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रविवार, 02 फ़रवरी 2014 14:50

इस्लामी क्रान्ति़-२

इस्लामी क्रान्ति़-२

इस्लामी गणतंत्र ईरान मध्यपूर्व और विश्व से परमाणु निरस्त्रीकरण पर सैदव बल देता आया है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सुझाव पेश करने में आगे आगे रहा है।  ईरान ने अप्रैल 2010 में परमाणु निरस्त्रीकरण के विषय पर तेहरान में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया था जिसका शीर्षक था परमाणु हथियार किसी के लिए नहीं और परमाणु ऊर्जा सबके लिए।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई ने जो परमाणु हथियार के प्रयोग और निर्माण के वर्जित होने पर बारंबार बल दे चुके हैं, परमाणु निरस्त्रीकरण सम्मेलन के नाम एक संदेश में इस बात पर बल दिया कि इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में परमाणु हथियार का निर्माण व प्रयोग वर्जित है।

वरिष्ठ नेता ने परमाणु हथयारों के बारे में ईरान के दृष्टिकोण की व्याख्या में कहा कि इस्लामी गणतंत्र ईरान परमाणु और रासायनिक हथियारों सहित सामूहिक विनाश के दूसरे हथियारों के प्रयोग को जघन्य व अक्षम्य अपराध मानता है। हमने परमाणु हथियारों से पाक मध्यपूर्व का नारा दिया है और उस पर कटिबद्ध हैं।

परमाणु निरस्त्रीकरण वास्तव में ऐसी चुनौती है जो पहले विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर निरंतर चर्चा का विषय रही है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ईरान क्षेत्र सहित विश्व में परमाणु निरस्त्रीकरण के ध्वजवाहकों में है। इसी परिप्रेक्ष्य में पिछले वर्ष सितंबर में ईरानी राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी ने परमाणु निरस्त्रीकरण के संबंध में महासभा में पहली उच्च स्तरीय बैठक में तीन बिन्दु पर आधारित सुझाव पेश किए। इस बैठक में ईरान ने गुट निरपेक्ष के आंदोलन के 120 सदस्यों का प्रतिनिधित्व किय था।

ईरान की ओर से ये सुझाव पेश किए गए पहले यह कि परमाणु हथियारों की प्रप्ति, उत्पादन, विकास, भंडारण, और प्रयोग को रोकने और इन शस्त्रों के पूर्ण रूप से विनाश की भूमि समतल करने हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता हो। दूसरे यह कि परमाणु निरस्त्रीकरण के विषय पर 2018 में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो और तीसरे यह कि 26 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय संपूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण दिवस घोषित किया जाए।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान के प्रस्ताव के पक्ष में 129 मत और विरोध में पश्चिमी देशों के 28 मत पड़े जबकि 19 सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया।

परमाणु निरस्त्रीकरण के विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय बैठक में ईरान ने सुझाव दिया कि एन पी टी पुनरीक्षण सम्मेलन एक ऐसा क़ानून बनाए जो परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण या इस प्रकार के हथियारों का उत्पादन करने वाले प्रतिष्ठानों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दे क्योंकि परमाणु हथियार मानवता और अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए ख़तरा है।                 

वास्तविकता यह है कि आज का विश्व, कड़वे अतीत को ढो रहा है। हिरोशिमा त्रासदी के 65 वर्ष बीतने के बाद भी इस त्रासदी के ज़िम्मेदारों ने न केवल यह कि अपने आपराधिक कृत्य पर पश्चाताप नहीं किया और जापान जनता व विश्व समुदाय से क्षमा नहीं मांगी बल्कि आज भी राष्ट्रों कत परमाणु हथियारों के प्रयोग की धमकी देते हैं। हिरोशिमा व नागासाकी त्रासदी को जन्म देने वाले अमरीका को दंडित नहीं किया गया बल्कि इस भयावह त्रासदी के बाद उसने परमाणु हथियारों से संपन्नता को अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अपने लिए विशिष्टता लेने का आधार बना दिया है।

योरोप और अमरीका में हज़ारों परमाणु बम और इन बमों की नई पीढ़ी बनाने का रूझान तथा हज़ारों परमाणु बम बनाने के लिए हज़ारों टन पदार्थ मौजूदगी से इस विचार को बल मिलता है कि ये शक्तियां न केवल यह कि परमाणु निरस्त्रीकरण नहीं चाहती बल्कि निरस्त्रीकरण व अप्रसार के तंत्र को कमज़ोर करने वाली नीति अपनाए हुए हैं जिससे एन पी टी को इन शक्तियों की ओर से सबसे ज़्यादा क्षति पहुंच रही है।

निरस्त्रीकरण एक क़ानूनी प्रतिबद्धता है जिसके दायरे में पूरा विश्व आता है किन्तु परमाणु हथियारों के क्षेत्र में अभी तक यह क्रियान्वित नहीं हो पायी है। इस परिप्रेक्ष्य में मध्यपूर्व के परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास भी विफल रहे हैं। वास्तव में सामूहिक विनाश के शस्त्र रखने वाली शक्तियां अपने इन भंडारों को नष्ट करने के लिए न केवल यह कि व्यवहारिक क़दम नहीं उठा रही हैं बल्कि इस्राईल का समर्थन भी करती हैं जो मध्यपूर्व एक मात्र ऐसा शासन है जिसके पास परमाणु हथियार हैं।

अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन और रूस परमाणु हथियार से संपन्न देश हैं और इन देशों ने अपने परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण के लिए उठाए गए क़दम से एन पी टी के संबंध में अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन किया है।

एन पी टी एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संधि है जिस पर परमाणु हथियार वाली शक्तियों के बीच लंबी वार्ता के बाद पहली जून 1968 को दस्तख़त हुए। इस संधि में 11 अनुच्छेद हैं। इस आधार पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों में परमाणु हथियारों के उत्पादन और विकास और इन्हें रखने से मना किया गया है किन्तु विश्व को परमाणु हथियारों से पाक करने के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए गए हैं। एन पी टी के पहले अनुच्छेद के अनुसार परमाणु हथियारों से संपन्न देश दूसरे देशों को यह तकनीक नहीं देंगे या उनके लिए इन हथियारों की प्राप्ति की भूमि समतल नहीं करेंगे। इस संधि के दूसरे अनुच्छेद के अनुसार ग़ैर परमाणु शक्तियां इस बात पर प्रतिबद्ध हों कि परमाणु हथियार की प्राप्ति का प्रयास नहीं करेंगी।

एन पी टी के छठे अनुच्छेद के अनुसार परमाणु हथियार से संपन्न देश विश्व से परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए पूरी सद्भावना के साथ बातचीत जारी रखें किन्तु परमाणु हथियार से संपन्न देश अपने शस्त्रागारों की रक्षा पर बल देते हैं और हर वर्ष नई पीढ़ी के परमाणु हथियार के विकास तथा परमाणु शस्त्रागारों की रक्षा की शैलियों पर भारी बजट ख़र्च करते हैं।

इसके साथ ही एन पी टी के अंतर्गत देश दो वर्गों में विभाजित हैं एक परमाणु हथियारों से संपन्न और दूसरे परमाणु हथियार न रखने वाले देश। वर्ष 1995 में पुनरीक्षण कन्वेनशन में एन पी टी में असीमित विस्तार से उन देशों का हाथ बंध गया है जो परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए एक प्रभावी फ़्रेमवर्क बनाना चाहते हैं।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने बारंबार यह स्पष्ट किया है कि परमाणु हथियार की संख्या में सीमित स्तर पर कमी करने जैसी छिछली कार्यवाही किसी भी स्थिति में इन हथियारों के पूर्णतः नष्ट किए जाने का स्थान नहीं ले सकते क्योंकि परमाणु हथियारों की संख्या में कटौती के क़दम से पलटा जा सकता है इसिलए इन शस्त्रों की सीमित स्तर पर कटौती करने का क़दम भी प्रभावी नहीं है।

अमरीका और रूस का अपने परमाणु हथियारों को तेज़ी से कम करने और इन्हें पूर्ण रूप से नष्ट करने से पीछे हटना परमाणु निरस्त्रीकरण के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती समझी जाती है। इस समय विश्व में 20000 परमाणु हथियार है और इसका बड़ा भाग अमरीका और रूस के शस्त्रागारों में मौजूद है जबकि बाक़ी शस्त्र ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, उत्तरी कोरिया, भारत, और इस्राईली शासन के पास हैं और वे इन हथियारों को नष्ट में रूचि भी नहीं दिखा रहे हैं। यही कारण है कि शीत युद्ध का काल बीत जाने के बाद भी परमाणु हथियार आज भी विश्व सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बने हुए हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ में ईरान के दूत मोहम्मद ख़ज़ाई ने परमाणु निरस्त्रीकरण पुनरीक्षण सम्मेलन की समीक्षा के लिए इस संघ के मुख्यालय में गुट निरपेक्ष के सदस्य देशों की बैठक हुयी जिसमें परमाणु हथियार रखने वाले देशों के निरस्त्रीकरण की ज़रूरत और एन पी टी के सदस्य देशों के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा से लाभ उठाने में सहायता करने पर बल दिया गया।

मोहम्मद ख़ज़ाई ने स्पष्ट किया कि गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों ने परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में प्रयास को सबसे ज़्यादा महत्व दिया है और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा से सभी सदस्य देशों की संपन्नता के अधिकार पर बल देते हैं और उनका मानना है कि एन पी टी में किसी प्रकार का पुनरीक्षण इस उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में हो।

ये मांगे तेहरान में सितंबर 2012 के गुट निरपेक्ष के 16वें शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में पारित हुयीं।

गुट निरपेक्ष के सदस्य देशों ने हेग में रासायनिक हथियार निशेध संगठन के सत्रहवें वार्षिक सम्मेलन में रासायनिक हथियार कन्वेन्शन के संबंध में संयुक्त दृष्टिकोण अपनाया।

गुट निरपेक्ष देशों ने रासायनिक हथियार रखने वाले देशों विशेष रूप से अमरीका और रूस द्वारा 29 अप्रैल 2012 की निर्धारित तिथि तक इन हथियारों को पूर्ण रूप से नष्ट न किए जाने पर चिंता जतायी।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने जो स्वयं रासायनिक हथियारों से हमले का निशाना बन चुका है, सामूहिक विनाश के शस्त्रों के उत्पादन की सदैव निंदा की और एक निर्धारित समय सीमा में इन्हें नष्ट किए जाने के कार्यक्रम का सदैव समर्थन किया है। निरस्त्रीकरण के संबंध में ईरान की ओर से पेश किए गए सुझाव तथा ईरान और गुट पांच धन एक के बीच 24 नवंबर को हुए जनेवा समझौते के तहत उठाए गए क़दम, इस वास्तविकता की पुष्टि करते हैं कि इस्लामी गणतंत्र ईरान परमाणु हथियारों के पूर्ण रूप से नष्ट किए जाने का इच्छुक है और परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए उपयोगी योजना रखता है। 

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