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मंगलवार, 03 फ़रवरी 2015 13:47

ईरान की इस्लामी क्रांति के संबन्ध में पश्चिम की नीतियां

ईरान की इस्लामी क्रांति के संबन्ध में पश्चिम की नीतियां

 

इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ ही ईरान और पश्चिम के बीच टकराव का एक नया चरण आरंभ हुआ।  यह टकराव अप्रत्यक्षित नहीं था।  इसका मुख्य कारण यह है कि ईरान की इस्लामी क्रांति ने अमरीका की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति को जगज़ाहिर कर दिया था।

 

 

इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में पश्चिमी का हस्तक्षेप समाप्त हो गया।  अमरीका के लिए यह कोई साधारण बात नहीं थी जिसे वह अनदेखा कर देता।

एक अमरीकी विचारक ब्रेज़ेंस्की, ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता और अमरीका पर उसके प्रभाव के बारे में कहते हैं कि पश्चिम विशेषकर अमरीका के लिए रणनीतिक दृष्टि से ईरान का इतना अधिक महत्व है कि वह इसे किसी भी स्थिति में अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता चाहे इसके लिए युद्ध ही क्यों न करना पड़े।

 

 

यही कारण था कि अमरीका ने ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ही यहां पर स्थापित होने वाली सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार और षडयंत्र आरंभ कर दिये जो अब भी जारी हैं।  ईरान के विरुद्ध शत्रुता के मुख्य ध्वजावाहक अमरीका और ज़ायोनी हैं।  पहलवी शासन के पतन के साथ क्षेत्र में वे अपने एक अति विश्वसनीय घटक से हाथ धो बैठे थे।

वर्चस्ववादी शक्तियों ने अपने समस्त मतभेदों के बावजूद ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था को गिराने के लिए एक-दूसरे का खुलकर समर्थन किया और बहुत से षडयंत्र रचे।  इन शक्तियों ने ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था को गिराने के लिए अघोषित सहमति के अन्तर्गत, सद्दाम के माध्यम से ईरान पर युद्ध थोप दिया।  उन्होंने यह कार्य ईरान की नई सरकार को गिराने के लिए किया था किंतु इससे भी वे अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।

वर्चस्ववादी शक्तियों ने ईरानी जनता के प्रतिरोध का अनुमान लगाने के लिए युद्ध को लादा था।  युद्ध की समाप्ति के बाद थोपे गए युद्ध का उद्देश्य, और उसके समर्थक भलिभांति स्पष्ट होते गए।  बाद में प्रकाशित होने वाले प्रमाणों से सिद्ध होता है कि सद्दाम की ओर से ईरान पर युद्ध, पश्चिमी देशों और उनके कुछ क्षेत्रीय घटकों ने थोपा था।  इनका समर्थन ही युद्ध के लंबे होने का कारण बना था यहां तक कि वह 8 वर्षों तक जारी रहा।

 

 

पश्चिम और उसके क्षेत्रीय घटकों के खुले आर्थिक और सैन्य समर्थन के बावजूद ईरान पर थोपा गया युद्ध विफल रहा।  पश्चिम के बड़े-बड़े नीति निर्धारकों के अनुसार इस युद्ध ने पश्चिमी समीकरणों को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दिया और यह, ईरानी राष्ट्र के अधिक सृद्ढ बनने का कारण बना।  यही कारण है कि थोपे गए युद्ध की समाप्ति के बाद ही ईरान के विरुद्ध अमरीकी नीतियां परिवर्तित हो गईं और अब उसकी ओर से खुलकर टकराव सामने आ गया।

इसके बाद से अमरीका ने जिन बातों को मध्यपूर्व से संबन्धित अपनी नीति में सर्वोपरि रखा उनमें से कुछ इस प्रकार थीं।  क्षेत्रीय देशों में ईरान से लगने वाली सीमा पर अपनी सैन्य छावनियां बनाना, फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों को आधुनिक हथियार बेचना, और ईरान के लिए विभिन्न मार्गों से चुनौतियां उत्पन्न करना आदि।

 

 

इस नीति को आगे बढ़ाते हुए अमरीका ने पिछले दो दशकों के दौरान अपने अधिक सैनिकों को क्षेत्र में तैनात किया है।  पैंटागन ने 2001 के बाद से मध्यपूर्व में अमरीका की थल और नौसेना की छावनियों की संख्या में वृद्धि की।  उसने फ़ार्स की खाड़ी और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों को अपने एक बड़े शस्त्रागार में परिवर्तित कर दिया है।

ग्यारह सितंबर की घटना के बाद से अमरीका और नैटो ने फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों के लिए अरबों डालर के शस्त्र बेचने और क्षेत्र में तनाव बढ़ाने को अपनी रणनीति में शामिल कर रखा है।  इस नीति को क्षेत्र में ईरान को ख़तरे के रूप में दिखाकर व्यवहारिक बनाया जा रहा है।

 

 

हालांकि इस नीति के विरुद्ध वर्तमान समय में इस्लामी गणतंत्र ईरान, की रक्षात्मक क्षमता बहुत अधिक है और इस दृष्टि से वह क्षेत्र की एक उल्लेखनीय शक्ति है।

ईरान, क्षेत्रीय देशों से सुरक्षा के क्षेत्र में सहकारिता का आह्वान करते हुए इस बात की क्षमता रखता है कि वह षडयंत्रों और धमकियों का मुक़ाबला करने में सक्षम है।  यही कारण है कि ईरान के राष्ट्रपति डा. हसन रूहानी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा के वार्षिक अधिवेशन में ईरान की प्रतिरक्षा नीतियों का उल्लेख करते हुए बल दिया था कि इस्लामी गणतंत्र ईरान, क्षेत्र की महत्वपूर्ण शक्ति है।

इस्लामी क्रांति की सफलता के 36 वर्षों के बावजूद, इस क्रांति के शत्रुओं की शत्रुता कम नहीं हुई है बल्कि नाना प्रकार के षडयंत्र विभिन्न रूपों में व्यवहारिक बनाए जा रहे हैं।  इस क्रांति को विफल बनाने के लिए अमरीका ने आरंभ से ही षडयंत्र रचे हैं और आज भी वह अपने इस कार्य में व्यस्त है।

वर्तमान समय में अमरीका की विदेश नीति का केन्द्रीय बिंदु, ईरान के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक युद्ध है जिसमें धमकियों और प्रतिबंधों को शामिल किया गया है।

अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देश, यह दर्शाना चाहते हैं कि ईरान की परमाणु गतिविधियां, सैन्य मार्ग की ओर अग्रसर हैं।  उन्होंने इसी बहाने से ईरान के विरुद्ध प्रतिबंध लगाए हैं।

 

 

हालांकि ईरान की रक्षा नीति में परमाणु शस्त्रों को कोई स्थान प्राप्त नहीं है और धार्मिक दृष्टि से भी यह बात विरोधाभास रखती है।

ईरान के विरुद्ध अमरीका के लक्ष्य, पूर्ण रूप से स्पष्ट हैं।  ईरान की इस्लामी क्रांति के मुक़ाबले में अमरीका ने नर्म युद्ध को भी दृष्टिगत रखा है।  उसने परमाणु मामले में ईरान के साथ वार्ता की नीति के बावजूद डराने-धमकाने की नीति को नहीं छोड़ा।  अमरीका, ईरान को रक्षा सहित हर क्षेत्र में कमज़ोर रखना चाहता है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने वर्षों पहले शत्रु के नर्म युद्ध के बारे में बल देकर कहा था कि नर्म युद्ध एक वास्तविकता है तथा इस समय इस्लामी गणतंत्र ईरान को नर्म युद्ध का सामना है।

 

 

सर्वेक्षणों से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान ईरान के विरुद्ध युद्ध में 60 पश्चिमी संस्थाएं सक्रिय हैं।

पश्चिम की इन कार्यवाहियों के ही कारण ईरान ने अपनी रक्षा नीति में नर्म युद्ध और मनोवैज्ञानिक युद्ध को सम्मिलित कर लिया है।  अमरीका के बड़े- बड़े विचारक इस बात को स्वीकार करते हैं कि व्यापक प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अपनी रक्षा शक्ति में अभूतपूर्व ढंग से वृद्धि की है।

अन्तर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार ईरान के विरुद्ध अमरीका या ज़ायोनी शासन के आक्रमण की स्थिति में तेहरान का उत्तर, कल्पना से परे होगा।  टीकाकारों का मानना है कि यदि वर्तमान समय में ईरान के संदर्भ में अमरीका की नीति, परिवर्तित हुई है तो उसका मुख्य कारण, विभिन्न प्रकार के दबावों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र का कड़ा विरोध है।  निश्चित बात है कि ईरान की प्रगति और उसका विकास अमरीका को बिल्कुल भी पसंद नहीं है।  यही कारण है कि वह इसको रोकने के लिए हर संभव प्रयास करेगा जैसाकि वह विगत में करता चला आया है।

 

 

अनुभवों से पता चलता है कि वार्ता की ओर झुकाव के बावजूद अमरीका, अब भी ईरान के लिए बाधाएं उत्पन्न कर रहा है।  इस प्रकार उसके व्यवहार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है।  यही कारण है कि ईरानी राष्ट्र को अमरीका पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।                 

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