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शनिवार, 27 फ़रवरी 2010 21:00

इस्लामी जगत में एकता, और इसके मार्ग में रुकावटें

इस्लामी जगत में एकता एसी उच्च अकांक्षा है जिसे व्यावहारिक बनाने व सुदृढ़ करने के लिए इस्लाम के आगमन के आरंभ से जागरुक धर्म गुरुओं व बुद्धिजीवियों ने बहुत प्रयास किए हैं। मुसलमानों में एकता व समरस्ता की आवश्यकता के विषय पर बहुत सी चर्चाएं की गयी और कांफ़्रेंसे आयोजित हुई हैं। इस्लामी एकता की आवश्यकता पर बहुत से ठोस बौद्धिक व धार्मिक तर्क मौजूद हैं। किंतु जैसे ही इस्लामी जगत में एकता के व्यावहारिक होने का अवसर आता है वैसे ही इसके मार्ग में अनेक रुकावटें प्रकट होने लगती हैं जिसे दूर करने के लिए मुसलमानों में साहस, युक्ति  और समझदारी की आवश्यकता है। इस एकता के मार्ग में रुकावटों का एक भाग इस्लामी जगत के आपसी मतभेदों से संबंधित है किन्तु इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि साम्राज्यवादी व वर्चस्ववादी शक्तियां मुसलमानों के बीच फूट के लिए सदैव प्रयासरत रही हैं। इस्लामी जगत में एकता व समरस्ता से मुसलमानों को ऐसी अजेय शक्ति प्राप्त होगी जिसकी सहायता से वे वर्चस्ववादी शक्तियों की लूटपाट व हस्तक्षेप के समक्ष डट सकते हैं। इस बात पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि साम्राज्य का मुख्य लक्ष्य, अत्याचार विरोधी तथा समृद्ध व सक्रिय धर्म इस्लाम को मार्ग से हटाना है क्योंकि इस धर्म ने वर्चस्ववादी शक्तियों की नीतियों व लक्ष्यों का सदैव मुक़ाबला किया है। 

         इस्लाम के शत्रु मुसलमानों में एकता व समरस्ता को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के हत्कंडे अपनाते हैं। वे मुसलमानों के बीच मतभेदों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं और उसे इस्लामी जगत में फूट डालने के लिए प्रयोग करते हैं। साम्राज्यवाद, धार्मिक, जातीय तथा भाषाई मतभेदों को मुसलमानों को एक दूसरे से दूर करने के लिए एक हथ्कंडे के रूप में प्रयोग करते हैं। स्पष्ट सी बात है कि इस्लामी जगत का विशाल क्षेत्र विभिन्न राष्ट्रों, जातियों और मतों से संपन्न हैं किन्तु इन स्वाभाविक या छोटे मोटे मतभेदों से इस्लामी समाज के लिए कोई विशेष समस्या नहीं उत्पन्न होनी चाहिए। दूसरी ओर पश्चिमी सरकारें इस्लामी जगत में चरमपंथ तथा जाली मतों को असित्व में लाकर बना कर उसमें एकता को रोकने का प्रयास करती हैं। गत दो शताब्दियों के दौरान, वहाबी तथा बहाई, जैसे मतों ने इस्लामी जगत को बड़ा आघात पहुंचाया है। इस्लामी जगत का समकालीन इतिहास यह दर्शाता है कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने इस्लामी जगत में फूट डालने के लिए मुख्य रूप से उन लोगों का साथ दिया जो नाम के मुसलमान थे। ये लोग विभिन्न रूपों में सामने आए किन्तु इस्लाम के मूल सिद्धांतों से विरोधाभास रखने वाली बातों का पेश किया जाना इन सब में एक संयुक्त बिन्दु रहा है। ऐसी बातें जिनकी प्रवृत्ति फूट उत्पन्न करने वाली है।  इस समय भी विभिन्न देशों में ऐसे ग़लत विचारों वाले व्यक्ति मौजूद हैं जो अपने विचारों को इस्लामी जगत में फूट डालने तथा इस्लाम को कमज़ोर करने के लिए पेश करते हैं। हालिया वर्षों में और इंटरनेट पर साइटों द्वारा इस्लाम विरोधी विचारों तथा फूट डालने वाले विषयों के प्रचार व प्रसार में तेज़ी आई है। ये, मुसलमानों में एकता को रोकने और मतभेद को फैलाने की साम्राज्य की शैलियों में से एक शैली है। 

         इस्लामी जगत के मामलों के अधिकांश विशेषज्ञों का यह मानना है कि इस्लामी जगत में मौजूद एकता विरोधी तत्व ख़तरनाक हो सकते हैं। इन समीक्षकों की दृष्टि में यदि मुसलमानों के बीच आपसी मतभेद कम हो जाएं तो बाहरी शत्रुओं के षड्यंत्र इतने प्रभावी नहीं हो सकते। विशेष कर इसलिए भी कि इस्लाम के अनुयाइयों के बीच बहुत से संयुक्त बिन्दु मौझूद हैं। जैसे ईश्वर, पैग़म्बरे इस्लाम, क़ुरआन और क़िबले के विषय पर मुसलमान एकमत हैं और बहुत से इस्लामी आदेशों के संबंध में वे एकमत हैं या फिर उनके विचार एक दूसरे के बहुत निकट हैं। बल्कि मुसलमानों के बीच कुछ धार्मिक मतभेद भी उनके बीच एकता व समरस्ता में रुकावट नहीं बन सकते क्योंकि यदि इन मतभेदों की सही ढंग से समीक्षा की जाए तो इनसे इस्लामी जगत के बीच एकता को बढ़ावा ही मिलता है, हानि पहुंचने का तो प्रश्न ही नही उठता । इस्लामी एकता से अभिप्राय यह नहीं है कि विभिन्न मुसलमान मत, अपनी आस्थाओं को छोड़ दे बल्कि इसका उद्देश्य मुसलमानों को उनके संयुक्त शत्रु के मुक़ाबले में एक करना है। जो मतभेद वाले विषय हैं उनके संबंध में धर्म गुरुओं और विशेषज्ञों के बीच बैठकों में समीक्षा द्वारा एक स्पष्ट बिन्दु तक पहुंचा जा सकता है। स्वाभिवक सी बात है कि आम हल्क़ों में ज्ञानियों से विशेष मुद्दों पर चर्चा का कोई लाभ नहीं हो सकता।   मुसलमानों के विभिन्न गुटों को एक दूसरे के विरुद्ध उकासाना तथा उनके बीच विवादास्पद विषयों को हवा देना, वास्तव में इस्लामी जगत में एकता के मार्ग में रुकावटों में से एक रुकावट है। 

      इस्लाम जागरुकता और गहन चितंन की ओर लोगों का आह्वान करता है और मुसलमानों से चाहता है कि वे यथासंभव ज्ञान व जागरुकता बढ़ाएं। मुसलमानों में जागरुकता उनके बीच भ्रांति व फूट को रोक सकती है। खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि मुसलमानों में एक दूसरे की आस्थाओं की जानकारी बहुत कम है। यह अज्ञानता उनके बीच एकता में रुकावट है और यही इस्लामी जगत में बहुत सी समस्याओं का कारण है। परस्पर समझ के अभाव से एक दूसरे के संबंध में भ्रांति और आपस में दूरी पैदा होती है। ईरानी बुद्धिजीवी शहीद मुर्तज़ा मुत्तह्हरी का मानना हैः मुसलमानों का एक दूसरे को भलिभांति न समझ पाना, उनके बीच धार्मिक मतभेद से अधिक ख़तरनाक है। शहीद मुत्तह्हरी मतभेदों को बढ़ाने में भ्रांतियों के दुष्प्रभाव के बारे में लिखते हैः धार्मिक व आस्था संबंधी मतभेद स्थिर है और ये हर काल में एक जैसे रहे हैं किन्तु एक दूसरे के संबंध में भ्रांतियां परिवर्तनीय हैं कभी इनमें वृद्धि होती है तो कभी इनके प्रकार बदल जाते हैं जिससे फूट और मतभेद की जड़े और गहरी हो जाती हैं।    

 

       विभिन्न धर्मों के अनुयाइयों के बीच भ्रांति, एक दूसरे पर गंभीर आरोप लगाने का कारण बनती है। कुछ लोग ऐसे आरोपों का उत्तर आरोप में देते है जिससे मतभेद और विस्तृत हो जाते हैं। स्पष्ट सी बात है कि इस्लामी जगत के शत्रु इस स्थिति से बहुत लाभ उठा रहे हैं और वे मुसलमानों के बीच भ्रांति को हवा दे रहे हैं। एक दूसरे के संबंध में भ्रांति के साथ अतिवाद भी शामिल हो जाए तो स्थिति और त्रासदीपूर्ण हो जाएगी। मिस्र के अलअज़हर विश्वविद्यालय के शिक्षक शैख़ अबू ज़ोहरा कहते हैः जातीय व धार्मिक अतिवाद के परिणाम में मतभेद उनकी सोच, भावना और विवेक तक में प्रविष्ट हो चुका है यहां तक कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को, जो उससे वैचारिक मतभेद रखता है, घात में बैठा शत्रु समझने लगता है न ऐसा विरोधी कि जो स्वयं उसकी भान्ति ईश्वरीय कानूनों और धर्म की सही बातों को समझने की जिज्ञासा रखता है। इस बात में संदेह नहीं है कि कुछ ऐसे हठधर्मी भी होते हैं जो सामने वाले पक्ष पर केवल आरोप तक बस नहीं करते बल्कि उन्हें हानि पहुंचाने यहां तक कि उनका अन्त करने पर तुल जाते हैं तथा यह और अधिक ख़तरनाक स्थिति है। इस संदर्भ में वहाबी धर्मगरुओं की ओर से शीयों को अधर्मी और काफ़िर कहना स्पष्ट उदाहरण है। ये लोग यह जानते हुए भी कि शीया, इस्लामी सिद्धांतों व मूल्यों का अनुसरण करते हैं और अधिकांश इस्लामी आदेशों में दूसरों से कोई मतभेद नहीं रखते उन्हें अधर्मी और काफ़िर कहते हैं और उनके पुरुषों महिलाओं और बच्चों की हत्या को वैध समझते हैं। इस प्रकार के संकीर्ण मानसिकता पर आधारित फ़्तवों के कारण इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में बड़ी संख्या में शीया मुसलमान शहीद किए गए हैं।          जिस समय धार्मिक मतभेदों पर राजनैतिक रंग चढ़ जाए तो एसी स्थिति में इस्लामी जगत की एकता व समरस्ता के लिए और ख़तरा पैदा हो जाता है। इस्लामी जगत की कुछ सरकारें जो मुख्य रूप से पश्चिम की साम्राज्यवादी सरकारों के प्रभाव में हैं, धार्मिक मतभेदों को राजनैतिक रंग देकर उसे और भड़काती हैं।

ये सरकारें वास्तव में वर्चस्ववादी शक्तियों की इच्छाओं को पूरा करती हैं और सोचती हैं कि इस शैली द्वारा वे अपनी सत्ता को मज़बूत कर सकती हैं। दूसरे शब्दों में इस्लामी जगत में फूट डालने वाली कुछ सरकारें ये सोचती हैं कि इस्लामी जगत में कई धड़ों में विभाजन की स्थिति में ही उनका अस्तित्व बच पाएगा। इस समय इन सरकारों के पैसों व संभावनाओं से इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान सहित इस्लामी जगत के विभिन्न क्षेत्रों में फूट डालने के लिए आतंकवादी कार्यवाहियां की जा रही हैं। शीया क्रिसेंट की भ्रांति को भी मध्यपूर्व में एक ख़तरे के रूप में याद किया जाता है जिसका क्षेत्र की कुछ अरब सरकारें प्रचार कर रही हैं। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि कुछ धर्मगुरु भी इन सरकारों तथा उनके पश्चिमी समर्थकों की फूट डालने वाली नीतियों का हथकंडा बने हुए हैं और इस्लामी एकता के विरुद्ध भाषण व फ़त्वा देते हैं।   

 

       इस्लामी जगत में एकता व समरस्ता, जातीय व भाषाई मतभेद यहां तक कि चरमपंथी राष्ट्रवाद की बलि चढ़ जाती है। इतिहास बताता है कि साम्राज्य भी इन मतभेदों को फैलाने में बहुत सक्रिय रहा है। किन्तु पवित्र क़ुरआन बल देता है राष्ट्रीयता, जात और क़बीले एक दूसरे में अंतर और पहचान के लिए हैं जबकि शिष्टाचार व ईश्वर का भय ही उसके निकट वरीयता का एकतात्र माप्दंड है। इस्लामी जगत को टुकड़े टुकड़े करने और जातीय व राष्ट्रीय अंतर को प्राथमिकता देने से न केवल यह कि मुसलमानों को कोई लाभ नहीं पहुंचेगा बल्कि वे  और कमज़ोर होंगे जबकि इस्लाम अपने अनुयाइयों को आपसी मतभेद से बचने का आदेश देता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फूट को शैतानी कृत्य बताते हुए फ़रमाते हैः होशियार रहो! शैतान तुम्हारे लिए मार्ग समतल करता है और तुम्हारे धार्मिक बंधन को तोड़ना चाहता है तथा फूट व मतभेद को तुम्हारा भाग्य बनाना चाहता है।  

 

       यद्यपि कुछ तत्व इस्लामी जगत में एकता के मार्ग में रुकावट हैं किन्तु ये रुकावटें एकता जैसे उच्च लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सभी मुसल्मानों के संकल्प के सामने क्षीण हैं। विशेषकर इसलिए भी कि इन दिनों मुसलमानों में जागरुकता की लहर उठी है जिससे इस्लामी जगत में एकता व समरस्ता के प्रति बढ़ते रुझान की भूमि प्रशस्त हुई है।

 

इस्लामी जगत में एकता का लाभ केवल इस्लामी समाज तक सीमित नहीं है बल्कि इसका लाभ उन समाजों तक पहुंचता है जिनमें मुसलमान रहते हैं। इस्लामी जगत में एकता का उद्देश्य इस जगत की अन समस्याओं कानिवारण हैं जिनके कारण बहुत सी त्रासदियां जन्म लेती हैं।

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