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शनिवार, 31 जनवरी 2015 16:02

स्वतंत्रता प्रभात

 स्वतंत्रता प्रभात

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता को विश्व में आज़ादी चाहने वाले राष्ट्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत समझा जाता है और अब तक उसने इस्लामी एवं अरब देशों में ध्यान योग्य प्रभाव डाला है। कहा जा सकता है कि क्षेत्र के इस्लामी देशों की जागरुकता में सबसे अधिक ईरान की इस्लामी क्रांति की भूमिका है।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति ११ फरवरी वर्ष १९७९ को स्वर्गीय इमाम खुमैनी के नेतृत्व में सफल हुई। ईरान की इस्लामी क्रांति में सबसे अधिक भूमिका जनता की है और जनता ने वर्षों के संघर्ष के बाद शाह की अत्याचारी सरकार का अंत कर दिया। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता से क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण परिवर्तित हो गये। ईरान की इस्लामी क्रांति को जनता की वास्तविक क्रांति समझा जाता है। स्वर्गीय इमाम खुमैनी के नेतृत्व में ईरानी जनता ने शाह की अत्याचारी सरकार का अंत करके इस्लामी सरकार की बुनियाद रखी। इस बात के दृष्टिगत कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में साम्राज्यवादी विचार धारा जड़ कर गयी थी, ईरानी जनता ने वर्चस्ववाद से संबंधित शाह की अत्याचारी सरकार का तख्ता पलट दिया और उसके स्थान पर धार्मिक लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की।  

 

 

समय बीतने के साथ साथ ईरान की इस्लामी क्रांति ने दूसरे राष्ट्रों पर बहुत प्रभाव डाला और दूसरे राष्ट्रों के लिए उपयुक्त व उचित उदाहरण में परिवर्तित हो गयी है। हालिया वर्षों में उत्तरी अफ्रीक़ा और मध्यपूर्व में जो परिवर्तन हुए हैं उन सबमें ईरान की इस्लामी क्रांति की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में जिन देशों में इस्लामी जागरुकता की लहर फैली है और प्रतिरोधक गुट अस्तित्व में आये हैं उन सब ने ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरणा ली है और विश्व के मुसलमानों की जागरुकता में उसने विशेष भूमिका निभाई है।

ईरान की इस्लामी क्रांति ने वर्षों बाद इस्लाम और इस्लामी समाजों को अलग थलग की स्थिति से बाहर निकाला। ईरान की इस्लामी क्रांति ने इस्लामी संगठनों, संस्थाओं और आंदोलनों को जागरूक बनाया। ईरान की इस्लामी क्रांति ने इसी प्रकार इस विचार धारा पर पानी फेर दिया कि साम्राज्यवादी व्यवस्था पराजित नहीं होगी। इसी प्रकार इस्लामी क्रांति ने ईरानी राष्ट्र में आत्म विश्वास की भावना मज़बूत कर दी।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति ने धार्मिक मूल्यों के आधार पर धार्मिक लोकतंत्र की बुनियाद रखी और साम्राज्य व अन्याय से संघर्ष का नया उदाहरण पेश किया। ईरान की इस्लामी क्रांति ने इसी प्रकार सत्ता और राजनीति के क्षेत्र में नया उदाहरण तथा नई सोच पेश की। ईरान की इस्लामी क्रांति एसी स्थिति में सफल हुई कि ईरान सहित क्षेत्र के समस्त देश पश्चिम के प्रभाव में थे। इसी प्रकार यह क्रांति स्वतंत्रता, आज़ादी और इस्लाम का अनुसरण करते हुए सफल हुई और इससे पश्चिम के पारंपरिक वर्चस्व को करारा झटका लगा। ईरान की इस्लामी क्रांति इस्लामी मूल्यों को आधार बनाकर उन राष्ट्रों के लिए आदर्श में परिवर्तित हो गयी जिनके शासक पश्चिम के पिछलग्गू हैं।

अमेरिका की अगुवाई में वर्चस्ववाद का ईरान द्वारा मुकाबले ने एसा रास्ता खोल दिया जिससे क्षेत्र के दूसरे राष्ट्र भी स्वतंत्रता एवं आज़ादी की दिशा में क़दम बढा रहे हैं। ईरान की इस्लामी क्रांति ने दूसरे विशेषकर इस्लामी राष्ट्रों को पहचान दी ताकि धीरे धीरे वे भी साम्राज्य से मुकाबले के लिए उठ खड़े हों। हालिया वर्षों में जनांदोलनों ने दर्शा दिया है कि ईरानी राष्ट्र की इस्लामी क्रांति के संदेश क्षेत्र और इस्लामी जगत में फैल गये हैं और ये जनक्रांतियां उसी संदेश का परिणाम हैं।

 

 

उत्तरी अफ्रीक़ा अर्थात टयूनिशिया से सबसे पहले इस्लामी जागरुकता की जनक्रांति आरंभ हुई उसके बाद वह मिस्र, लीबिया, यमन और बहरैन तक पहुंची। दूसरे शब्दों में इन देशों में इस्लामी जागरुकता एवं जनक्रांतियों का आरंभ, इस बात का सूचक है कि ईरान की इस्लामी क्रांति के संदेश पूरे क्षेत्र और इस्लामी जगत में फैल गये हैं और ये जनक्रांतियां उसी का चिन्ह हैं। इनजन क्रांतियों कारण टयूनीशिया तथा मिस्र जैसे देशों के तानाशाहों का अंत हो गया।

इस्लामी जागरुकता की एक विशेषता यह है कि वह अमेरिका और इस्राईल विरोधी है और यह वह वास्तविकता है जिसे अमेरिका एवं जायोनी शासन बिल्कुल पसंद नहीं करते और वे यथावत इस्लामी जागरुकता के विरुद्ध षडयंत्र रचने में लगे हुए हैं।

 

 

मिस्र में इस्लामी जागरुकता का आ जाना और मिस्र के तानाशाह हुस्नी मुबारक का सत्ता से अंत इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि मिस्र/ पश्चिम विशेषकर अमेरिका का घर आंगन था। अमेरिका की अगुवाई में पश्चिम ने मिस्र की हुस्नी मुबारक की सरकार को एक तानाशाही एवं दमनकारी सरकार में परिवर्तित कर रखा था। क्षेत्र के संबंध में अमेरिका की जो नीति थी उसके संदर्भ में मिस्र की महत्वपूर्ण भूमिका थी और मिस्र में इस्लामी जागरुकता का आ जाना पश्चिम विशेषकर अमेरिका के लिए बहुत बड़ा झटका था।

११ फरवरी वर्ष २०११ में मिस्र में इस्लामी जनक्रांति सफल हुई और हुस्नी मुबारक की तानाशाही सरकार के अंत के बाद मिस्र में पहली बार जनता की निर्वाचित सरकार गठित हुई।

मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति का संबंध इखवानुल मुस्लेमीन संगठन से था। एक वर्ष का समय बीत जाने के बाद अमेरिका और इस्राईल के हस्तक्षेप से मिस्री जनता द्वारा चुने गये राष्ट्रपति को इस देश की सेना ने सत्ता से हटा दिया।

मिस्री सेना द्वारा विद्रोह, जनता की हत्या, हुस्नी मुबारक को आज़ाद कर देना और सेना द्वारा इखवानुल मुस्लेमीन के नेताओं को गिरफ्तार करके बंद करना जुलाई वर्ष २०१३ की कुछ महत्वपूर्ण घटनायें थीं।

 

 

उत्तरी अफ्रीक़ा विशेषकर मिस्र में होने वाला परिवर्तन इस बात का सूचक है कि इस्लामी जागरुकता समाप्त नहीं हुई है और वास्तव में यह परिवर्तन भी इस्लामी जागरुकता के मुकाबले में अमेरिका की अगुवाई में वर्चस्ववाद की प्रतिक्रिया है।

मिस्र में जब इस्लामी जनक्रांति सफल हो रही थी तो अमेरिका और इस्राईल ने अपने हितों को खतरे में पड़ता देखा इसलिए उन्होंने इस क्रांति को उसके अस्ली मार्ग से दिग्भ्रमित करने के किसी भी प्रयास में संकोच से काम नहीं लिया। यद्यपि इस्लाम के शत्रु मिस्र और दूसरे देशों में आने वाली जनक्रांतियों को उसके मुख्य मार्ग से हटाने में सफल नहीं हुए परंतु वे अब भी गुप्तचर सेवाओं की सहायता से इस क्रांति को उसके मुख्य मार्ग से हटाने के लिए प्रयासरत हैं और उसके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न कर रहे हैं।

इस समय क्षेत्र में इस्लामी जनक्रांति आने से इस्राईल विरोधी भावना में वृद्धि हो गयी है और क्षेत्र एवं उत्तरी अफ्रीक़ा के देश प्रदर्शन आयोजित करके अमेरिका और इस्राईल के विरुद्ध नारे लगा रहे हैं।

 

 

जिन देशों में इस्लामी जनक्रांति आई उनमें इस्राईली दूतावास पर हमला हुआ, वह इस्राईल विरोधी भावना का मात्र एक भाग है। अमेरिका और इस्राईल इस बात को भलिभांति जानते हैं कि यह जनक्रांतियां साम्राज्य के विरुद्ध हैं इसलिए उन्होंने मुसलमानों के मध्य फूट डालना आरंभ कर दिया। शत्रुओं का मूल लक्ष्य मुसलमानों के मध्य फूट डालना है ताकि इस्लामी राष्ट्रों के ध्यान को इस्लाम के मूल शत्रुओं अमेरिका और इस्राईल से हटाया जा सके। इसी प्रकार इस्लाम के शत्रुओं का एक अन्य लक्ष्य इस्लामी समाज में होने वाली प्रगति से मुसलमानों के ध्यान को हटाना है।

इस्लामी देशों और जनक्रांति के विरुद्ध विभिन्न षडयंत्रों के दृष्टिगत एकता, इस्लामी जागरुकता के लिए आवश्यक है और इस्लामी जनक्रांतियों के सफल होने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यदि विश्व के समस्त मुसलमान एकजुट हो जायें तो इस्लाम के शत्रुओं के फूट डालने सहित समस्त षडयंत्रों को विफल बनाया जा सकता है।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के अनुभव ने सिद्ध कर दिया है कि शत्रुओं के विभिन्न षडयंत्रों के बावजूद जनक्रांति जारी रहेगी और अंततः वह सफल होगी। शत्रुओं के विभिन्न षडयंत्रों के बावजूद ईरान की इस्लामी क्रांति प्रगति कर रही है और उसकी सफलता का रहस्य ईरानी जनता के मध्य एकता एवं उसका ईरान के शत्रुओं के षडयंत्रों से अवगत होना है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ईरान की इस्लामी क्रांति को सामाजिक आदर्श होने से कहीं अधिक प्रेरणादायक स्रोत समझा जाता है।

 

 

इस्लामी देशों में इस्लामी जागरुकता के दो आयाम हैं। उसका एक आयाम यह है कि वह मुसलमानों के मध्य धार्मिक पहचान और आभास के मज़बूत होने का कारण बनी है और उसका दूसरा आयाम यह है कि वह समाजों में इस्लाम के राजनीतिक जीवन के शीघ्र फैलने का कारण बनी है।

ईरान के अत्याचारी शासक शाह की सरकार को गिराने हेतु ईरानी जनता के प्रयास ने दूसरे इस्लामी देशों की जनता पर बहुत सकारात्मक प्रभाव डाला है और बहरैनी तथा मिस्री समाज में होने वाले परिवर्तनों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रतिष्ठा और स्वाधीनता का व्यवहारिक होना तथा जनता का इस्लाम प्रेम इस्लामी जनक्रांति के गठन का कारण बना है और ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में इस्लामी जागरुकता का आरंभ ईरान की इस्लामी क्रांति से हुआ है और इस समय वह विश्व में विस्तृत हो रही है।

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