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बुधवार, 29 जनवरी 2014 14:49

इस्लामी क्रांति की सफलता की वर्षगांठ पर विशेष कार्यक्रम

इस्लामी क्रांति की सफलता की वर्षगांठ पर विशेष कार्यक्रम

ईरान की इस्लामी क्रांति आरंभ से ही विश्व साम्राज्यवाद के निशाने पर रही है क्योंकि इस्लामी व्यवस्था वर्चस्व को नकारने और धार्मिक मूल्यों व मानवीय प्रतिष्ठा की कटिबद्धता के आधार पर अस्तित्व में आई है। समस्त शत्रुताओं के बावजूद इस्लामी क्रांति उसी प्रकार गगन में चमकते हुए सितारे की भांति बाक़ी रही ताकि विश्व के मुसलमान राष्ट्रों की पहचान को पुनर्जिवित करने का कारण बने। आज ईरानी राष्ट्र विभिन्न राजनैतिक, सांस्कृतिक और विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रतिरोध की 35वीं वर्षगांठ मना रहा है और विश्व के अन्य राष्ट्रों ने वर्चस्ववाद के विरुद्ध ईरानी राष्ट्र की क्रांति को अपने मार्ग को आगे बढ़ाने के लिए आदर्श बना लिया है।

वास्तव में इस्लामी क्रांति की सफलता, वर्तमान समय में साम्राज्यवादी व्यवस्था के मुक़ाबले में प्रतिरोध और संघर्ष का प्रतीक है जो इमाम ख़ुमैनी के विचारों से उत्पन्न हुई है। 35 वर्ष पूर्व ईरानी राष्ट्र वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में डट गया और उसने पश्चिम की ओर उन्मुख राजशाही व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेका और ईरान में अमरीकी वर्चस्व को समाप्त कर दिया।

 

इस्लामी क्रांति की सफलता ने ईरानी राष्ट्र पर वर्चस्व जमाने के वर्चस्ववादियों के सपनों को चकनाचूर कर दिया और परिवर्तनों के नये मार्ग पर ईरानी राष्ट्र का भविष्य, प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता पर चल निकला और यह ऐसा संघर्ष है जो कभी समाप्त नहीं होगा। वास्तव में इस्लामी क्रांति की सफलता को 35 वर्ष हो रहे हैं और यह परिपूर्ण प्रक्रिया अपने चरम पर पहुंच गयी है और इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था जिसकी प्रवृत्ति वास्तविक शत्रुओं की पहचान है, ख़तरों से मुक़ाबले के मार्ग से भी पूर्ण रूप से अवगत है।  वर्चस्ववादी कभी भी ऐसे देश को को सहन नहीं करते जो स्वतंत्र हो और उसके लोग संघर्षकर्ता हों। यही कारण है कि आरंभ से ही उसने ईरानी राष्ट्र पर कभी न समाप्त होने वाला युद्ध थोप दिया और पिछले समस्त वर्षों में समस्त शैलियों और हथकंडों के माध्यम इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का मुक़ाबला किया। अमरीका ने 35 वर्ष पूर्व युद्धोन्माद, आर्थिक परिवेष्टन और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ईरान को अलग थलग करने लिए क्षेत्र में अपने पिट्ठु ज़ायोनी शासन की सहायता से ईरानी राष्ट्र को घुटने टेकने का सपना देखा किन्तु उसका यह सपना कभी साकार नहीं हुआ और उसकी यह समझ में आया गया कि उसकी कोई भी कार्यवाही ईरान के भविष्य को उनके हितों में परिवर्तित नहीं कर सकती। यह ईरान की एक अन्य विजयी के अर्थ में है जिसने संघर्ष और प्रतिरोध के एक लंबे मार्ग में वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में एक संघर्षकर्ता राष्ट्र को प्राप्त कर लिया।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने प्रतिरोध और संघर्ष के इन समस्त वर्षों में न केवल पश्चिम और पूरब के सामने सिर नहीं झुकाया बल्कि उसने अतीत से अधिक वर्चस्ववादियों से मुक़ाबले के लिए स्वयं को तैयार कर लिया है। यह राष्ट्रीय संकल्प क्षेत्रीय राष्ट्रों के भविष्य में भी महत्त्वपूर्ण निर्णायक मोड़ सिद्ध हो सकता है।

अलबत्ता इस्लामी व्यवस्था के विरुद्ध शत्रुओं के षड्यंत्र और बाधाएं कभी कम नहीं हुईं बल्कि यह षड्यंत्र नई शैलियों द्वारा यथावत जारी हैं और स्पष्ट है कि इस मार्ग में चुनौतियां और संघर्ष दोनों होंगे। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के अनुसार धमकियों की भरमार, इस्लामी व्यवस्था की शक्ति की सूचक है क्योंकि यदि इस्लामी गणतंत्र ईरान के पास उच्च शक्ति व प्रभाव न होता तो ईरानी राष्ट्र का बुरा चाहने वाले अपनी बौखलाहट पर इतना न झल्लाते।

इस प्रक्रिया में स्पष्ट है कि अमरीका वार्ता के रुझहान के बावजूद ईरान के लिए यथावत चुनौतियां खड़ी करने की चेष्टा में है। यदि आज क्षेत्र में अमरीका की रणनीति ईरान से टकराव के बजाए उससे वार्ता की ओर परिवर्तित हो गयी है तो इस परिवर्तन का कारण अमरीकी दबाव के समक्ष ईरानी जनता का प्रतिरोध और डटे रहना है जो ईरानी राष्ट्र के शत्रुओं के मध्य मतभेद का कारण बन गया है।

 

अमरीकी अधिकारी दोहरी नीति के अंतर्गत एक ओर तो ईरान से वार्ता की बात करते हैं और दूसरी ओर ईरान के विरुद्ध नित नये प्रतिबंध लगाने की चेष्टा में हैं। इस राजनीति का एक आयाम, वाईट हाउस में अमरीकी राष्ट्रपति से निकट कुछ राजनेताओं का व्यवहार है जो ईरान से टकराव की नीति पर अधिक विश्वास नहीं रखते। दूसरा आयाम ईरान और पश्चिम के मध्य वार्ता की रणनीति है जिसका उद्देश्य ज़ायोनी शासन की नीतियों की परिधि में आगे बढ़ना है किन्तु अनुभव यह दर्शाते हैं कि इस्लामी क्रांति की उमंगों व अकांक्षाओं तथा सिद्धांतों पर ईरानी राष्ट्र का डटा रहना, सुदृढ़ व मज़बूत संघर्ष है और शत्रुओं ने अपनी समस्त कार्यवाहियों से यह परिणाम निकाला कि यह वही पुरानी ग़लतियों का दोहराया जाना है।

वास्तव में वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र का प्रतिरोध और डटे रहना केवल एक नारा नहीं है क्योंकि ईरानी राष्ट्र ने अपनी संप्रभुता और दृढ़ता से बहुत महत्त्वपूर्ण सफलताएं अर्जित की हैं और प्रतिरोध की यह प्रक्रिया यथावत जारी है।

राष्ट्रपति  डाक्टर हसन रूहानी ने वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में अपने भाषण में इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की उमंगों व उसके सिद्धांतों को बयान करते हुए कहा था कि दबावों के सक्षम ईरानी राष्ट्र का डटे रहना और परमाणु अधिकार के विषय पर दृढ़ता और सक्रिय कूटनीति का प्रयोग, इस्लामी व्यवस्था की रणनीतियों में है। इन मापदंडों पर बल इस बात को दर्शाता है कि ईरान बहुत ही मज़बूत स्थिति में है और साहसिक लचक वाले कूटनयिक अवसरों से लाभ उठाते मामले में पहल करना उसके हाथ में है और प्रतिष्ठा के साथ उसने ऊंचे क़दम उठाए हैं और शत्रुओं पर ईरान की वास्तविक संप्रभुता को स्पष्ट किया है।

 

 

इस प्रकार से स्पष्ट है कि ईरानी राष्ट्र के शत्रु प्रोपेगैंडों के माध्यम से अपनी ओछी सोच में स्वयं को श्रेष्ठ और ईरानी राष्ट्र की सफलताओं को महत्त्वहीन  दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि इससे पहले भी अपनी सोच के अनुसार ईरान पर कमर तोड़ प्रतिबंध लगाकर ईरान की प्रगति व उसके विकास के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करने का प्रयास करते रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में ईरानी राष्ट्र को छोटा दिखाना और साम्राज्यवादी मोर्चे की क्षमताओं को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना, इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के विरुद्ध दो मुख्य प्रोपेगैंडे रहे हैं जिसका प्रयास था कि ईरानी राष्ट्र को थका हुआ और ऊब चुका हुआ दिखाना था ताकि अपने समीकरण पर पुनर्विचार के लिए उसे विवश करें किन्तु ईरानी राष्ट्र ने अपनी आस्थाओं और अपने आत्म विश्वास पर भरोसा करते हुए समस्त दबावों के समक्ष प्रतिरोध किया और ईरान के विरुद्ध अमरीका और उसके घटकों के सारे समीकरणों को बिगाड़ कर रख दिया।

आज ईरान विगत की तुलना में न केवल क्रांति के पहले के वर्षों में बल्कि क्षेत्र के बहुत से उन देशों से आगे है जिन्हें पश्चिम का भरपूर समर्थन प्राप्त है और षड्यंत्रों के मुक़ाबले में पूरी तरह डटा हुआ है।

यह प्रतिरोध और संघर्ष शत्रुओं के लिए स्पष्ट संदेश है और यह संदेश यह है कि वरिष्ठ नेता के कथनानुसार ईरान, संकल्प के युद्ध में पूरी दूरदर्शिता, जागरूकता, होशियारी, इरादे और प्रयास से सफल होगा।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के समस्त वर्षों में अमरीका ने ईरान के बाज़ार में विघ्न उत्पन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाये और ईरान के आर्थिक ढांचे को परिवर्तित करने के लिए अथाह पूंजीनिवेश किया ताकि लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति अप्रसन्नता उत्पन्न हो जाए। अमरीका ने बारम्बार प्रयास किया कि ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध की मुख्य भावना को तबाह कर दे किन्तु ईरानी राष्ट्र के अनुसार प्रतिरोध किसी भी समय हो वह पवित्र प्रतिरक्षा के काल के प्रतिरोध से भिन्न नहीं है और इस प्रतिरोध को सदैव प्राथमिकता प्राप्त रहेगी। इस प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु प्रतिरोध की संस्कृति को समस्त मैदानों में फैलाना और व्यवस्थित करना था, चाहे वह रणक्षेत्र हो या कूटनयिक नोकझोक या आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने का मैदान।

ईरानी राष्ट्र के शत्रु प्रतिबंधों के मुक़ाबले में इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को अक्षम दर्शाने का प्रोपेगैंडा करके लोगों और व्यवस्था के मध्य खाई पैदा करने के प्रयास में थे और इसी परिधि में उन्होंने आर्थिक समस्याओं को उत्पन्न करके ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध को चुनौती देने का प्रयास किया किन्तु ईरानी राष्ट्र ने वर्चस्ववादी व्यवस्था की ललचाई नज़रों के सामने डटकर यह सिद्ध कर दिया कि उसका प्रतिरोध इस्लामी क्रांति के मूल्यों की रक्षा पर आधारित दबावों के समक्ष है और इस प्रकार से उसने शत्रुओं के समस्त प्रोपेगैंडों पर पानी फेर दिया।

दूसरे शब्दों में ईरानी राष्ट्र की नज़र में प्रतिरोध एक नारे से बढ़कर एक स्ट्राटैजिक सिद्धांत है जिसकी दो विशेषताएं हैं, पहली समाज में प्रतिरोध की संस्कृति को फैलाना और प्रचलित करना है और इस्लामी व्यवस्था के अधिकारियों की ओर से किए जाने वाले कूटनयिक प्रयास का होशियारी से समर्थन करना है।

 

 

जैसा कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने विश्व साम्राज्यवाद से संघर्ष की वर्षगांठ, 13 आबान के अवसर पर ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध और उसके साम्राज्यवादी विरोधी होने के महत्त्व को बयान करते हुए बल दिया था कि शत्रुओं ने हर षड्यंत्र में ईरानी राष्ट्र के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कीं किन्तु अंत में ईरानी राष्ट्र ने ही बाज़ी मारी और हर विफल होने वाले षड्यंत्र के बाद, ईरानी राष्ट्र और आगे बढ़ा।

ईरानी राष्ट्र ने विभिन्न क्षेत्रों में शत्रुओं के समक्ष डट कर अपना लोहा मनवा लिया और पूरी संप्रभुता के साथ शत्रुओं के समक्ष डटा हुआ है। ईरानी राष्ट्र के लिए जो चीज़ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है वह इस्लामी व्यवस्था के रणनैतिक व राजनैतिक ढांचे में विघ्न उत्पन्न करने के लिए शत्रुओं के प्रयासों के मुक़ाबले में सुनोयोजित कार्यक्रमों व कार्यवाहियों की परिधि में लक्ष्यपूर्ण प्रतिरोध की रक्षा करना है। यह इस प्रकार है कि प्रतिरोध के पैंतीस वर्षों के दौरान ईरानी राष्ट्र कभी भी विश्व शक्तियों के समक्ष नहीं झुका और उनके षड्यंत्रों का मुंहतोड़ उत्तर दिया है।

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