यह वेबसाइट बंद हो गई है। हमारी नई वेबसाइट हैः Parstoday Hindi
शनिवार, 31 जनवरी 2015 15:32

इमाम ख़ुमैनी, मानव प्रतिष्ठ की रक्षा करने वाले मार्गदर्शक

इमाम ख़ुमैनी, मानव प्रतिष्ठ की रक्षा करने वाले मार्गदर्शक

36 साल पहले ईरान की जनता ने इन्हीं दिनों में इतिहास के सबसे मधुर और मनमोहक कालखंड का अनुभव किया। जनता अपनी क्रान्ति को सफलता की दहलीज़ पर पहुंचाने के लिए इस प्रकार संघर्षरत थी कि सारी दुनिया इसे देखकर आश्चर्यचकित थी। दूसरी ओर पहलवी सरकार ने साम्राज्यवादी आक़ाओं की चाटुकारिता की हद कर दी थी क्योंकि अमरीका और ब्रिटेन के समर्थन के कारण ही वह ईरान की जनता पर अपना अस्तित्व थोपे रखने में सफल रही थी। लेकिन इस व्यापक समर्थन के बावजूद शाही सरकार जनता के ईमान और इच्छाशक्ति के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गई। इस्लामी क्रान्ति की सफलता इतनी चमत्कारिक थी कि भौतिक और प्रचलित सांसारिक समीकरणों के आधार पर इसे समझ पाना असंभव है। राजनैतिक टीकाकार हैरान थे कि इस विजय का किस प्रकार विशलेषण करें और इसे किस सिद्धांत की कसौटी पर परखें। कई साल से संघर्षरत रहने वाली ईरान की जनता को भी पूरा यक़ीन था कि इमाम ख़ुमैनी का युक्तिपूर्ण नेतृत्व न होता तो इस्लामी क्रान्ति का सफल हो पाना संभव नहीं था।

 

 

इमाम ख़ुमैनी वह महान आध्यात्मिक नेता थे जिन्होंने इस्लाम को नया जीवन देने और शत्रुओं से उसे बचाने के लिए आंदोलन छेड़ा। उन्होंने कई अवसरों पर कहा कि यदि एक व्यक्ति भी मेरा साथ न दे तब भी मैं इस सरकार के अत्याचार पर ख़ामोश नहीं रहूंगा, बल्कि इस्लाम की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहूंगा। इमाम ख़ुमैनी का फ़ौलादी इरादा और तथा क्रान्तिकारी आंदोलन की सत्यता पर उनका गहरा ईमान उन लोगों के लिए बहुत आश्चर्यजनक था जो इस्लाम की असलियत से परिचित नहीं थे। ईमान तथा जनता की इच्छाशक्ति पर इमाम ख़ुमैनी का भरोसा भी स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की बहुत बड़ी विशेषता थी। इमाम ख़ुमैनी ने हमेशा आम जनमानस पर भरोसा किया इसी लिए उन्हें आंतरिक या विदेशी किसी भी शक्ति के समर्थन और योगदान की ज़रूरत नहीं पड़ी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में बड़ी विचित्र विशेषताएं थीं जिनमें हरेक के विशलेषण के लिए एक अलग कार्यक्रम की आवश्यकता है। इस कार्यक्रम में हम स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्वा के केवल एक पहलू की समीक्षा करेंगे और वह है मानव प्रतिष्ठा पर इमाम ख़ुमैनी का विशेष ध्यान।

 

ईश्वर ने इंसान के अस्तित्व में एक मूल्यवान रत्न रखा है जिसे मानव प्रतिष्ठा कहते हैं। ईश्वर ने इंसान को बड़ा सम्मान दिया। जब उसकी रचना की तो फ़रिश्तों को आदेश दिया कि वे उसकी प्रतिष्ठा के सामने सजदा करें। ईश्वर ने शैतान को केवल इस लिए दुत्कार दिया कि उसने मानव प्रतिष्ठा को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और ईश्वर के आदेश की अवमानना करते हुए ज़िद और घमंड का प्रदर्शन किया। ईश्वर ने जहां एक तरफ़ फ़रिश्तों को इंसान की गरिमा की ओर उन्मुख करवाया वहीं इंसानों को भी आदेश दिया कि वे एक दूसरे की प्रतिष्ठा का सम्मान करें। ईश्वर ने इस बात पर इतना अधिक बल दिया है कि मानो जो भी इंसान की प्रतिष्ठा का ख़्याल न रखे उसका अंजाम शैतान से बेहतर नहीं होगा।

 

 

आज की दुनिया में वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और कन्वेन्शनों में बार बार मानव गरिमा की रक्षा पर बल दिया जाता है, इस संबंध में घोषणापत्र जारी किए जाते हैं किंतु व्यवहारिक चरण में देखिए तो दुनिया में कहीं न कहीं रोज़ ही मानव गरिमा कुचली जाती है और इसे बड़ी शक्तियों के स्वार्थों की भेंट चढ़ाया जाता है। मानवाधिकार और आज़ादी के नारे पश्चिमी राजनेताओं के भाषणों की शोभा बने हुए हैं किंतु रंग, नस्ल, धर्म, जैसे अनेक बहानों से आए दिन इंसानों के मूल अधिकारों का हनन किया जाता है। यदि साम्राज्यवादी शक्तियों के राजनैतिक खेल को छोड़ दिया जाए तो इस विरोधाभास की जड़ इंसान के बारे में पश्चिम का दृष्टिकोण है। चूंकि इस दृष्टिकोण पर भौतिकवाद छाया हुआ है अतः मानव प्रतिष्ठा को भी भौतिकवादी कसौटी पर परखा जाता है। यही कारण है कि जो लोग पश्चिम के विदित रूप से विकसित दिखाई देने वाले आदर्शों के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं वह भी वास्तविक रूप से मानव प्रतिष्ठा की ऊंचाई का आभास नहीं कर पाते।

 

 

इस्लामी दृष्टिकोण में मानव प्रतिष्ठा का स्रोत आध्यात्मिक और ईश्वरीय है। अर्थात इंसान का गौरव इस लिए है कि ईश्वर ने उसे सर्वश्रेष्ठ रचना क़रार दिया है तथा ईश्वर उसे ऐसा प्राणी मानता है जो उसका सामिप्य प्राप्त कर सकता है। इस्लामी दृष्टिकोण से इंसान वह प्राणी है जो जीवन के किसी भी चरण में उस बुद्धि और इच्छाशक्ति के सहारे जो ईश्वर ने उसके अस्तित्व में रखी है, बंदगी के रास्ते पर चलते हुए इतनी ऊंचाई पर पहुंच सकता है कि फ़रिश्ते भी उसे सलाम करें। मनुष्य के बारे में यही आकर्षक दृष्टिकोण यह बताता है कि मानव गरिमा की किसी भी स्थिति में उपेक्षा नहीं की जा सकती यहां तक कि केवल मोमिन बंदे ही नहीं बल्कि जिन तक धर्म का संदेश नहीं पहुंच सका है बल्कि वह लोग भी जो गुमराही के रास्ते पर चल पड़े हैं, सम्मान के पात्र हैं।

 

 

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी स्वयं भी एक महान हस्ती थे और मानव प्रतिष्ठा के सर्वोच्च बिंदु पर हमेशा ध्यान रखते थे। उनका मानना था कि मनुष्य को तुच्छ समझना और उसका अपमान करना, तबाही का मार्ग है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की दृष्टि में हर प्राणी और विशेष रूप से इंसान के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार अनिवार्य है इस लिए ईश्वर इन प्राणियों से प्रेम करता है और यदि कोई इससे हटकर अलग सोच रखता है तो यह संकीर्ण दृष्टि और ग़लत सोच है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने इस दृष्टिकोण के साथ ईरान की जनता का नेतृत्व आरंभ किया जो इस्लाम की छत्रछाया में मानव प्रतिष्ठा की बहाली के लिए प्रयासरत  थी।

 

 

इमाम ख़ुमैनी के आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ कैपिच्युलुशन क़ानून था। इस क़ानून के अनुसार अमरीकी नागरिक जिनका ईरान के लोगों से रवैया कुछ ठीक नहीं था, केवल इस लिए हर प्रकार की न्यायिक कार्यवाही से अपवाद थे क्यों कि वे अमरीकी नागरिक थे अतः यदि वे किसी ईरानी नागरिक विरुद कोई आपराधिक कार्यवाही करते हैं तो ईरान की किसी भी अदालत में उन पर मुक़द्दमा नहीं चलाया जा सकता था। इमाम ख़ुमैनी ने इस क़ानून का भारी विरोध किया और आम जनता को इस क़ानून के निहितार्थ से अवगत कराया। ईरान की जनता को इस क़ानून की वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो उन्हें यह लगा कि इस क़ानून से अधिकारों की हनन किया जा रहा है अतः मानव प्रतिष्ठा का हनन करने वाले इस क़ानून के विरुद्ध लोग उठ खड़े हुए। इस प्रकार देखा जाए तो इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान की जनता के आंदोलन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मानव प्रतिष्ठा का रक्षा का मामला उठा।

पहलवी शाही सरकार के विरुद्ध वर्षों के संघर्ष और निर्वासन के बाद जब स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी पहली फ़रवरी 1979 को स्वदेश लौटै तो शासन की शैली तथा संविधान के निर्धारण में भी आम जनता की स्वतंत्रता और अधिकार पर पूरा ध्यान दिया। इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद अपने दृष्टगत सरकार का प्रारूप पेश कर दिया और इस पर जनमत संग्रह कराया। इसके बाद संविधान के मसौदे पर भी जनमत संग्रह कराया। इस प्रकार समाज के हर सदस्य के अधिकार को सम्मान दिया गया। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने लोकप्रियता के चरमबिंदु पर होने के बावजूद अपनी मर्जी जनता पर नहीं थोपी। आज़ादी और अख़तियार मानव प्रतिष्ठा के दो मूल स्तंभ हैं। इसी प्रकार असीम आज़ादी भी मानव प्रतिष्ठा के विपरीत है।

 

 

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की विनम्रता और स्वभाव उदाहरणीय था। चूंकि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इंसान को अल्लाह की महान रचना मानते थे अतः इंसान की सेवा को अपना सौभाग्य समझते थे। उनका कहना था कि जनता देश के अधिकारियों की मालिक है। जब भी अपनी बात करनी होती तो बड़े ही सामान्य शब्दों का प्रयोग करते थे जैसा कि उन्होंने अपने वसीयतनामे में स्वयं को मामूली धार्मिक छात्र कहा है। आम लोगों के सामने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी इतने विनम्र रहते थे कि देखने वालों की आंखों से आंसू टपक पड़ते थे कि इतना महान इंसान किस प्रकार स्वयं को आम लोगों के सामने बहुत मामूली और तुच्छ समझता है। वे स्वार्थ, आत्म मुग्धता और पद और ओहदे के प्रेम से स्वयं को हमेशा मुक्त रखने पर बल  देते थे।

 

 

मानव प्रतिष्ठा को बहुत अधिक महत्व देने का एक परिणाम यह था कि स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी यह पसंद नहीं करते थे कि उन्हें किसी पीर की भांति सम्मान दिया जाए। इतिहास में शायद ही कोई एसा नेता मिले जो इतने महान आंदोलन का नेतृत्व करने के बाद भी इस बात को पसंद न करे कि उस पर विशेष ध्यान दिया जाए। इस्लामी क्रान्ति की स फलता से पहले भी जब स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी केवल एक धार्मिक छात्र थे और कुछ क्लासें पढ़ाते थे तो उस समय धार्मिक शिक्षा केन्द्र में यह पराम्परा थी कि जब क्लास समाप्त हो जाती थी कि शिष्य उन्हें छोड़ने के लिए कुछ दूर साथ जाना चाहते तो वे मना करते थे। इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद भी जब कभी उनकी तारीफ़ की जाती तो वे नापसंदीदगी ज़ाहिर करते थे। इसका कारण यह था कि इमाम ख़ुमैनी की नज़र में ईश्वर की ख़ुशी के अलावा किसी चीज़ को कोई महत्व नहीं देते थे। उनका कहना था कि इंसान इतना प्रतिष्ठित प्राणी है कि उसके लिए उचित नहीं है कि किसी इंसान का मुरीद बने।

 

 

इमाम ख़ुमैनी एक अद्वितीय क्रान्तिकारी नेता थे। उनकी सोच वैश्विक सुधारक नेता की सोच थी वे किसी नस्ल जाति दल या वर्ग तक सीमित नहीं थे। महान नेता होने के साथ ही वे महान धर्मगुरू भी थे। यह विशेषता एसी थी जो अन्य नेताओं से उन्हें बिल्कुल अलग कर देती है। दरअस्ल स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी चूंकि स्वयं भी एक महान हस्ती थे अतः उन्होंने बड़ा गहरा प्रभाव छोड़ा। एसा प्रभाव जो दशकों का समय बीत जाने के बाद भी कम नहीं हुआ है बल्कि ईरान ही नहीं, विश्व स्तर पर उनका यह प्रभाव और उनके प्रति प्रेम निरंतर बढ़ रहा है।    

  फेसबुक पर हमें लाइक करें, क्लिक करें 

 

  

Add comment


Security code
Refresh