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मंगलवार, 27 मई 2008 22:49

इस्लाम

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोध व अपमान तथा इस्लाम के विरुद्ध घृणा फैलाने के विरुद्ध युरोपीय संघ से इस्लामी जगत के बुद्धिजीवियों, विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, कलाकारों तथा मेधावियों की सांकेतिक आपत्ति 

सर्वश्रीमान! इस सांस्कृतिक याचिका व नैतिक अभियोग पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले हम लोगों में से अधिकांश वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, कला संबंधी और ग़ैर सरकारी क्षेत्रों से संबंध रखते हैं और हम अंतरराष्ट्रीय संस्कृति को तार्किक व क़ानूनी दृष्टि से देखते हैं। हमें युरोप में कुछ सरकारों, संचार माध्यमों और राजनीतिक अतिवादी गुटों के असांस्कृतिक व्यवहार पर गहरा आश्चर्य और खेद है और इस माध्यम से हम कुप्रचारों, झूठ, पैग़म्बरे इस्लाम व इस्लाम विरोधी प्रचारों में फासीवादी स्वर के प्रति अपना विरोध दर्शाते हैं और आपको तर्क, नैतिकता, द्वीपक्षीय स्वतंत्रता, सेन्सर की समाप्ति, इस्लाम के अपमान की प्रक्रिया के अंत तथा अंतराष्ट्रीय अंतरात्मा न्यायालय में खुली वार्ता का निमंत्रण देते हैं।हमें इस बात की चिंता है कि युरोप में इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध एक अन्यायपूर्ण व हिंसक योजना पर काम हो रहा है, घृणा का उत्पादन व वितरण किया रहा है, इस्लाम से भय को लोगों के मन में बसाया जा रहा है और शांति व भाई चारे का संदेश लाने वाले, नैतिकता के शिक्षक, समस्त मानवता के लिए कृपा, बुद्धिमत्ता व न्याय के संदेशवाहक महान पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की प्रकाशमान छवि को बिगाड़ने के लिए प्रचारिक व मनोवैज्ञानिक अभियान चलाया जा रहा है जो वास्तव में प्रचारिक आतंकवाद व सांस्कृतिक हिंसा का नमूना तथा पूरे विश्व के डेढ़ अरब मुसलमानों के अधिकारों का हनन है। कहीं इसके ऐसे अंतरराष्ट्रीय परिणाम न निकलें जिनकी न तो क्षतिपूर्ति संभव हो और न ही उनके बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में यह जो हिंसा की संस्कृति द्वेषपूर्ण रूप से फैलायी जा रही है उससे न केवल पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की प्रकाशमान छवि बल्कि हज़रत ईसा, हज़रत मरयम, हज़रत मूसा और हज़रत इब्राहीम अलैहिमुस्सलाम जैसी महान हस्तियों की छवि को भी लक्ष्य बनाया तथा फिल्मों, नाविलों, कार्टूनों या फिर आलेखों द्वारा द्वेष व घृणा और सांस्कृतिक आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।कुछ युरोपीय सरकारों के अधिकारियों विशेषकर जर्मनी के विदेशमंत्री के बयान से जिन्होंने युरोपीय संघ के प्रवक्ता के रूप में इन अनैतिक, शैतानी व असभ्य कार्यवाहियों का समर्थन किया है और समस्त युरोपीय संचार माध्यमों से मांग की है कि वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का अनादर करें, यह पता चलता है कि इस विषय के व्यक्तिगत तथा संयोग के आयाम नहीं हैं और इस्लाम पर आक्रमण अब एक औपचारिक व सरकारी नीति का रूप धारण कर चुका है।यह पत्र इसलिए लिखा जा रहा है कि हमें अभी तक इस बात की ओर से आश्वस्त नहीं हुए हैं कि क्या यह युरोपीय संघ की नयी व व्यापक नीति है अथवा कुछ युरोपीय प्रवक्ताओं व अधिकारियों का व्यक्तिगत मत है जो ज़ायोनिज़्म के दबाव में सामने आ रहा है?और यदि हम यह मान लें कि युरोप की समस्या वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो फिर उचित होगा कि इन कुछ प्रश्नों के उत्तर भी दे दिये जाएं।

१) नैतिकता व तर्क रहित स्वतंत्रता और अपमान व झूठ बोलने की स्वतंत्रता, विकास व चेतना के लिए है या भेदभाव व हिंसा के लिए? आप अपने सामने वाले पक्ष को भी अपनी मान्यताओं के विरुद्ध इस प्रकार की स्वतंत्रता व अधिकार देते हैं या नहीं? और क्यों? २) यह स्वतंत्र युरोप जो मुसलमान महिलाओं के आवरण को भी सहन नहीं कर सकता और महिलाओं के अधिकारों का, जिनमें सर्वोपरि नग्नता से दूरी, महिला प्रतिष्ठा की रक्षा तथा आवरण की स्वतंत्रता है, हिजाब पर प्रतिबंध लगाने जैसे नियमों द्वारा क्यों हनन करता है? वह युरोप जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को होलोकास्ट और ज़ायोनी शासन के अवैध अस्तित्व के बारे में प्रश्न करने की सीमा तक भी नहीं स्वीकार, वह युरोप जिसने १८वीं शताब्दी से लेकर आज तक और हालिया अर्धशताब्दी के दौरान अमरीका के साथ मिलकर सदैव अतिग्रहण व सैनिकवाद द्वारा, मोरक्को, मिस्र व फ़िलिस्तीन से लेकर, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, भारत, मलेशिया व इन्डोनेशिया तक लूटपाट व जनसंहार किया है, वह युरोप जो स्वतंत्र व समान वार्ता के स्थान पर, अपमान करने, अश्लीलता व दूसरों को तुच्छ दर्शाने का कार्यक्रम चला रहा है, किस प्रकार बड़ी सरलता से न केवल इस्लामी व मानवीय मूल्यों को बल्कि तथाकथित युरोपीय मान्यताओं को भी पैरों तले रौंद रहा है?!इस्लाम, एकेश्वरवाद, अध्यात्म, भाईचारे और शांति का निमंत्रण देता है किंतु दो शताब्दियों तक इस्लामी जगत की लूटमार व जनसंहार, तथा मुसलमानों और पूरी मानवता के विरुद्ध सलीबी तथा धर्मविरोधी युद्धों के पश्चात अब भी पश्चिमी राजनेता इस बात पर तैयार नहीं हैं कि द्वेष से दूर होकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के कथनों को सुनें और युरोपीय जनता को स्वतंत्र रूप से सुनने और निर्णय लेने का अधिकार दें? सही है कि संवभवः पश्चिम बल्कि पूरे विश्व में तेज़ी से फैलते इस्लाम ने पोप को भी चिंतित किया हो और पश्चिमी राजनेताओं को भी और इस से ज़ायोनी संचार माध्यम और पूंजीवादी कंपनियां आक्रोश में आ गयी हों, किंतु क्या अपमान व तुच्छ दर्शाना, जनमत में भ्रम उत्पन्न करना तथा अपशब्दों का प्रयोग करना इस्लाम या किसी भी अन्य धर्म के साथ नैतिक व तार्किक मत से मुक़ाबले का उचित मार्ग है?पश्चिम में यदि ईसाई और धर्मनिरपेक्ष लोग गुटों के रूप में इस्लाम की ओर आकृष्ट हो रहे हैं तो उसके कारक पर ध्यान दिया जाना चाहिए और आपका समाधान, फोबिया, भय, इस्लाम से घृणा में विस्तार तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम की प्रकाशमान छवि को बिगाड़ना नहीं होना चाहिए।ग़लत शैली, चाहे फासीवादियों द्वारा हो, चाहे स्टालिनवादियों द्वारा, चाहे उदारवादियों द्वारा, प्रत्येक दशा में एक विफल शैली है। जैसा कि गोबल्ज़ व एशोविट्ज़ या फिर स्टालिन की भाषा तथा साइबेरिया के बंदीगृह भौतिक विचारधाराओं की रक्षा को निश्चित नहीं बना सके और अध्यात्म के अभाव तथा शून्यता के संकट का कोई समाधान नहीं सूझा। ग्वान्तानामो जैसे बंदीगृह और इस्लाम व मुसलमानों के विरुद्ध पश्चिम की अपमानजनक भाषा भी उदारवाद की पूंजीवादी व्यवस्था के संकटों को जो, पश्चिम की आधुनिकता के खोखले पन की अंतिम भौतिकवादी विचारधारा है, समाप्त करने में सक्षम नहीं है। यदि युरोप अपने धर्म व धार्मिक अतीत से यातना में है और मध्य युगीन शताब्दियों की यादें, पोप की सत्ता, उनके न्यायालयों, सलीबी युद्धों, ईसाई यातना गृहों, ज्ञान के विरोधों और बुद्धिजीवियों को जलाने के अतीत के कारण वह आत्मग्लानि में ग्रस्त है तो उसे जान लेना चाहिए कि उसकी क्षतिपूर्ति का मार्ग हर प्रकार के धर्म व अध्यात्म का विरोध नहीं है और युरोप को अपना मध्ययुगीन धार्मिक प्रतिशोध इस्लाम से नहीं लेना चाहिए कि जो ज्ञान व बुद्धिमत्ता व मानवाधिकारों व न्याय का धर्म है। क्या ऐसा नहीं है कि युरोप की आधुनिक सभ्यता का इतिहास, स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करता है कि मध्ययुगीन काल से युरोप का बाहर निकलना और आधुनिक ज्ञान से उसका परिचय तथा पश्चिम में वैज्ञानिक व धार्मिक पुनर्जागरण, सर्वप्रथम इस्लामी सभ्यता से संपर्क, इस्लामी जगत के आधुनिक ज्ञान के अनुवाद के बाद युरोप स्थानान्तरण तथा इस्लामी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और अस्पतालों से पश्चिम के परिचय के कारण संभव हुआ है? उदारवादी युरोप को यह जानना चाहिए कि उसे बीते हुई शताब्दियों में ईसाईयत व गिरिजाघरों की हिंसा का उत्तर, इस्लाम के विरुद्ध भेदभावपूर्ण प्रतिक्रिया के रूप में उदारवादी व आधुनिक हिंसा से नहीं देना चाहिए क्योंकि युरोप के इतिहास में जो हिंसा है उसमें इस्लाम की कोई भूमिका नहीं है। क़ुरआने मजीद को, जो एक मनुष्य की हत्या को समस्त मानवता ही हत्या के समान समझता है और हज़रत ईसा व हज़रत मूसा अलैहेमस्सलाम जैसे समस्त ईश्वरीय दूतों को सम्मान के साथ याद करता है या पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को, कि जो शारीरिक बल्कि ज़बानी हिंसा को भी महापापों में और निर्दोष की हत्या को अनेश्वरवाद की भांति मानते हैं और उस ईश्वरीय दूत को, जो बुद्धि को शैतान का प्रदर्शन नहीं बल्कि सत्य का संदेशवाहक व ईश्वरीय तर्क समझता हो और स्वयं मदीना नगर में मानवप्रेम व धर्म की स्वतंत्रता के आधार पर, ईसाइयों, यहूदियों और अग्निपूजा करने वालों से व्यवहार करता हो तथा जिसने विश्व की महासभ्यता की अत्यन्त अल्पावधि में और इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में रचना की हो उसकी प्रतिष्ठा को किस प्रकार कुछ अपमानजनक कार्टूनों या अपशब्दों व झूठ द्वारा नष्ट किया या पीछे ढकेला जा सकता है?मुसलमान आपसे उपेक्षा व बहुलवाद नहीं बल्कि केवल थोड़ा सा शिष्टाचार व न्याय चाहते हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से निराशा फैलती जा रही है किंतु इस गुटतंत्र, पश्चिम की कठोर पूंजीवादी सिन्द्धान्तवादिता, दमनकारी व विस्तारी शैलियों, अपमानजनक व आरोप लगाने की पद्धतियों तथा तानाशाही व युद्धप्रेम पर आधारित अनुशासनों द्वारा केवल द्वीपक्षीय चरमपंथ को ही बढ़ावा देना संभव है।यदि आपका उद्देश्य ग़ैर मुस्लिम जगत विशेषकर युरोप व अमरीका में इस्लाम के तीव्र विस्तार को रोकना है, यदि आपका उद्देश्य मुसलमानों की युवा पीढ़ी में चेतना की लहर को रोकना है तो भी उचित यही है कि आप तर्क व वार्ता व नैतिकता की शैली को आज़माएं और एक लोकतांत्रिक व तार्किक प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत युरोप के मुसलमान नागरिकों को अभिव्यक्ति व आवरण की स्वतंत्रता देकर तथा अपमानित करने के स्थान पर वार्ता व वाद- विवाद को लाकर इस बात का अवसर प्रदान करें कि हमारे तर्क आपस में लड़ें न कि हम!पश्चिमी वर्चस्व को फ़िलिस्तीन, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के अतिग्रहण, ईरान, सीरिया तथा अन्य राष्ट्रों को धमका कर तथा असमान युद्धों और अतार्किक व अनैतिक शैलियों और मुसलमानों की वैज्ञानिक व आर्थिक प्रगति को भेदभावपूर्ण रूप से रोककर, बनाए नहीं रखा जा सकता है।युरोपीय संघ की सरकारों द्वारा सलमान रुश्दी और हालिया मूर्खतापूर्ण कार्टूनों का समर्थन तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपमान की स्वतंत्रता में बदलने एवं उदारवादी उद्देश्यों के लिए सलीबी युद्ध को जारी रखने का अर्थ हिंसा व व्यापक सांस्कृतिक आतंकवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है। क्या यह उचित नहीं है कि धमकी व अपमान के स्थान पर आप यह अवसर दें कि इस्लामी जगत के प्रतिनिधि संचार माध्यम में आपके साथ एक पारदर्शी, तार्किक वार्ता में युरोप के मुसलमान व ग़ैर मुसलमान लाखों नागरिकों के सामने स्वतंत्रता से अपनी बात कहें और आप की बात सुनें? आप को युरोपीय नागरिकों की सूझ-बूझ का भी सम्मान करते हुए उन्हें दोनों पक्षों की बात सुनने का अवसर देना चाहिए ताकि वे स्वयं ही फ़ैसला करें?! हमारी तार्किक व न्यूनतम मांग यह है कि मुसलमानों के सांस्कृतिक अधिकारों तथा युरोपीय नागरिकों की समझ का सम्मान किया जाना चाहिए।इस्लाम पर आरोप लगाना, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की प्रकाशमान हस्ती के विरुद्ध, जो समस्त मानवता के लिए कृपा का संदेश लेकर आए, व्यापक कुप्रचार एक प्रकार से आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना तथा उदारवादी रूढ़िवाद, संचार माध्यमों और राजनीति के मंच से तर्क, प्रेम व नैतिकता को हटाना है।युद्ध, चाहे कुछ लोगों के लिए लाभदायक व्यापार रहा है, किंतु हम इस्लामी देशों के प्रगतिशील विचारधारा तथा विश्वविद्यालयों से संबंध रखने वालों के रूप में युरोपीय संघ की सरकारों विशेषकर उदारवादी बुद्धिजीवियों व धार्मिक नेताओं से सिफारिश करते हैं कि हिंसक, दमनकारी व शत्रुतापूर्ण शैलियों पर जैसे भी संभव हो, अंकुश लगाएं और इस्लाम और उसके प्रसार से मुकाबले का कोई मानवीय व सभ्य मार्ग खोजें तथा पारदर्शी व समान वार्ता के लिए सहयोग दें।जी हां! एक भिन्न विश्व की रचना हो सकती है आइये इसके लिए एक दूसरे से सहयोग करें।

हस्ताक्षरः इस्लामी जगत के सैकड़ों व हज़ारों बुद्धिजीवी, विश्वविद्यालयों के शिक्षक, कलाकार पत्रकार तथा मेधावी लोग

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