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शनिवार, 31 जनवरी 2015 14:50

इस्लामी क्रांति की सफलता-1

इस्लामी क्रांति की सफलता-1

वरिष्ठ नेता ने ईरान की इस्लामी क्रांति के विरुद्ध साम्रज्यवादियों की शत्रुता के विश्लेषण में इस बिन्दु की ओर संकेत किया कि ईरान की इस्लामी व्यवस्था के विरुद्ध शत्रुता व द्वेष का आरंभ, क्रांति की सफलता के आरंभिक दिनों से ही हो गया था। यह धीरे धीरे गहरा एवं विस्तृत होता गया। इस शत्रुता की अगुवाई अमेरिका और जायोनी शासन ने की और वे कर रहे हैं क्योंकि क्षेत्र के सबसे निकट घटक यानी शाह की अत्याचारी सरकार का अंत हो गया और ईरान में वे अपने अवैध राजनीतिक एवं आर्थिक हितों से वंचित हो गये।

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति का मुख्य नारा हर प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारना और अत्याचार का विरोध करना तथा उसने अपने इस नारे से वर्चस्ववादी शक्तियों के मार्ग में बड़ी चुनौती उत्पन्न कर दी। इस आधार पर वर्चस्ववाद  एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष ईरान की इस्लामी व्यवस्था की एक विशेषता है।

ईरान की इस्लामी व्यवस्था का आधार सत्य व न्याय के मार्ग में संघर्ष पर रखा गया है और इसी कारण ईरान की इस्लामी क्रांति का इतिहास अत्याचार एवं उसके समस्त प्रतीकों से संघर्ष व प्रतिरोध से भरा पड़ा है। अत्याचार व अन्याय से संघर्ष की भावना न केवल ईरानी राष्ट्र बल्कि विश्व के समस्त राष्ट्रों में पाई जाती है। इस भावना ने अत्याचार व साम्राज्य से संघर्ष की भूमि प्रशस्त कर दी है। यह भावना जहां विश्व के कमजोर राष्ट्रों के मध्य आशा की किरण बनी है वहीं यह भावना वर्चस्ववादी शक्तियों के मार्ग की सबसे बड़ी चुनौती बन गयी है।

 

 

ईरान की इस्लामी व्यवस्था हर प्रकार के वर्चस्व व साम्राज्य को नकार कर और धार्मिक मूल्यों को जीवित करके विश्व के कमज़ोर राष्ट्रों की जागरुकता के केन्द्र में परिवर्तित हो गयी है। इसी कारण अमेरिका और उसके घटक इस्लामी क्रांति को दबाने और उसे बढने से रोकने के लिए उसके मार्ग में रुकावटें उत्पन्न करते- रहते हैं। अमेरिका ने ईरान की इस्लामी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए अपना पूरा प्रयास किया क्योंकि इस्लामी क्रांति की सफलता ने ईरानी राष्ट्र पर वर्चस्व जमाने हेतु साम्राज्यवादियों के समस्त प्रयासों व षडयंत्रों पर पानी फेर दिया। इस प्रकार ईरानी राष्ट्र के जीवन में नया परिवर्तन अस्तित्व में आया।

 

 

अमेरिका गत ३६ वर्षों के दौरान ईरानी राष्ट्र के सामने रुकावटें पैदा करता रहा है और जिस ओर से देखा जाये उसकी शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों को भलिभांति देखा जा सकता है। गत ३६ वर्षों के दौरान अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध नाना प्रकार के अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लगाये हैं और ईरान के विरुद्ध उसकी शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां न केवल रुकी नहीं हैं बल्कि वह और भी जटिल होती गयीं।

अमेरिका द्वारा ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का लंबा इतिहास रहा है। २८ मुर्दाद १३३२ अर्थात वर्ष १९५३ का विद्रोह, यहां तक कि इस्लामी क्रांति तक की घटनाएं एवं कार्यवाहियां इस बात का कारण बनीं कि स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने उसे बड़े शैतान की संज्ञा दी। जिमी कार्टर की सरकार में तत्कालीन विदेशमंत्री साइरेस राबर्ट वेन्स ने ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बारे में अपने दृष्टिकोणों को इस प्रकार बयान किया” ईरान का अमेरिका के घटक देशों की पंक्ति से निकल जाना और उस देश की सत्ता का एसे हाथों में चला जाना जो हमारे दोस्त नहीं हैं मध्यपूर्व और दक्षिण पश्चिम एशिया में हमारे राजनीतिक एवं सुरक्षा हितों को बुनियादी झटका है”

 

 

इसी कारण अमेरिका ने इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से विभिन्न बहानों व शैलियों से ईरान की इस्लामी व्यवस्था को अपनी वर्चस्ववादी मांगों के समक्ष घुटने टेक देने का प्रयास किया।

अमेरिका ने ईरान- इराक युद्ध करवाके और आर्थिक परिवेष्टन करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ईरान को अलग- थलग करने का प्रयास किया। अमेरिका के विदेशमंत्रालय के पूर्व सहायक मार्थिन इंडिक इस बारे में कहते हैं” इस्लामी क्रांति का परिवेष्टन एवं उसे दिया जाने वाला दंड उन  देशों के लिए पाठ हो जायेगा जो अमेरिकी वर्चस्व से स्वतंत्रता पाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं”

अमेरिकी अधिकारियों ने अनुभवों से सीख लिया कि ईरान को प्रतिबंधों और धमकियों आदि से न तो डराया जा सकता है और न ही वह अमेरिका की वर्चस्वादी मांगों को स्वीकार करेगा। यह ईरान की इस्लामी क्रांति का महत्वपूर्ण संदेश उन राष्ट्रों के लिए भी है जो वर्चस्ववाद के चंगुल से वास्तव में स्वतंत्रता चाहते हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने पूरब और पश्चिम की वर्चस्ववादी मांगों को कभी भी स्वीकार नहीं किया और आज भी वह इस संवेदनशील समय में साम्राज्यवादी शक्तियों से मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिकी अधिकारियों ने इसी तरह अनुभवों से सीख लिया है कि वर्चस्ववाद से मुकाबला ईरान का केवल नारा नहीं है बल्कि उसने वास्तव में अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया है कि वह वर्चस्ववाद का मुखर विरोधी है और ईरान की इस्लामी क्रांति उन मूल्यों का उदाहरण है जिस पर ईरानी राष्ट्र गहरी व पूरी आस्था रखता है और इन्हीं मूल्यों के आधार पर वह साम्राज्य के मुकाबले में डटा हुआ है। ईरानी राष्ट्र का यह साहसिक प्रतिरोध उसके शत्रुओं के लिए स्पष्ट संदेश है।

 

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में अधिक धमकियां ईरान की इस्लामी व्यवस्था की शक्ति की सूचक हैं क्योंकि अगर इस्लामी गणतंत्र ईरान के पास अधिक व प्रभावी शक्ति न होती तो ईरानी राष्ट्र का बुरा चाहने वाले इस प्रकार की बात न करते।“

ईरान की इस्लामी क्रांति को सफल हुए ३६ वर्षों का समय बीत रहा है और यह क्रांति अब भी जागरुक, स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा चाहने वालों के लिए बहुत अधिक महत्व व आकर्षण रखती है। इस आधार पर बिल्कुल स्पष्ट है कि साम्राज्यवादी शक्तियां क्यों ईरान की इस्लामी क्रांति को पसंद नहीं करती हैं और इन शक्तियों ने जिस प्रकार इसे क्षति पहुंचाने का प्रयास किया उसे क्षति न पहुंचा पाईं।

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता ने साम्रराज्यवादी शक्तियों को तीन महत्वपूर्ण कारणों से सोचने पर विवश कर दिया है और वे इन चीजों से चिंतत हैं। पहला यह कि इस क्रांति ने पश्चिम के वर्चस्व के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है और यह दर्शा दिया है कि एक राष्ट्र खाली हाथों से भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी शक्तियों के समीकरणों को परिवर्तित कर सकता है।

 

 

दूसरा कारण यह है कि ईरान बड़ी शक्तियों पर भरोसा किये बिना आगे बढ रहा है। उसने अपने व्यवहार से दर्शा दिया है कि न पूरब न पश्चिम की बल्कि उसके पास जनसमर्थन की भारी शक्ति मौजूद है। वास्तव में ईरान ने दो ध्रुवी व्यवस्था से हटकर विश्व के समक्ष एक नया दृष्टिकोण पेश किया है। वह दृष्टिकोण यह है कि अपनी क्षमताओं व संभावनाओं पर भरोसा करके प्रगति की जा सकती है और विश्व के वर्चस्वादियों से कमज़ोर राष्ट्रों के अधिकारों को दिलाया जा सकता है।

अंतराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की इस्लामी क्रांति टिकाऊ व स्थाई परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है। इस क्रांति ने ईश्वरीय धर्म इस्लाम की राजनीतिक क्षमता को विश्व वासियों के समक्ष प्रदर्शित कर दिया और इसी परिप्रेक्ष्य में जागरुकता की लहर फैली।

 

 

साम्राज्यवादी शक्तियों की चिंता का तीसरा कारण यही वास्तविकता है यानी वे इस्लामी क्रांति की आकांक्षा के फैलने और उसके प्रभाव से भयभीत हैं क्योंकि विश्व की दूसरी क्रांतियों के विपरीत ईरान की इस्लामी क्रांति अपनी आकांक्षाओं से नहीं हटी है। इस महान क्रांति के बहुत से कारक हैं जो स्वयं में ताज़ें हैं क्योंकि राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक शिक्षाओं की छत्रछाया में प्रतिरोध और हर प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारना नीहित है। अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक, बुद्धिजीवी एवं विचारक नोअम चामस्की का मानना है कि जब तक ईरान स्वतंत्र रहेगा और अमेरिका के आधिपत्य के समक्ष घुटने नहीं टेकेगा तब तक अमेरिका से उसकी शत्रुता जारी रहेगी। अमेरिका की दृष्टि में इस्लामी गणतंत्र ईरान स्वीकार्य नहीं है क्योंकि वह अपनी स्वतंत्रता व स्वाधीनता की अनदेखी नहीं कर रहा है।“ इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी राष्ट्र ने हर प्रकार के षडयंत्र का डटकर मुकाबला किया और कर रहा है।

 

 

स्पष्ट है कि ईरान विश्व के स्वतंत्रता प्रेमी राष्ट्रों के लिए आदर्श में परिवर्तित हो गया है और यह वह चीज़ है जो साम्राज्यवादियों के हितों से मेल नहीं खाती है और इसी कारण अमेरिका की अगुवाई में विश्व साम्राज्य ईरान की इस्लामी क्रांति के समक्ष नाना प्रकार की समस्याएं व बाधायें उत्पन्न करता है।  

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