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मंगलवार, 04 फ़रवरी 2014 11:54

इस्लामी क्रांति की सफ़लता की वर्षगांठ- इस्लामी जागृति में इस्लामी क्रांति की भूमिका

इस्लामी क्रांति की सफ़लता की वर्षगांठ- इस्लामी जागृति में इस्लामी क्रांति की भूमिका

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के साथ वर्चस्ववादी शक्तियों के ख़िलाफ़ वैश्विक एवं जनांदोलन शुरू हो गया। इस आंदोलन ने धीरे धीरे इस्लामी जागरुकता का रूप धारण कर लिया और इस्लामी जगत विशेषकर पीड़ित समूहों में एक महान जागृति उत्पन्न हो गई। इस महान आंदोलन की विशेषता मध्यपूर्व में राजनीतिक जीवन का पुनर्जन्म है।

इस महान आंदोलन के राजनीतिक प्रभावों को उत्तरी अफ़्रीक़ी राष्ट्रों सहित मुस्लिम राष्ट्रों की मांगो में देखा जा सकता है। यही कारण है कि क्षेत्र की वर्तमान परिस्थितियों में पश्चिम की मूल वरीयता क्षेत्र में अपने प्रभाव को सुरक्षित रखने के लिए मध्यपूर्व एवं उत्तरी अफ़्रीक़ी भू राजनीति का प्रारूप तैयार करना है। साम्राज्यवाद ने इस साज़िश के लिए 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी के मध्य तक विभिन्न प्रकारों से प्रष्ठभूमि तैयार की, उदाहरण स्वरूप 1830 में फ़्रांस द्वारा अल्जीरिया पर अतिक्रमण, 1881 में ट्यूनीशिया पर अतिक्रमण, 1882 में ब्रिटेन द्वारा मिस्र पर आक्रमण और उसका अतिक्रमण, मोरक्को पर फ़्रांस का अतिक्रमण और 1912 में इटली द्वारा लीबिया पर अतिक्रमण। वास्तव में उत्तरी अफ़्रीक़ी देश पुराने समय से ही क्षेत्र में साम्राज्यवादियों की उपस्थिति के कारण, यूरोप की भू राजनीति का केन्द्र रहे हैं। जिस तरह से बाद के वर्षों में अरब देश विशेषकर तेल से समृद्ध मध्यपूर्व के देश अमरीका एवं पश्चिम के वर्चस्व के केन्द्र में परिवर्तित हो गए ताकि विश्व के ऊर्जा एवं तेल के भंडारों पर क़ब्ज़ा जमा सकें।

 

 

इतिहास साक्षी है कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने उस्मानी साम्राज्य के काल से ही इस्लामी देशों को विभाजित करना शुरू कर दिया और उस्मानी साम्राज्यवाद से स्वतंत्र हुए अरब देशों पर व्यापक वर्चस्व एवं नए मध्यपूर्व में अपने सामरिक उद्देशअयों तक पहुंचने के लिए अनुकूल परिस्थितियां देखीं। साम्राज्यवाद की इन गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में सन् 1948 में फ़िलिस्तीनी अवैध अधिकृत इलाक़ों में ज़ायोनी शासन की स्थापना की गई।

इस प्रकार, इस्लामी जागृति आंदोलन ने निष्क्रिय एवं सोए हुए इस्लामी राष्ट्रों को जगाया, यह ऐसा ऐतिहासिक आंदोलन है कि जिसने न्याय प्रेमी ईरानी राष्ट्र की इस्लामी क्रांति से प्रेरित होकर वर्षों से पीड़ित राष्ट्रों को कि जो परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे थे, क्रांतिकारी आंदोलन के लिए प्रेरित किया, ताकि वे क्षेत्रीय राजनीतिक व्यवस्था के सामने चुनौती पेश कर सकें और क्षेत्र के बुनियादी समीकरणों में बड़ा उलट फेर कर सकें।

अब कहा जा सकता है कि मध्यपूर्व नए दौर में प्रवेश कर रहा है कि जिसकी विशेषता क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों में क्रांतिकारी युवाओं द्वारा भूमिका निभाना है।

 

 

इस प्रकार, इस्लामी जागरुकता ने वर्चस्ववादी शक्तियों द्वारा पिछली कुछ शताब्दियों से हालिया वर्षों तक क्षेत्रीय राष्ट्रों पर थोपी गई अत्याचारपूर्ण एवं अन्यायपूर्ण नीतियों को निष्क्रिय कर दिया और क्षेत्रीय इतिहास में एक नया अध्याय खोल दिया।

इस्लामी जागरुकता पर इस्लामी क्रांति के प्रभाव के कारण, यह आंदोलन प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है। और अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो इस क्रांतिकारी आंदोलन ने पहला चरण पार कर लिया है और क्षेत्र में शक्ति के समीकरणों को परिवर्तित कर दिया है। इस्लामी जागृति एवं इस्लामी क्रांति के बीच दूसरा संयुक्त बिंदु, पश्चिम द्वारा वर्चस्ववाद विरोधी मोर्चे के रूप में दोनों आंदोलनों का व्यापक विरोध है। लेकिन जागृति आंदोलन और इस्लामी क्रांति के बीच एक अंतर है और वह यह कि इस्लामी जागृति एक क्रांतिकारी आंदलोन के रूप में प्रगति का अनुभव कर रही है ताकि अपनी महत्वपूर्ण आकांक्षाओं तक पहुंच सके, इसलिए जागृति के इस मार्ग में चुनौतियां एवं कठिनाईयां हैं, जबकि इस्लामी क्रांति कठिन संकटों से पार हो चुकी है।

इस्लामी क्रांति ने जनांदोल द्वारा इस्लामी जागरुकता उत्पन्न करने के अतिरिक्त महान सामाजिक आंदोलन उत्पन्न करने में भी भूमिका निभाई है। दूसरे शब्दों में ईरान की इस्लामी क्रांति की न्याय प्रेमी एवं साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा, उत्तरी अफ़्रीक़ा एवं मध्यपूर्व में इस्लामी जागृति आंदोलन के लिए प्रेरणा स्रोत बनी और क्षेत्रीय मुसलमानों के लिए इस्लामी पहचान को पुनर्जीवित करने एवं सम्मान की सुरक्षा करने के लिए भूमि प्रशस्त की।

 

 

इस्लामी क्रांति ने मुसलमानों को धर्म की ओर वापस लौटने के लिए प्रेरित किया और सामाजिक परिवर्तनों एवं शासन व्यवस्था की स्थापना में इस्लाम की प्रतिभा को सिद्ध करते हुए स्वाधीनता एवं स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु इस्लामी जागृति को प्रबल किया। क्रांति की इस घटना ने एक प्रकार से इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित इस्लामी समाज का प्रचार प्रसार किया। यह क़दम इस बात का साक्षी है कि ईरान की इस्लामी क्रांति ने अमरीका एवं ज़ायोनी शासन से मुक़ाबले के लिए पीड़ित राष्ट्रों में जान फूंक दी। यह समस्त उद्देश्य इस्लामी क्रांति की महत्वाकांक्षा एवं सिद्धांत हैं तथा इस्लामी क्रांत उनकी प्राप्ति चाहती है। यही कारण है कि अमरीका और ज़ायोनी शासन इस्लामी जागृति को अपनी अतिक्रमणकारी नीतियों के लिए ख़तरा मानते हैं और उन्हें इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस्लामी जागृति अपने विकास के मार्ग पर प्रतिदिन विश्व समुदाय के निकट अधिक महत्व प्राप्त करती जा रही है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पिछले तीन दशकों से भी अधिक से क्षेत्रीय राष्ट्रों ने ईरान की इस्लामी क्रांति से मूल्यवान अनुभव प्राप्त किए हैं और इस वास्तविकता को समझ लिया है कि क्षेत्र में हस्तक्षेप करने वाली शक्तियों का उद्देश्य यह है कि वह ऐसे तत्वों को सत्ता सौंपे कि जो अमरीका एवं पश्चिम के लिए प्रतिबद्ध हों।

विश्व के स्वतंत्र राष्ट्रों की दृष्टि में इस्लामी क्रांति, इस्लामी जागृति विचारधारा के रूप में नए वर्ग के लिए सही इस्लामी विचारधारा को पुनर्जीवित कर सकी और  उसने लोकतंत्र के साथ इस्लाम के सामंजस्य का उल्लेख करके मुसलमानों को पुनः इस्लामी पहचान दी तथा उनमें सम्मान एवं आत्मविश्वास उत्पन्न किया।

यही कारण है कि पश्चिम, इस्लामी जागृति के लिए वैचारिक आदर्श के रूप में ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रहा है ताकि वर्चस्ववादी व्यवस्था के विरुद्ध इस्लामी प्रतिरोध को शक्तिशाली होने से रोक सके। सभ्यताओं के टकराव के विचारक हंटिंगटन ने सन् 1993 में राजनीतिक इस्लाम को इस्लामी क्रांति से प्रेरित बताया था और कहा था कि जो इस्लाम स्वयं को पश्चिम का प्रतिद्वंद्वी मानता है, अमरीकी वैश्विक व्यवस्था के लिए गंभीर ख़तरा है कि जो धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहती है। वास्तव में इस्लामी क्रांति ने सामाजिक न्याय एवं समानता के प्रयासों को पुनर्जीवित किया और मुसलमानों को पश्चिम के मुक़ाबले में खड़ा होने के लिए प्रोत्साहित किया और इस वास्तविकता को कि इस्लाम मूल समाधान एवं जिहाद मूल साधन है, सम्राज्यवादी शक्तियों का मुक़ाबला करने वाले राष्ट्रों विशेषकर इस्लामी देशों तक हस्तानांतरित किया।

निःसंदेह यह महान आंदोलन संवेदनशील एवं ऐतिहासिक काल में उत्पन्न हुआ है और अमरीका भरपूर प्रयास कर रहा है कि वह क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनक्रमों को आतंकवाद से मुक़ाबले एवं विश्व शांति के बहाने उनके मूल लक्ष्य से भटका दे। अमरीका ने इस संदर्भ में पूर्वाक्रमण की योजना को कार्यान्वित किया और इस स्ट्रेटजी को पूरा करने एवं विश्व पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए विश्व के 136 से अधिक देशों में सैन्य अड्डों की स्थापना करके व्यवहारिक रूप से रिक्तिपूर्व युद्धों की शुरूआत कर चुका है।

 

 

इन लक्षित अतंरराष्ट्रीय विरोधाभासों में से दो देशों 2001 में अफ़ग़ानिस्तान और 2003 में इराक़ के प्रत्यक्ष रूप से अतिक्रमण की ओर संकेत किया जा सकता है कि जो आतकंवाद से लड़ाई के बहाने किया गया था और जिसे 11 सितम्बर की घटना का प्रतिशोध क़रार दिया गया।                                   

अमरीका अभी भी मध्यपूर्व एवं उत्तरी अफ़्रीक़ा के स्ट्रेटजिक क्षेत्रों में अपने वर्चस्ववादी हस्तक्षेप को व्यापक करके क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर पूर्ण निंयत्रण करने की चेष्टा में है।

इस प्रक्रिया ने विशेष रूप से मिस्र में गहरा प्रभाव छोड़ा है। धर्म-निरपेक्षता शासनों को आदर्श बनाकर पेश करने से पश्चिम का महत्वपूर्ण उद्देश्य जागरुकता आंदोलन को धर्म के मार्ग से अलग करना है। इस प्रकार वर्तमान समय में वर्चस्ववादी शक्तियों के लिए जो चीज़ महत्वपूर्ण है, वह यह है कि किस प्रकार इन जनांदोलनों को पश्चिमी लोकतंत्र के प्रारूप में पेश करके उन्हें उनके मूल मार्ग से भटकाया जाए।

इस प्रकार, इस्लामी जागृति पर इस्लामी क्रांति के प्रभावों की समीक्षा के लिए इस्लामी जागृति के सामने मौजूद चुनौतियों और उनका मुक़ाबला करने के मार्गों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मोटे तौर पर इस्लामी जागृति को क्रांतिकारी मानसिकता एवं आइडियालॉजी का परिणाम माना जा सकता है। राजनीतिक टीकाकारों के अनुसार, इस तरह इस्लामी क्रांति के विचार एवं आइडियालॉजी का नए रूप एवं आयामों में विस्तार हो रहा है। लेकिन इस्लामी जागृति पर इस्लामी क्रांति के प्रभाव की तुलनात्मक समीक्षा में जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह समाज के उन वर्गों पर ध्यान केन्द्रित करना है कि जिन्होंने इस्लामी जागरुकता के लिए भूमि प्रशस्त की है। यह अंतर एवं समानताएं इस्लामी क्रांति एवं इस्लामी जागृति आंदोलन के सामने मौजूद चुनौतियों एवं अवसरों को दर्शाती हैं।   

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