  ईरानी राष्ट्र द्वारा वर्चस्ववाद के विरुद्ध कड़े मुक़ाबले को आदर्श के रूप में स्वीकार किया गया।  दूसरी ओर इस्लामी क्रांति के स्वतंत्रता प्रेमी संदेश भी क्षेत्रीय राष्ट्रों विशेषकर फ़िलिस्तीनियों के बीच प्रतिरोध की भावना को सुदृढ़ करने का कारण बने।

एक अरब लेखक ज़ियाद अबू उमर “ फिलिस्तीनी आन्दोलन पर इस्लामी क्रांति के प्रभाव” नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफतला के बाद धर्म की ओर झुकाव रखने वालों ने विश्विद्यालयों में युवाओं से राजनीतिक क्षेत्र में गतिविधियां करने का अनुरोध किया।

इस प्रकार के अनुरोध, ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले इतने स्पष्ट ढंग से दिखाई नहीं देते थे।

 

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्ला हिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के कथनानुसार इस्लामी क्रांति ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के अधिकारों की सुरक्षा को इस्लामी जेहाद में परिवर्तित कर दिया।  उन्होंने सन 2006 को क़ुद्स के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, फ़िलिस्तीन के अवैध अधिगृहण को वर्तमान इतिहास की सबसे बड़ी समस्या बताया।  वरिष्ठ नेता ने अमरीका, ब्रिटेन और ज़ायोनियों द्वारा विश्व मानचित्र से फ़िलिस्तीन के नाम को मिटाए जाने के अथक प्रयासों की विफलता की ओर संकेत करते हुए कहा था कि पूरे मुस्लिम जगत को फ़िलिस्तीन समस्या को अपनी समस्या समझना चाहिए ताकि ईश्वरीय वचन के पूरे होने की स्थिति में फ़िलिस्तीन, फ़िलिस्तीनियों को वापस मिल जाए और फ़िलिस्तीनी जनता के हाथो निर्वाचित फ़िलिस्तीनी सरकार, सटा की बागडोर अपने हाथों में ले।

 

पिछले तीन दशकों के दौरान इस्लामी गणतंत्र ईरान ने सदैव यह प्रयास किया है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के अधिकारों को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया जाए।  यही कारण है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र, ज़ायोनी शासन के मुक़ाबले में डटकर प्रतिरोध कर रहा है।  इसी आधार पर ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ही पश्चिम, इस्लामी जागरूकता और राजनैतिक परिपक्वता के प्रति चिंतित रहा है।  यही कारण है कि वह ईरानोफ़ोबिया को प्रस्तुत करके विश्व के देशों के सामने ईरान की छवि को बिगाड़ने का हर संभव प्रयास कर रहा है।

इन्ही बातों के दृष्टिगत इमाम ख़ुमैनी की ओर से विश्व क़ुद्स दिवस की घोषणा के कारण ही फ़िलिस्तीनियों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने छिने हुए अधिकारों को मांगने के लिए प्रयास तेज़ कर दिये हैं।

 

कूटनीतिक क्षेत्र में भी ईरान ने अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों विशेषकर इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी और गुट निरपेक्ष आन्दोलन के माध्यम से फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के समर्थन की आवश्यकता को प्रस्तुत किया।  ईरान ने बिना किसी भय और भेदभाव के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन किया और ज़ायोनी अत्याचारों की खुलकर भर्त्सना की है।  इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले फ़िलिस्तीन के समर्थन पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एसा कुछ देखने में नहीं आता था।

 

जानकारों के अनुसार ईरान की ओर से फ़िलिस्तीन के समर्थन के कारण यह विषय अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर पहुंचा।  यही कारण है कि ज़ायोनी शासन लंबे समय से यह प्रयास कर रहा है कि वह ईरान द्वारा फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधकर्ताओं के समर्थन को नकारात्मक रूप में दर्शाए।  उसने फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध को आतंकवाद का नाम देकर यह प्रयास किया है कि फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध को हिंसक कार्यवाही बताए।

 

इन वास्तविकताओं से पता चलता है कि ईरान की इस्लामी क्रांति ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करके फ़िलिस्तीनियों के आंदोलन को सशक्त किया है।  यह महाआन्दोलन, जो इस समय इस्लामी जागरूकता के रूप में सामने आया है, एक अद्वितीय उपलब्धि है।

कुछ टीकाकार मानते हैं कि ईरान की इस्लामी क्रांति, ईरानी राष्ट्र के लिए केवल स्वतंत्रता ही अपने साथ नहीं लाई बल्कि उसने स्वावलंबन की भावना को जनता में पुनर्जागृत किया।  इस प्रकार वह अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों के लिए आदर्श में परिवर्तित हो गई।

 

अब इस्लामी क्रांति की सफलता के 36 वर्षों के बाद ईरान की विदेश नीति में फ़िलिस्तीन के समर्थन को यथावत वरीयता प्राप्त है।

इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान में अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों के समर्थन का उल्लेख है।  इसके अनुच्छेदों में कहा गया है कि पूरे विश्व में अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों का पूर्ण रूप से समर्थन किया जाए।

 

ईरान के संविधान में आया है कि देश की इस्लामी शासन व्यवस्था इस बाते के लिए कटिबद्ध है कि वह विदेश नीति को इस प्रकार से संचालित करे कि इस्लामी मानदंडों के आधार पर निःसंकोच, विश्व के अत्याचार ग्रस्तों विशेषकर मुसलमानों का समर्थन किया जाए।  ईरान के संविधान में मानव समाज में मनुष्य के कल्याण को अपनी आकांक्षा बताया गया है।  इस प्रकार अन्य राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और साथ ही वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में अत्याचारग्रस्तों के समर्थन की बात कही गई है।  इस प्रकार विश्व के राष्ट्रों पर वर्चस्ववादी शक्तियों के होने वाले अत्याचारों पर बहुत से देशों के मौन को भी चुनौती दी गई है।

 

ईरान की ओर से फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता के अधिकारों का खुला समर्थन, इस विचारधारा की पुष्टि करता है।  ईरान ने विश्ववासियों के लिए यह सिद्ध कर दिया है कि बड़ी शक्तियां लोकतंत्र, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रों के समर्थन के बारे में जो नारे लगाती हैं वे खोखले दावे हैं।  वास्तव में यह पश्चिमी हितों को साधने के बहाने हैं।  इन शक्तियों ने कभी भी राष्ट्रों की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए उनकी मांगों को पूरा करने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया।  विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियों द्वारा ईरान के विरोध, मुख्य कारण भी यही है कि वह अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों का खुला समर्थक है।      

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