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मंगलवार, 19 जनवरी 2016 16:33

तेहरान-3

तेहरान-3

1785 ईसवी में क़ाजारी शासक आग़ा मोहम्मद ख़ान ने तेहरान को अपनी राजधानी बनाया और 1795 में उन्होंने तेहरान में अपने बेटे का आधिकारिक रूप से राज्याभिषेक किया। उसके बाद से तेहरान राजधानी कहा जाने लगा। उन्होंने कई कारणों से तेहरान को राजधानी बनाया था। एक तेरहान की स्ट्रेटिजिक स्थिति, दूसरे क़बायलियों का समर्थन और तीसरे आर्थिक गतिविधियों के लिए उचित परिस्थिति। क़जारी शासक ने ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की थी जो बहुत हद तक सफ़वी शासन काल जैसी थी। तेहरान का विकास, बढ़ता पलायन, ईरानी व विदेशी शैलियों में भवन निर्माण और अदालत व धार्मिक मामलों से संबंधित बड़ी इमारतों के निर्माणही तत्व थे जिनके कारण तेहरान के चारों ओर सफ़वी काल में बनायी गयी चारदिवारी और संरचना में बदलाव आया। क़ाजारी फ़ौज की तेहरान पर फ़त्ह के 85 साल बाद, तहमासबी शासक के काल के बने क़िले, मीनारें और प्राचीर गिरने लगीं। इस तरह तेहरान अपना पारंपरिक रूप को बाक़ी न रख सका और उसमें बद्लाव आने लगा और फिर क़ाजारी शासक नासेरुद्दीन शाह के दौर में उसे ‘नासेरी दारुल ख़िलाफ़ा’ कहा जाने लगा।

 

 

नासिरुद्दीन शाह के काल को ईरान में सामाजिक राजनैतिक व सांस्कृतिक बदलाव का दौर कहा जाता है। उस दौर में यूरोप की औद्योगिक सभ्यता व पश्चिम की साम्राज्यवादी नीतियों का ईरान पर प्रभाव पड़ा जिसका अंजाम नासिरुद्दीन शाह की मौत के बाद संविधान क्रान्ति और दूसरी घटनाओं के रूप में सामने आया। नासिरुद्दीन शाह ने 1849 से 1898 तक शासन किया। उस दौरान तेहरान में बहुत विकास हुआ किन्तु खेद की बात है कि उस दौर के मूल्यवान अवशेष तबाह हो चुके हैं।

नासिरुद्दीन शाह के शासन काल में तेहरान की आबादी तेज़ी से बढ़ने के कारण, प्राचीन चारदिवारी के भीतर निर्माण के लिए स्थान नहीं बचा था। उनके दौर में तेहरान का क्षेत्रफल बढ़ा और शहर के चारों ओर नई चारदिवारी का निर्माण हुआ और ख़न्दक़ खोदी गयीं।

 

 

नासिरुद्दीन के दौर में अमीर कबीर की कोशिश से दारुल फ़ुनून मदरसा, अमीर बाज़ार, जूते के बाज़ार और अमीर सराय जैसी संरचनाएं वजूद में आयीं 1826 में मध्यपूर्व के मामलों के रूसी विशेषज्ञ बेरज़िन ने पहली बार तेहरान का नक़्शा तय्यार किया जो सेंट पीटर्ज़बर्ग में प्रकाशित हुआ। 1275 हिजरी क़मरी में क़ाजारी राजकुमार अली क़ुला मीर्ज़ा की सरपरस्ती में दारुल फ़ुनून में तोपख़ाने के ट्रेनर व कमान्डर मोसियो करशीश तथा दारुल फ़ुनून पॉलिटेक्निक के कई छात्रों के सहयोग से तेहरान का एक और नक़्शा तय्यार हुआ।

1867 में फ़्रांसीसी इंजीनियरों के सहयोग से तेहरान का नया नक़्शा तय्यार हुआ और तेहरान का क्षेत्रफल और बढ़ाया गया। शहरों की सीमा  अष्टकोणीय नई प्राचीरों और ख़न्दकों से निर्धारित की गयी और शहर से बाहर संपर्क के लिए 12 दरवाज़े बनाए गए जो दरवाज़े शेमिरान, दरवाज़े दोलत, दरवाज़े यूसुफ़ाबाद, दरवाज़े दूशान तप्पे, दरवाज़े दूलाब, दरवाज़े ख़ुरासान, दरवाज़े बाग़शाह, दरवाज़े क़ज़्वीन, दरवाज़े गुमरुक, दरवाज़े हज़रत अब्दुल अज़ीम, दरवाज़े ग़ार, दरवाज़े ख़ानीआबाद के नाम से मशहूर थे।

           

 

 

नासिरुद्दीन शाह की हत्या के बाद, मोज़फ़्फ़रुद्दीन शाह 1313 हिजरी क़मरी बराबर 1895 ईसवी में सत्ता में पहुंचा। 1905 में तेहरान में संवैधानिक क्रान्ति शुरु हुयी। इस क्रान्ति के कारण और इससे जुड़ी घटनाओं का उल्लेख हमारे कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है। सिर्फ़ इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि संवैधानिक क्रान्ति में तेहरान की मस्जिदों और व्यापारिक केन्द्रों का मुख्य रोल था।

तेहरान की जनता धर्मगुरुओं के नेतृत्व में मस्जिदों में सभाओं के आयोजन के नतीजे में 14 जमादिस्सानी 1324 हिजरी क़मरी को मुज़फ़्फ़रुद्दीन शाह क़ाजार की तरफ़ से वैधानिकता का आदेश जारी कराने में सफल हुयी।  मुज़फ़्फ़रुद्दीन शाह संवैधानिक आदेश पर दस्तख़त के कुछ महीने के बाद इस दुनिया से चल बसा। उसी साल मोहम्मद अली शाह का गुलिस्तान महल में राज्याभिषेक किया गया। मोहम्मद अली शाह संवैधानिक आदेश व संसद के वजूद को मानने के लिए तय्यार न था और वह विभिन्न बहानों से संवैधानिकता के आधार को उलटना चाहता था। अंततः 1908 में सैन्य कार्यवाही और रूस के क़ज़्ज़ाक बल की मदद से ईरान की राष्ट्रीय संसद को तोपों से घेर लिया और कई सांसदो को क़त्ल किया गया और कुछ सांसदों को जेल में डाल दिया गया और इस तरह फिर से ईरान में अत्याचारी शासन की स्थापना हुयी।

 

 

संविधान क्रान्ति के बाद तेहरान में न सिर्फ़ यह कि विकास नहीं हुआ बल्कि राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक अस्थिरता के कारण, ईरान में और तबाही हुयी। मोहम्मद अली शाह क़ाजार के काल में पुरानी मूल्यवान इमारतें एक के बाद एक करके गिरती गयीं। क्रान्तिकारियों के साथ क़ज़्ज़ाक़ों व अत्याचारी बल की लड़ाइयों के कारण बहारिस्तान महल और सिपह सालार मस्जिद को बहुत नुक़सान पहुंचा।    

क़ाजारी शासन श्रंख्ला के अंतिम वर्षों में ईरान अपनी निष्पक्षता के एलान के बावजूद पहले विश्व युद्ध की आंच से सुरक्षित नहीं था। इसी प्रकार क़ाजारी शासन श्रंख्ला के अंतिम वर्षों में ईरान में स्थानीय आंदोलन भी जारी थे और उसे अशांति व सूखे का भी सामना था। इन हालात में नगर विकास के काम में रुकावट आ गयी। उस समय सरकारें कमज़ोर थी और राजनैतिक संबरों से जूझ रही थीं। इसलिए तेहरान में बहुत ज़्यादा बद्लाव नहीं आया। 1921 में रज़ाख़ान के विद्रोह से राजधानी तेहरान सहित पूरे ईरान में हालात बदल गए। तानाशाही व दमन के बल पर देश को पूंजिवादी व्यवस्था और आधुनिकता की ओर ले जाना, ईरान में रज़ाख़ान के शासन काल की मुख्य पहचान है। इस प्रकार क़ाजारी शासक नासिरुद्दीन शाह के अंतिम दौर और संविधान क्रान्ति के समय शुरु होने वाली पाश्चत्य प्रक्रिया रज़ा ख़ान के दौर में भी जारी रही और इस दौर में सिर्फ़ पश्चिम को विकास का आदर्श समझा गया। रज़ाख़ान के दौर में सरकारी तंत्र विकसित हुआ और तेहरान के चारों ओर कारख़ाने लगे।

 

 

तेहरान शहर के विस्तार के लिए दरवाज़ों को तोड़ा गया, ख़न्दक़ों को भरा गया और प्राचीन मीनारों व प्राचीरों को गिरा दिया गया। इस तरह तेहरान की ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे ख़त्म हुयी। तेहरान शहर के बहुत से क्षेत्रों की संरचना बदल गयी। रज़ा ख़ान के दौर में लोगों के घरों और दुकानों तथा शहर के प्राचीन अवशेषों को बर्बाद करना एक आम बात थी।       

 

          

क़ाजारी शासन श्रंख्ला की स्थापना और राजधानी के रूप में तेहरान को चुनने से पहले तक यह शहर बहुत छोटा था। इसकी कुल आबादी 15000 थी। किन्तु उसके बाद से इसकी आबादी बढ़ती गयी और क़ाजारी शासन काल के मध्य में यह ईरान का सबसे बड़ा शहर बन गया था। 1957 में हुयी पहली जनगणना के अनुसार, उस वक़्त तेहरान ईरान का सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर था। उस वक़्त तेहरान की आबादी 15 लाख 60 हज़ार 934 थी। तेल की बिक्री से मिलने वाली आय पर पहलवी शासन से जुड़े लोगों का एकाधिकार था, इसकी मदद से तेहरान में विशेष क्षेत्रों में पूंजि निवेश हुआ। इस प्रकार अन्य शहरों व गावों की अनदेखी की क़ीमत पर तेहरान असंतुलित रूप में विकसित हुआ। इस शहर में सुविधाओं व रोज़गार के अवसर ने इसके आकर्षण को और बढ़ा दिया। यही कारण था कि इरान के अन्य शहरों से 1942 से 1977 के बीच बड़ी संख्या में लोगों ने तेहरान पलायन किया। उस समय से तेहरान शहर का विस्तार बहुत तेज़ी से हुआ। तेहरान के पूरब, पश्चिम और दक्षिण में छोटे-बड़े क़स्बे और मोहल्ले धीरे-धीरे तेहरान में शामिल होते गए। 1977 में हुयी जनगणना में 45 लाख से ज़्यादा तेहरान की आबादी थी और इस तरह तेहरान एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय शहर बन गया।  2014 की जनगणना में तेहरान की आबादी 83 लाख थी।

 

 

1977 से 1979 के बीच तेहरान की ओर अंधाधुंध पलायन ने इस शहर की सांस्कृतिक व सामाजिक तथा अन्य समस्याएं बढ़ा दी। ऐसे हालात में पहलवी शासन जनता की संपत्ति को लूट कर अलबुर्ज़ पर्वत श्रंख्ला के दामन में शानदार महलों के निर्माण में मस्त था कि 1979 में तेहरान में जनता ने पहलवी शासन के ख़िलाफ़ क्रान्ति लाकर उसके शासन का अंत कर दिया। 

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