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बुधवार, 04 फ़रवरी 2015 14:27

इस्लामी क्रांति की सफलता-6

इस्लामी क्रांति की सफलता-6

ईरान और पश्चिम के बीच परमाणु बातचीत शुरु हुए 10 साल से ज़्यादा वक़्त हो रहा है। सबसे पहले तकनीकी व आधिकारिक आयाम से सवाल उठाए गए और फिर थोड़े समय बाद यह अंतर्राष्ट्रीय परामणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए के लिए सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय बन गया और फिर राजनैतिक मुद्दे का रूप अख़्तियार कर गया। यहां तक कि आईएईए के निदेशक मंडल ने इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भेज कर, इस संबंध में और बाज़ीगरों की उपस्थिति की पृष्ठिभूमि मुहैया कर दी। और अब परमाणु वार्ता का विषय ईरान की इस्लामी व्यवस्था के लिए विश्व की शक्तियों के सामने ईरानी राष्ट्र के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिरोध व दृढ़ता का प्रतीक बन गया है।

 

 

ईरान के परमाणु विषय में पिछले एक दशक के दौरान बहुत से उतार चढ़ाव दिखने में आए जिनमें सबसे अहम बिन्दु परमाणु अप्रसार संधि एनपीटी के आधार पर युरेनियम संवर्धन का है। इस संधि में शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए युरेनियम संवर्धन में कोई हरज नहीं है किन्तु विवित रूप से 60 के दशक के अंतिम वर्षों में इस संधि के पारित होने के बाद, 70 के दशक के शुरु से आज तक अमरीका को किसी भी देश में युरेनियम संवर्धन अच्छा नहीं लगा। दूसरे देशों के मामलों में ख़ुद को चौधरी समझने वाले अमरीका ने इसी सोच के कारण एनपीटी के पारित होने के बाद दुनिया के किसी भी देश में युरेनियम संवर्धन को क़ुबूल नहीं किया। हालांकि अमरीका यह बात अच्छी तरह जानता है कि युरेनियम संवर्धन एनपीटी के ख़िलाफ़ नहीं है।

 

 

इसके बावजूद अमरीका ईरान और गुट पांच धन एक के बीच परमाणु बातचीत में यह बहाना पेश करता है कि अगर युरेनियम संवर्धन के अधिकार को मान्यता दे देगा तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युरेनियम संवर्धन की प्रतिस्पर्धा शुरु हो जाएगी जिससे परमाणु हथियार के विस्तार का ख़तरा पैदा हो सकता है। अलबत्ता इसके बावजूद युरेनियम संवर्धन के मामले में कुछ अपवाद भी मौजूद हैं। और वह अमरीका की दोहरी नीति के कारण हैं। अमरीका ने उन देशों में युरेनियम संवर्धन को व्यवहारिक रूप से मान लिया है जिन पर उसे विश्वास है जैसे जर्मनी और जापान में युरेनियम संवर्धन हो रहा है और इस पर अमरीका व्यवहारिक रूप से कोई आपत्ति नहीं जताता। 

 

 

हक़ीक़त यह है कि युरेनियम संवर्धन के संबंध में अमरीका ने अन्य देशों पर ऐसी नीति थोपी है जो एन पी टी के ख़िलाफ़ है क्योंकि इस संधि में सदस्य देशों के परमाणु अधिकार के आयाम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं और इनके क्रियान्वयन की सद्भावना पर निगरानी के उपाय भी बताए गए हैं। इस निगरानी की ज़िम्मेदारी आईएईए को सौंपी गयी है। इस आधार पर 24 नवंबर 2013 को ईरान और गुट पांच धन एक के बीच ज्वाइंट ऐक्शन प्लान के नाम से एक दस्तावेज़ पर दस्तख़त हुए जिसमें पहले क़दम के तौर पर दोनों पक्षों को छह महीने का वक़्त दिया गया कि वे परमाणु मामले में एक दूसरे से अपने दृष्टिकोण को निकट करें। इस परिप्रेक्ष्य में ईरान ने अपनी कुछ परमाणु गतिविधियों को सद्भावना के तहत स्वेच्छा से स्थगित कर दिया। इसके मुक़ाबले में पश्चिम ने कुछ पाबंदियों को हटा लिया। इसलिए जो कुछ ईरान और गुट पांच धन एक के बीच युरेनियम संवर्धन के संबंध में अंतिम सहमति के रूप में व्यवहारिक होगा उसका आधार यही ज्वाइंट ऑफ़ ऐक्शन प्लान होगा।

 

 

परमाणु अप्रसार संधि एन पी टी के आधार पर युरेनियम संवर्धन क़ानूनी है और आज गुट पांच धन एक ने भी इस बात को मान लिया है कि ईरान भी अपनी भूमि पर विश्वास बहाली के क़दम के साथ युरेनियम संवर्धन कर सकता है।

इस वक़्त दुनिया की पांच परमाणु शक्तियों के अलावा 14 देश युरेनियम संवर्धन उद्योग के स्वामी हो गए हैं या होने वाले हैं। इस आधार पर इस संदर्भ में ईरान की एक उपलब्धि यह है कि उसकी शांतिपूर्ण परमाणु प्रौद्योगिकी स्वदेशी विज्ञान पर आधारित और संस्थागत है। इसी बिन्दु को ईरान और गुट पांच धन एक के बीच परमाणु वार्ता के सभी चरण में मद्देनज़र रखा गया और इस संदर्भ में ईरान नेता अपने अधिकार से पीछे हटा और न हटेगा।

 

 

जनेवा सहमति से पहले तक अमरीका की परमाणु वार्ता में यह कोशिश थी कि वह ईरान में युरेनियम संवर्धन को पूरी तरह ख़त्म करवा दे और यह ऐसी हालत में थी जब ज़्यादातर योरोपीय देश ईरान में युरेनियम संवर्धन के विशेष निगरानी में सीमित स्तर तक जारी रहने के पक्ष में थे। अमरीका की हठधर्मी के कारण 2005 में परमाणु वार्ता नाकाम हो गयी। हक़ीक़त में ईरान की नियत कभी भी युरेनियम संवर्धन की अप्रचलित परंपरा को जारी करने या परमाणु बम बनाने की नहीं थी।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई बारंबार परमाणु हथियार के निर्माण व प्रयोग के हराम अर्थात वर्जित होने का फ़त्वा दे चुके हैं। उन्होंने अप्रैल 2010 में तेहरान में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु निरस्त्रीकरण सम्मेलन में, परमाणु तथा जनसंहारक हथियारों के हराम होने पर बल दिया था। उन्होंने परमाणु हथियारों के संबंध में ईरान के दृष्टिकोण की व्याख्या में कहा, “इस्लामी गणतंत्र ईरान परमाणु, रासायनिक और इन जैसे हथियारों के इस्तेमाल को अक्षम्य व महापाप समझता है। हमने परमाणु हथियार से ख़ाली मध्यपूर्व का नारा दिया है और हम उस पर कटिबद्ध हैं।”

इस संदर्भ में ईरान के दृष्टिकोण को इसकी आधिकारिक संस्था में पंजीकृत किया जा चुका है।

 

 

अमरीका और पश्चिम यह सोच रहे थे कि झूठे दावों और ईरान के परमाणु मामले को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भेज कर तथा नाना प्रकार के प्रतिबंध लगा कर ईरान को उसके अधिकार से पीछे हटने पर मजबूर कर देंगे। इन दौरान ईरान के ख़िलाफ़ बहुत ही अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लगाए गए। यह ऐसी स्थिति में है। जब ईरान एन पी टी का सदस्य देश है और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए ने भी हमेशा इस बात की पुष्टि की है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम कभी भी सैन्य लक्ष्यों की ओर उन्मुख नहीं हुआ है।

ईरानी राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी की ओर से परमाणु निरस्त्रीकरण के संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा में ठोस प्रस्ताव तथा इस संदर्भ में गुट पांच धन एक के साथ परमाणु वार्ता के परिप्रेक्ष्य में ईरान की ओर से उठाए गए क़दम, ये सबके सब इस बात की पुष्टि करते हैं कि ईरान परमाणु हथियारों का अंत चाहता है और साथ ही परमाणु ऊर्जा से उचित लाभ उठाना चाहता है।

 

 

सितंबर 2013 में परमाणु निरस्त्रीकरण के संबंध में ईरान ने गुट निरपेक्ष आंदोलन के अध्यक्ष के नाते 120 सदस्य देशों के प्रतिनिधि के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तीन प्रस्ताव पेश किए जो सबके सब पारित हुए। पहला प्रस्ताव परमाणु हथियार की प्राप्ति, उत्पादन, भंडारण इसके इस्तेमाल को रोकने तथा इन हथियारों को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समझौते के लिए तुरंत बाचतीत शुरु होने के बारे में था। दूसरा प्रस्ताव परमाणु निरस्त्रीकरण के संबंध में 2018 में उच्च स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय कान्फ़्रेंस के आयोजन के बारे में और तीसरा हर साल 26 सितंबर को परमाणु हथियारों को पूरी तरह नष्ट करने के उद्देश्य से इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय संपूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण दिवस घोषित किए जाने के बारे में था।            

 

ईरान वर्ष 1958 में आईएईए का सदस्य बना और 1968 में उसने एन पी टी पर दस्तख़त किए। एन पी टी के पहले अनुच्छेद के अनुसार परमाणु हथियार का उत्पादन व विस्तार और इन हथियारों को रखना वर्जित है। इस समझौते पर परमाणु हथियार से संपन्न सरकारों ने 1 जुलाई 1968 में दस्तख़त किए। एन पी टी के अनुच्छेद 6 के अनुसार परमाणु संपन्न देश सद्भावना के साथ दुनिया से परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए बातचीत जारी रखें। किन्तु परमाणु शक्ति देश अपने परमाणु शस्त्रागारों की रक्षा पर बल देते हैं और हर साल नई पीढ़ी के परमाणु हथियारों के विकास और उनकी रक्षा के लिए बड़ा बजट विशेष करते हैं।

 

 

सच्चाई यह है कि ईरान ने अपनी रक्षा नीति अपनी धार्मिक व मानवीय आस्थाओं के आधार पर निर्धारित की है जिसमें सामूहिक जनसंहार के हथियारों का कोई स्थान नहीं है मगर वह अपनी प्रगति और हितों से समझौता नहीं करेगा। पश्चिम की ओर से इन सब रुकावटों के बावजूद ईरान में परमाणु विज्ञान, ईरानी राष्ट्र का वैज्ञानिक वैभव बन चुका है। इस वक़्त ईरान विशेष प्रकार के रेडियो आइसोटोप का उत्पादन कर रहा है। इस समय ईरान विशेष रोगों के इलाज में प्रयोग होने वाले 90 से 95 प्रतिशत रेडियो आइसोटोप का उत्पादन कर रहा है।

पश्चिम ने लगभग एक दशक से भ्रान्तिपूर्ण व्यवहार अपनाते हुए ईरान पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अन्यायपूर्ण एवं एकपक्षीय प्रतिबंध लगाए। इन सभी साल के दौरान ज़ायोनी शासन ने अमरीका में आईपेक नामक यहूदी संगठन के ज़रिए पूरी कोशिश की ईरान के परमाणु अधिकार को माना न जाए। इस समय तेहरान के अनुसंधानिक संयंत्र में जिस ईंधन का प्रयोग किया जा रहा है उसका उत्पादन ईरानी माहिरों ने किया था। इस प्रकार ईरान की बीस प्रतिशत तक संवर्धित युरेनियम की ज़रूरत पूरी हो गयी।

 

 

प्रतिबंध, मनोवैज्ञानिक जंग, राजनैतिक दबाव, सैन्य हमले की धमकी यहां तक कि परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या और कंप्यूटर वायरस के ज़रिए परमाणु गतिविधियों में रुकावटें पैदा करना, वे हथकंडे थे जिसे ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों ने उसके ख़िलाफ़ अपनाए ताकि ईरान को शांतिपूर्ण परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति से रोक दें किन्तु ईरानी राष्ट्र ने हालिया वर्षों में परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महाउपलब्धि हासिल की है। इन उपलब्धियों ने यह दर्शा दिया कि ईरानी राष्ट्र साम्राज्यवादी मोर्चे की ओर से रुकावटों के बावजूद शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी के मार्ग पर आगे बढ़ता जाएगा। 

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