यह वेबसाइट बंद हो गई है। हमारी नई वेबसाइट हैः Parstoday Hindi
मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013 20:20

बाल फ़िल्म उद्योग

बाल फ़िल्म उद्योग

बाल फ़िल्मों और इस क्षेत्र में फ़िल्म निर्माण की गुणवत्ता की समीक्षा

टेलीवीजन के कार्यक्रमों और फ़िल्मों के मुख्य संबोधक बच्चे होते हैं। अनुभव इस बात के सूचक हैं कि एक्शन, वैज्ञानिक, काल्पनिक और कामेडी फ़िल्में बच्चों और बड़ों को एक साथ मनोरंजन प्रदान करती हैं किन्तु बच्चों की विशेष फ़िल्मों में काम करने वालों को कल्पना, मनोरंजन, घटना, विचार या वह संदेश जो उसमें निहित है, जैसे मूल आधारों पर विशेष ध्यान देना पड़ा।

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व तक बाल फ़िल्मों का सुव्यवस्थित और अधिक निर्माण नहीं होता था और केवल बाल फ़िल्मों के निर्माण के क्षेत्रों में साठ के दशक में पहला क़दम उठाया गया। वर्ष 1960 में बच्चों के पहले कार्टून के निर्माण के लिए प्रयास किए गये जिसे उस समय के सांस्कृतिक व कला मंत्रालय की एनीमीशन इकाई ने अंजाम दिया था। उन्हीं वर्षों में ईरान के राष्ट्रीय टेलीवीजन का गठन हुआ और बच्चों की विशेष फ़िल्मों के निर्माण की अधिक आवश्यकता का आभास होने लगा। इस संबंध में बच्चों और किशोरों के बौद्धिक विकास केन्द्र का निर्माण वर्ष 1965 में किया गया। इस केन्द्र ने बहुत शीघ्र बच्चों और किशोरों के संबंध में बहुत सी पुस्तकों का प्रकाशन किया और बहुत जल्दी उसने अपनी गतिविधियों का क्षेत्र विस्तृत कर दिया। चित्रकारी, संगीत, नाटक और अंततः फ़िल्म और सिनेमाजगत उन गतिविधियों में से था जिसपर ईरान की बच्चों की इस संस्था ने विशेष ध्यान दिया था और इस केन्द्र ने इस संबंध में प्रशिक्षण और फ़िल्मों के निर्माण को अपनी कार्यसूची में शामिल कर लिया।

वर्ष 1966 में बच्चों के वैचारिक विकास संस्था के प्रयासों से बच्चों के पहले अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सव का आयोजन किया गया और इस उत्सव ने बाल फ़िल्म निर्माण के लिए ईरानी फ़िल्म निर्माताओं व निर्देशकों को सोचने का अवसर उपलब्ध कराया। वर्ष 1970 में बच्चों और किशोरों के मनोरंजन के लिए ईरान के सिनेमा केन्द्र ने अपनी गतिविधियां आरंभ की और आवश्यक संसाधानों के उपलब्ध होने के बाद फ़िल्म निर्माण का काम आरंभ हुआ। ईरान के राष्ट्रीय टेलीवीजन की भी इसी से मिलती जुलती स्थिति थी और 1340 हिजरी शम्सी में उसने बच्चों के विशेष कार्यक्रम बनाने आरंभ किए।

उस समय के युवा और योग्य निर्माताओं ने बच्चों के वैचारिक विकास संस्था की ओर रूख़ किया । अब्बास किया रुस्तमी, मुहम्मद रज़ा असलानी, अली अकबर सादेक़ी, परवेज़ कीमियावी, इब्राहीम फ़ुरूज़िश, क्यूमर्स पूर अहमद उन ईरानी निर्माता व निर्देशकों में थे जिन्होंने बच्चों की फ़िल्मों के निर्माण का काम आरंभ किया।

चालीस के दशक में बच्चों के लिए चार लघु फ़िल्में, एक शैक्षिक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म और एक लघु कठपुतली फ़िल्म का निर्माण किया गया। उस दशक में बहुत सी एनीमीशन फ़िल्मों का भी निर्माण किया गया जिसकी गुणवत्ता कोई ख़ास नहीं थी।

पचास के दशक में फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई जिसके बाद ईरानी सिनेमा जगत ने 12 लंबी फ़िल्में, 34 लघु फ़िल्में और कुछ कठपुतली फ़िल्मों का निर्माण किया जिसमें दो तिहाई भाग वैचारिक विकास केन्द्र का था।

उस काल में वैचारिक केन्द्र ने केवल फ़िल्मों के निर्माण को ही पर्याप्त नहीं समझा बल्कि इसके साथ ही साथ अन्य कार्यक्रमों को भी आगे बढ़ाया। इस केन्द्र ने फ़िल्म निर्माण की क्लासों सहित फ़िल्म और उसके निर्माण से संबंधित अनेक विषयों पर की क्लासें चलाई जिसका परिणाम भी बहुत अच्छा निकला। इसके अतिरिक्त तेहरान के एक सिनेमाघर को बच्चों के लिए ईरान और विदेश की प्रसिद्ध फ़िल्मों की प्रदर्शनी के लिए विशेष कर दिया और इस प्रकार से बाल सिनेमा जगत पर गंभीर दृष्टि डालने का क्रम आरंभ हुआ।

इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में तीन प्रमुख फ़िल्मों ने धूम मचा रखी थी। पहली फ़िल्म की थी मुसाफ़िर जिसके निर्माता और निर्देशक थे अब्बास किया रुस्तमी, दूसरी फ़िल्म थी से माहे तातीली जिसके निर्माता थे शापूर क़रीब और तीसरी फ़िल्म थी साज़े दहनी जिसके निर्माता और निर्देशक थे अमीर नादिरी, यह तीनों फ़िल्म इस्लामी क्रांति से पूर्व बाल सिनेताजगत की प्रसिद्ध व यादगार फ़िल्मों में थीं।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद बच्चों के संबंध में लंबी फ़िल्में वर्ष 1980 में हयाते पुश्तीये मदरसे अदल आफ़ाक़ नामक फ़िल्म से बनना आरंभ हुईं जिसके निर्देशक दारयूश मेहरजूई थे और उसके बाद मदरसई के मीर रफ़तीम नामक फ़िल्म बाज़ार में आई।

समय गुज़रने के साथ बाल सिनेमा जगत ने अपने स्थान का विस्तार किया और दिन प्रतिदिन इसमें विकास और प्रगति हो रही है। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पहले दशक की सर्वोत्तम बाल फ़िल्मों में दवंदेह, इब्राहीम दर गुलिस्तान, शहरे मूशहा और गुलनार का नाम लिया जा सकता है।    

इस बात की अनदेखी करते हुए कि यह फ़िल्में गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतरीन फ़िल्में थीं, इसने बाल फ़िल्मों के निर्माण को बड़ी ही गंभीरता से पेश किया और इस बात का कारण बनी कि सरकारी विभाग के अतिरिक्त नीजि विभाग भी बड़ी सरलता से इसमें सक्रिय रह सके।

बाल फ़िल्मों के निर्माण को जारी रखने के प्रयास यथावत वैचारिक प्रशिक्षण केन्द्र में जारी हैं और यह संस्था लघु, डाक्योमेंट्री और एनीमीशन फ़िल्मों के निर्माण की परिधि में यादगार फ़िल्में दर्शकों के समक्ष पेश करने में प्रयासरत है। यद्यपि कुछ बाल फ़िल्मों के कुछ दक्ष निर्माताओं ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया किन्तु युवाकलाकार यथावत इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पहले दशक में बाल फ़िल्मों के निर्माण में प्रगति और इसी प्रकार इन फ़िल्मों के स्तरों की बेहतरीन गुणवत्ता, इस बात को दर्शाती है कि बच्चों और किशोरों पर विशेष रूप  ध्यान दिया गया है और प्रशिक्षण की अन्य संस्थाओं की भांति सिनेमा जगत भी प्रशिक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में भरपूर रूप से उपस्थित है और एक शैक्षिक साधन के रूप में लोगों के ध्यान का केन्द्र है। इस बीच ईरान में अन्य आयु के लोगों की तुलना में बच्चों और किशोरों की जनसंख्या में वृद्धि भी इसमें काफ़ी प्रभावी रही है जिसके कारण बड़े बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भारी बजटों और संभावनाओं की आवश्यकताएं सामने आईं। यह वही दिन थे जब इराक़ की पूर्व बासी सरकार ने ईरान पर आठ वर्षीय युद्ध थोप दिया था। थोपे गये युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों से सिनेमाजगत की हस्तियां भी प्रभावित हुईं और इसका परिणाम, समाज के नये वातावरण में बाल फ़िल्मों के निर्माण के रूप में निकला।

ईरान में विभिन्न आयु के बच्चों के लिए फ़िल्में बनने लगीं और बच्चे बड़े ही लगाव से बैठकर यह फ़िल्में देखते थे और इन्हीं फ़िल्मों को बाल फ़िल्मों का नाम दिया गया। इस प्रकार की फ़िल्मों के निर्माण के लिए विशेष दक्षता और कला की आवश्यकता होती है। इन फ़िल्मों का मुख्य लक्ष्य यह होता है कि बच्चे पूरी तरह फ़िल्म में खो जाएं और परिणाम तक उसे देखते रहें। इसके साथ ही दूसरी तरह की भी फ़िल्में मौजूद हैं जिसमें निर्माता की विचारधाराएं, बच्चों पर पड़ने वाली परेशानियों और समस्याओं को चित्रित किया गया है किन्तु यह बात निश्चित है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के मुख्य संबोधक बच्चे नहीं होते बल्कि बड़ों को इस प्रकार की फ़िल्में देखनी चाहिए।

अलबत्ता बहुत सी फ़िल्में ऐसी भी बनी हैं जिसमें बच्चे की भूमिका केवल एक बहाना होती है और बच्चे की मुख्य भूमिका के माध्यम से निर्माता दूसरी चीज़े पेश करने का प्रयास करता है। इन फ़िल्मों में मुख्य विषय बच्चे नहीं होते और वह केवल अन्य मनुष्यों की भांति एक प्रतीक के रूप में पेश किए जाते हैं।

कहा जाता है कि तीसरे प्रकार की फ़िल्मों में जो वस्तु निर्णायक होती है और उसे सफलता तक पहुंचाने में सहायता प्रदान करती है, दूसरे देशों के रंगारंग उत्सव और राजनैतिक परिस्थितियां हैं जिस पर हम आगे के कार्यक्रमों में विस्तार से चर्चा करेंगे। संक्षेप में यह कि एक विशेष काल में अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सवों में बचपन पर कटु घटनाएं और उस पर होने वाले अत्याचारों पर आधारित फ़िल्मों को बहुत अधिक पसंद किया जाता था और ईरान के कुछ फ़िल्म निर्माता भी इस दृष्टिकोण के साथ हो लिए और उन्होंने इस विषय को दृष्टि में रखकर फ़िल्मों का निर्माण किया जिसका विश्व में बहुत अधिक स्वागत किया गया। हम देखते हैं कि आज के सिनेमा जगत पर एक अलग ही प्रकार की शैली और रूझहान की छाप है जिसने बहुत से निर्माताओं व निर्देशकों अपनी ओर खींच लिया है।

बाल फ़िल्मों के निर्माण और उसकी कार्यशैली की दृष्टि से बाल सिनेमा को कई भागों में विभाजित किया जा सकता है। ईरान में बच्चों के लिए लंबी फ़िल्म, लघु फ़िल्में, एनीमीशन फ़िल्में और कठपुतली फ़िल्मों का निर्माण किया गया किन्तु बाल सिनेमा जगत के लिए बनने वाली अधिकतर फ़िल्में सामाजिक व पारिवारिक परिधि में होती थीं क्योंकि ईरान में सिनेमा जगत के आरंभ से अब तक बाल फ़िल्मों के निर्माण में सामाजिक व पारिवारिक विषयों पर विशेष ध्यान दिया गया।

इसके अतिरिक्त पारिवारिक, शैक्षिक, ऐतिहासिक, अप्रचलित और वीरता पर आधारित फ़िल्मों का भी निर्माण किया गया। इस्लामी इतिहास, ईश्वरीय दूतों की जीवनियों पर आधारित फ़िल्मों और क़ुरआनी कहानियों पर भी अनेक फ़िल्में बनी और इन्हीं विषयों को केन्द्र बनाकर बहुत सी एनीमीशन फ़िल्मों का निर्माण किया गया। 

Add comment


Security code
Refresh