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मंगलवार, 04 फ़रवरी 2014 11:04

इस्लामी क्रान्ति़-३

इस्लामी क्रान्ति़-३

इस्लामी क्रान्ति की एक और महत्वपूर्ण विशेषता ईरानी राष्ट्र के भविष्य पर विदेशी वर्चस्व को पूर्ण रूप से नकारना और स्वाधीनता की रक्षा करना है। ईरान की इस महाक्रान्ति के दूरदर्शी नेता के रूप में इमाम ख़ुमैनी विदेशी वर्चस्व को नकारने के नारे के साथ ईरान से बाहरी शक्तियों के प्रभाव व हस्तक्षेप से ईरानी जनता को मुक्ति दिलाने के लिए उठे थे। इस प्रकार इस्लामी क्रान्ति के दौरान स्वाधीनता और वर्चस्व को समाप्त करना, ईरानी राष्ट्र का मुख्य नारा था। ईरान में इस्लामी क्रान्ति शुरु होते ही ईरानी जनता के हर वर्ग ने चाहे वह युवा हो, पुरुष हो या महिला सबने स्वाधीनता की प्राप्ति और बाहरी शक्तियों विशेष रूप से अमरीका के हस्तक्षेप को ख़त्म करने की मांग की ताकि दूसरो पर निर्भरता के कटु अनुभव से मुक्ति पा सके।

 

 

जैसा कि आप जानते हैं कि दुनिया में ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो दूसरों पर वर्चस्व जमाने के इच्छुक रहे और कभी भी मनुष्य के अधिकारों का सम्मान नहीं किया और दूसरों की इच्छाओं को कभी महत्व नहीं दिया और न देते हैं।  ऐसे लोग अपने दुष्ट लक्ष्य साधने के लिए स्वतंत्रता, प्रजातंत्र और शांति जैसे नारों का दुरुपयोग करते हैं। वर्चस्व जमाने की यह इच्छा अतीत से दूसरे देशों के मामलों के शक्तिशाली देशों के हस्तक्षेप का कारण बनी है। यही कारण है कि समकालीन युग में वर्चस्व के प्रतीक के रूप में साम्राज्य से संघर्ष की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता से विश्व ने इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक जनक्रान्ति की विशेषताओं को देखा। इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता स्वाधीनता और अत्याचार से मुक़ाबला भी है।

स्वाधीनता की प्राप्ति और वर्चस्व को नकारने का आधार आस्था और इसके वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सहित और भी पहलू हैं। इस्लाम में मुसलमानों पर ग़ैर मुसलमान के वर्चस्व को न स्वीकार करने पर बल दिया गया है। ईश्वर ने ईमान रखने वाले मुसलमानों को वर्चस्व स्वीकार करने से मना किया है। इसी सिद्धांत की ओर ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन के निसा नामक सूरे की आयत क्रमांक 141 में इशारा किया है।  आयत क्रमांक 141 में आया हैः ईश्वर ने नास्तिकों को मोमिनों पर वर्चस्व नहीं दिया है।

 

 

इस सिद्धांत को मुसलमानों पर नास्तिकों के मार्ग को बंद करने के रूप में याद किया गया है। इस्लामी इतिहास में नास्तिकों के ख़िलाफ़ मुसलमानों के अनेक संघर्ष इसी सिद्धांत के आधार पर हुए हैं। विदेशियों व साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ ऐसे संघर्ष की कमान धर्मगुरुओं के हाथ में थी जिसने इस्लामी देशों पर विदेशियों के हस्तक्षेप को बंद कर दिया है। इस प्रकार के संघर्ष की मिसाल ईरान की इस्लामी क्रान्ति है जिसने ईरान पर बाहरी शक्तियों विशेष रूप से अमरीका के वर्षों पुराने वर्चस्व को ख़त्म कर दिया।

इस्लाम ने ईश्वर के तत्वदर्शी संकल्प द्वारा इस्लामी समाज की बुनियाद सम्मान, उदारता और विदेशियों के वर्चस्व के इंकार पर रखी है जिसमें विदेशियों के आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वर्चस्व का इंकार शामिल है।                     

शब्दकोष में वर्चस्व का अर्थ ज़बरदस्ती आधिपत्य जमाना है। क़ुरआन की इस्तेकबार शब्द को वर्चस्व और धौंस जमाने के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है कि जिसमें लोगों या दूसरे देशों पर राजनैतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक वर्चस्व जमाना है। साम्राज्यवादियों की एक पहचान यह है कि वे धन, शक्ति और विज्ञान से संपन्नता तथा प्रचार शक्ति का प्रयोग कर निर्धन लोगों के अधिकारों को हनन करते हैं और इसके पीछे साम्राज्यवादियों का घमंड व आत्ममुग्धता है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय क़ानून यह है कि सरकारों को शासन का समान अधिकार है, वे एक दूसरे का परस्पर सम्मान करें तथा देश एक दूसरे के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें किन्तु जब विश्व की राजनैतिक वास्तविकता पर नज़र डालते हैं तो वर्चस्ववादी व युद्धोन्मादी शक्तियों का प्रभाव हर जगह दिखाई देता है।

 

 

पवित्र क़ुरआन में साम्राज्य की जो पहचान बतायी गयी है वह वर्तमान युग में साम्राज्यवादी देशों की वर्चस्ववादी इच्छाओं से मेल खाती है इसलिए यह कहा जा सकता है कि पवित्र क़ुरआन का आदेश वर्तमान स्थिति से भी प्रासंगिक है। साम्राज्य राष्ट्रों को लूटता है और उनके अधिकारों का हनन करता है तथा मानवीय मूल्यों की अनदेखी करता है। यह चीज़ मिस्र में फ़िरऔन के वर्चस्ववादी क़दम से समानता रखती है। ऐसे असंतुलित व साम्राज्यवादी संबंध इस्लाम की दृष्टि में निंदनीय है। यही वह स्थिति है कि ईश्वर मुसलमानों पर नास्तिकों के किसी प्रकार के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करता। इस आधार पर मोमिनों को चाहिए कि वे नास्तिकों को अपना अभिभावक न बनाएं। मोमिनों को न केवल यह कि ईश्वर के शत्रुओं से मित्रता का अधिकार नहीं है बल्कि उनका यह दायित्व है कि वे पीड़ितों के समर्थन और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए साम्राज्यवादियों के ख़िलाफ़ उठ खड़े हों।

जैसा कि हमने यह कहा कि सर्वसमर्थ ईश्वर ने इस्लामी नियमों में मुसलमानों पर नास्तिकों के वर्चस्व के मार्ग को बंद कर दिया है। इसलिए नास्तिक किसी भी क्षेत्र में मुसलमानों पर वर्चस्व नहीं जमा सकता। दूसरे शब्दों में मुसलमानों पर ऐसे संबंध बनाना तथा ऐसे काम करना वर्जित हैं जो उन पर नास्तिकों के वर्चस्व का कारण बने। इस आधार पर इस्लाम की विदेश नीति सैद्धांति नीति पर आधारित है कि जिसके सही क्रियान्वयन का मूल्यवान परिणाम सामने आएगा और उसका पालन न करने से विश्व के राष्ट्रों व सरकारों से न तो सही संबंध बनेंगे और न ही संबंधों में स्थिरता नहीं आएगी।

रोकथाम का नियम मदीने में इस्लामी व्यवस्था की स्थापना के समय उतरा यानी जिस समय मुसलमानों की स्वाधीन सरकार थी और अन्य राष्ट्रों व धर्मों के साथ सहिष्णुता के लिए कुछ नियमों की ज़रूरत थी ताकि पड़ोसियों के साथ संबंध के माध्यम से लाभान्वित हों। जैसा कि मदीना में स्थिरता आने के थोड़े समय बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने तत्कालीन बड़े बड़े शासकों को अलग अलग ख़त लिख कर उन्हें इस्लाम का निमंत्रण दिया।    

 

          

धर्मगुरुओं ने रोकथाम के सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए कुछ तर्क पेश किए हैं। पवित्र क़ुरआन के मुनाफ़ेक़ून सूरे की आयत क्रमांक 8 में ईश्वर ने मोमिनों के सम्मान को अपने और अपने दूत के सम्मान के साथ बयान करते हुए कहा है कि सम्मान ईश्वर, उसके पैग़म्बर और मोमिनों से विशेष है। इसलिए ईश्वर ऐसे क़ानून नहीं बनाएगा जिससे मुसलमानों का अपमान हो और इस्लामी सरकार भी मुसलमानों के सम्मान और स्वाधीनता को आघात पहुंचाने वाली संधि स्वीकार नहीं करेगी। रोकथाम का सिद्धांत इस्लामी समाज के राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सैन्य सहित सभी आयामों से मुसलमानों पर नास्तिकों के वर्चस्व को नकारता है। इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह नास्तिकों के वर्चस्व के संबंध में लिखते हैं, यदि इस्लामी सरकार के अन्य सरकारों के साथ राजनैतिक संबंध, दूसरी सरकार के वर्चस्व या उनकी राजनैतिक निर्भरता का कारण बनेंगे, तो ऐसे संबंध की स्थापना वर्जित है और यदि कोई समझौता भी हुआ हो तो ऐसा समझौता निरस्त है। अलबत्ता इसका निरस्त होना उस ग़द्दारी के कारण है जो कुछ राष्ट्राध्यक्ष करते हैं वरना यदि समझौता सही ढंग से हुआ हो तो उसे निरस्त करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी सरकार के आर्थिक संबंधों के बारे में भी लिखा हैः“ यदि इस्लामी सरकार या व्यापारी का कुछ सरकारों या व्यापारियों से व्यापारिक संबंध के कारण मुसलमानों के बाज़ार और उनके आर्थिक जीवन के लिए ख़तरा पैदा हो जाए तो इस संबंध को तोड़ना ज़रूरी है और ऐसा व्यापार वर्जित है और धर्मगुरुओं पर अनिवार्य है कि वे नास्तिकों के उत्पादों और उनके साथ व्यापार का बहिष्कार करें और मुसलमान जगत पर धर्मगुरुओं का अनुसरण करना भी अनिवार्य है।”

इस आदेश में इमाम ख़ुमैनी रोकथाम निमय के आधार पर ऐसे व्यापारिक संबंध को वर्जित मानते हैं जो मुसलमानों के आर्थिक जीवन पर विदेशियों के वर्चस्व का कारण बने। इमाम ख़ुमैनी की दृष्टि में ऐसा हर राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध यदि मुसलमानों और इस्लामी देशों पर विदेशियों के वर्चस्व का कारण बने, वर्जित है और उससे बचा जाए क्योंकि ऐसा संबंध साम्राज्यवादी वर्चस्व का कारण बनेगा।

 

 

इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी लगता है कि इस्लामी क्रान्ति में वर्चस्व का इंकार व स्वाधीनता की प्राप्ति का अर्थ यह नहीं है कि अन्य देशों के साथ संबंध विच्छेद कर लिया जाए। इस्लामी गणतंत्र ईरान एक इस्लामी सरकार के रूप में विश्व के देशों के साथ पारस्परिक सम्मान के आधार पर संबंध रखती है। यही कारण है कि न तो यह सरकार दूसरे देशों पर वर्चस्व चाहती है और न ही अपने ऊपर किसी शक्ति की धौंस को स्वीकार करती है। इस सिद्धांत को इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने इस प्रकार बयान किया है, “यदि सारे देश हमारा सम्मान करें हम भी पारस्परिक सम्मान करेंगे और यदि सरकार और देश हम पर कुछ थोपना चाहते हैं तो हम उसे स्वीकार नहीं करेंगे। न दूसरों पर अत्चार करेंगे और न ही दूसरों के अत्याचार को सहन करेंगे।”

इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान की विदेश नीति के अध्याय में भी हर प्रकार का वर्चस्व न जमाना और उसे स्वीकार न करना तथा स्वाधीनता की रक्षा, विदेश नीति का सिद्धांत बताया गया है।

 

इस आधार पर इस्लामी गणतंत्र ईरान देश की स्वाधीनता की रक्षा और वर्चस्व को स्वीकार न करने के लिए 35 वर्षों से सख़्त हालात का मुक़ाबला किया है। सद्दाम की सेना के 8 वर्षीय हमले से लेकर पश्चिमी देशों की ओर से आर्थिक प्रतिबंधों से निपटने तक, सबके सब ईरानी जनता के लिए इस मूल सिद्धांत के महत्व को दर्शाते हैं। इस प्रकार इस्लामी क्रान्ति ने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में नया मोर्चा खोल कर पीड़ित राष्ट्रों के बीच साम्राज्य के ख़िलाफ़ और स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए जागरुकता पैदा करने के लिए सांस्कृतिक प्रयास किए। इस क्रान्ति ने बड़ी शक्तियों की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति से पर्दा उठा कर, इन शक्तियों के अजेय होने के मिथक को तोड़ दिया और विश्व के सभी पीड़ितों व स्वतंत्रता की इच्छा रखने वालों के मन में आशा की किरण पैदा कर दी है। 

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