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बुधवार, 09 नवम्बर 2011 12:31
ईरानी कहावत-९
कबाब की ख़ुशबु की क़ीमत, सिक्कों की आवाज़ है। पुराने समय की बात है एक ग़रीब व्यक्ति नगर के बाज़ार से गुज़र रहा था। दोपहर का समय था। वह व्यक्ति भूखा था। उसकी इच्छा स्वादिष्ट भोजन की हो रही थी। उसके हाथ में रोटी का एक टुकड़ा था। उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ कर खाया किंतु खाली रोटी उसे अच्छी नहीं लगी। दूर से कवाब की खुशबू आ रही थी। इस खुशबू ने उसे अपनी ओर खींचा। भूखा व्यक्ति चलते-चलते कबाब की दुकान पर पहुंचा। उसने दुकान के भीतर बैठे लोगों पर एक दृष्टि डाली। कुछ लोग बैठे हुए आन्नद के साथ रोटी और कवाब खा रहे थे। कबाब पकाने से जो धुंआ उड़ रहा था वह दुकान से बाहर निकल रहा था। यह धुंआ दुकान के बाहर खड़े भूखे व्यक्ति से टकरा कर गुज़र रहा था। इसी बीच भूखे व्यक्ति के मन में एक विचार आया। वह थोड़ा आगे बढ़ा और रोटी के टुकड़े को धुंए की ओर बढ़ाकर उसे कुछ समय तक धुंए में रोके रखा। ऐसा करने से रोटी में कवाब की सुगंघ आने लगी। भूखे ने वह रोटी खाना आरंभ की। अब वह यह आभास कर रहा था मानो कवाब खा रहा हो। कबाब के धुंए से सेंकी रोटी ने उसके उस दिन के भोजन को स्वादिष्ट बना दिया था। अभी वह खाने में ही व्यस्त था कि एक हाथ उसके कंधे से टकराया। फिर आवाज़ आई क्या कर रहे हो? निर्धन व्यक्ति ने कहा कि देख नहीं रहे हो कि कवाब के धुए से रोटी खा रहा हूं।तुम किसकी आज्ञा से यह काम कर रहे हो? निर्धन ने बड़े ही आश्चर्य से कहा, क्या इसके लिए भी किसी की अनुमति की आवश्यकता ही है? धुआ हवा में जा रहा है और मैं भी अपनी रोटी को उसमें बसा रहा हूं।कवाब वाले ने कहा, तुम ग़लत कर रहे हो। मैं यहां पर काम करता हूं, मेहनत करता हूं और तुम बिना पैसे दिये रोटी और कवाब खा रहे हो।निर्धन ने कहा, यह तुम क्या कह रहे हो? कैसी रोटी, कैसा कवाब? मैं तो रोटी के साथ कवाब का धुंआ खा रहा था। धुंआ तो हवा में था। दुकानदान ने कहा कि मुझको कुछ नहीं पता। या तो जो कवाब तुमने खाए हैं उसके पैसे दो नहीं तो मैं नगर के न्यायाधीश से तुम्हारी शिकायत करूंगा। निर्धन व्यक्ति ने कहा, जाओ शिकायत करो। मुझको तुम किस चीज़ से डरा रहे हो? यदि मेरे पास पैसे होते तो मैं स्वयं कवाब ख़रीदकर खाता न कि कवाब का धुंआ।दोनों नगर के न्यायाधीश के पास गए। दोनों ने अपनी-अपनी बात न्यायाधीश को सुनाई। न्यायाधीश ने कुछ देर सोचा फिर कवाब वाले से कहा कि क्या तुम अपनी शिकायत वापस नहीं ले सकते? कवाब वाले ने कहा कि मैं क्यों अपनी शिकायत वापस लूं? इस व्यक्ति ने कवाब खाया है तो उसे पैसे भी देने चाहिए। अब न्यायाधीश ने निर्धन व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि तुम क्या कहना चाहते हो? क्या तुम इस कवाब वाले को पैसे देना चाहते हो? उसने कहा कि मैं किस कवाब के पैसे इसे दूं? न्यायाधीश ने कहा कि वही कवाब जो रोटी से खाया है। बताओ तुम्हारे पास कितने पैसे हैं? निर्धन ने कहा कि मेरे पास केवल तीन सिक्के हैं। न्यायाधीश ने कहा कि लोओ अपने तीनों सिक्के मुझको दो ताकि मैं इस व्यक्ति को उसका हक़ देदूं। निर्धन व्यक्ति ने बड़ी ही चिंता और दुख के साथ अपनी सारी जमा पूंजी न्यायाधीश को देदी। न्यायाधीश ने अपनी जगह से ही सिक्कों को ज़मीन पर फेंकते हुए कवाब बेचनेवाले से कहा कि कवाब के धुंए के पैसे उठा लो। जैसे ही वह पैसे उठाने के लिए आगे बढ़ा न्यायाधीश ने उससे कहा, कवाब के धुंए की क़ीमत सिक्के नहीं हैं बल्कि सिक्कों की आवाज़ है। इसपर कवाब बेचने वाले ने कहा श्रीमान न्यायाधीश यह आप क्या कह रहे हैं। आपके हिसाब से क्या इस व्यक्ति को मेरे कवाब के पैसे मुझको नहीं देने चाहिए थे? न्यायाधीश ने कहा हां। ठीक कह रहे हो परन्तु कवाब के धुंए की क़ीमत सिक्कों की आवाज़ है। इसलिए तुमकों तुम्हारा हक़ मिल चुका है। इस व्यक्ति ने अपना क़र्ज़ चुका दिया है। जब भी कोई यह चाहता है कि वह बिना कार्य किये या बिना किसी चीज़ को बेचे हुए उसका मूल्य प्राप्त करे तो ऐसी स्थिति में फ़ार्सी भाषा की यह कहावत कही जाती है कि कवाब के धुंए की क़ीमत, सिक्कों की आवाज़ है।



