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सोमवार, 28 दिसम्बर 2015 16:58

ईलाम-2

ईलाम-2

शीरवान व चरदावुल ईलाम प्रांत का एक ज़िला है, जो ईलाम के पूर्वोत्तर में और तेहरान से 737 किलोमीटर के फ़ासले पर स्थित है। शीरवान व चरदावुल ज़िले की जलवायु संतुलित है। यह ईलाम प्रांत का ऐतिहासिक इलाक़ा है। इसका इतिहास सासानी काल से जाकर मिलता है। प्राचीन शीरवान शहर सीमरे नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित था। अब भी यहां सासानी काल की इमारतों के खंडहर बाक़ी हैं। प्राचीन और ऐतिहासिक इमारतों के अवशेष जैसे कि सराबे कलान, ऐतिहासिक क़िला, अग्निकुंड साम के अलावा हीलान और मुबीन इलाक़ों में अन्य प्राचीन धरोहरें इस इलाक़े के ऐतिहासिक और प्राचीन होने की निशानी हैं।

 

 

सीरवान शहर ईलाम प्रांत का एक ऐतिहासिक शहर है कि जो शीरवान चरवादुल ज़िले के निचले भाग में स्थित है। यह शहर प्राचीन काल से ही जानवरों का केन्द्र रहा है और यह ज़ागरोस पहाड़ों के दर्रे में स्थित है। सीरवान शहर सासानी काल से संबंधित है, जो इस्लाम की आरम्भिक शताब्दियों तक सभ्यता के केन्द्रों में गिना जाता था। इस शहर की इमारतों में प्रयोग किए गए मसालों में पत्थर और गारा, मिट्टी और चूना हैं। यह शहर सासानी काल के महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध शहरों में से था। इसी प्रकार, प्राचीन काल के पुल, सड़कें, क़िले और इमारतें इस शहर के महत्व को दर्शाते हैं।

कज़आबाद के टीले भी शीरवान व चरदावुल ज़िले की अन्य महत्वपूर्ण धरोहर हैं। ये छोटे बड़े टीले शीरवान व चरदावुल ज़िले के पूर्वोत्तर में हलीलान गांव के इलाक़े में स्थित हैं। बड़े टीले के पूर्वी भाग में तीन हज़ार वर्ष पुरानी चित्रकारी हुई पुरानी सुराही के अवशेष हैं, इसी प्रकार तराशे हुए और बिना तराशे हुए बड़े पत्थरों के अवशेष मिले हैं। बड़े टीले के उत्तर में एक क़ब्रिस्तान है, जिसमें कई प्रकार की क़ब्रे मिली हैं और उनमें मिट्टी के उपकरण एवं सुराहियां पायी गई हैं। 

 

 

साम क़िले का अहाता भी शीरवान व चरदावुल ज़िले की ऐतिहासिक विरासत है। इसके तीन भाग हैं, जो एक दूसरे से अलग अलग होने के बावजूद जुड़े हुए हैं। ऐतिहासिक रूप से यह पार्थ साम्राज्य के अंतिम और सासानी काल के शुरूआत में बनाया गया था। इस क़िले की वास्तुकला में सैन्य एवं सुरक्षा का बिंदु मद्देनज़र रखा गया है। इसलिए कि क़िला पहाड़ की उस ऊंचाई पर बनाया गया है, जहां चढ़ना बहुत मुश्किल काम है। वास्तुकारों ने दुर्गों, कमरों और प्रवेश द्वारों को चट्टानों की प्राकृतिक स्थिति को नज़र में रखकर बनाया है। कुल मिलाकर, क़िले की वास्तुकला सासानी काल की वास्तुकला है। इसके निर्माण में पत्थर, चूना, मिट्टी और गारे का प्रयोग किया गया है। क़िले के पास 500 वर्ष पुराने चिनार के पेड़ मौजूद हैं। यहां मीठे पानी के सोते हैं और चंदन के पेड़ों की जड़ें भी पायी जाती हैं।

ईलाम प्रांत का एक अन्य ज़िला मेहरान है, जिसके केन्द्रीय शहर का नाम भी मेहरान है, यह ईरान-इराक़ सीमा पर स्थित है। मेहरान शहर की भूमि बहुत उपजाऊ है। रज़ा ख़ान के शासनकाल में विभिन्न ख़ाना बदोश जनजातियों को एक स्थान पर स्थापित करने के लिए यहां बसाया गया था और सरकार की ओर से इस बस्ती का नाम मेहरान रखा गया था। मेहरान के लोग कुर्द फ़ीली जनजाति के हैं और उनकी भाषा कुर्दी है। इस शहर में जनजाति जीवन शैली प्रचलित है तथा मलिकशाही जनजाति इलाक़े की मूल जनजाति है। यहां के लोगों का व्यवसाय कृषि है और अधिकांश किसान गेंहू उगाते हैं।

 

 

आशूरी शिलालेख गुल गुल मेहरान ज़िले में है। यह शिलालेख बानीपाल आशूर काल से संबंधित है। यह लगभग तीन हज़ार साल पुराना है और गुल गुल मलिक शाही गांव से ऊपर उत्तरी चट्टान की दीवार पर स्थित है। इसका साइज़ 135x90 सेंटीमीटर है और लंबाई में इस पर चित्र बनाए गए हैं। ज़मीन की सतह से इसकी ऊंचाई 270 सेंटीमीटर है। पत्थर पर एक आशूरी सैनिक का चित्र कि जिसके  हाथ में तीर और सिर के ऊपर चाँद और तारा बना हुआ है, देखा जा सकता है। इस शिलालेख के निचले हिस्से में कुछ वाक्य उकेरे गए हैं, 1973 में वांडेन्बर्ग ने इसका अनुवाद किया था।

शिलालेख पर लिखे हुए वाक्यों में आशूरियों द्वारा ईलाम व लोरिस्तान की फ़तह का उल्लेख है। उदाहरण स्वरूप, महान भगवानों ने मुझ पर अपनी कृपा करते हुए मुझे मेरे पिता का सिंहासन प्रदान किया और ज़मीन पर मेरा निंयत्रण स्थापित किया।

 

 

ईलाम के उत्तर में ईवान ज़िला है जो तेहरान से 761 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां की जलवायु पर्वतीय और संतुलित है। ईवान, ईलाम प्रांत का नया ज़िला है। यहां कृषि और पशुपालन की काफ़ी संभावनाएं पायी जाती हैं। इस ज़िले का प्राकृतिक सैंदर्य मन मोह लेने वाला है और ऐतिहासिक धरोहर अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इस ज़िले के लोग कल्होर जनजाति के हैं और इनकी भाषा कल्होरी है। सियाहगुल अग्निकुंड सासानी काल से संबंधित है कि जो ईवान ज़िले से 25 किलोमीटर दूरी पर इसी नाम के इलाक़े में और गंगीर नदी के किनारे स्थित है।

ईलाम प्रांत में इस्लाम पूर्व के बाक़ी रह गए अग्निकुंडों में से यह अग्निकुंड सबसे अच्छी स्थिति में है, जो अद्वितीय है और पुरातत्व अध्ययन के मुताबिक़ इसका बहुत महत्व है। इस ऐतिहासिक इमारत में एक वर्गीय हाल है जो 5x5 वर्ग मीटर है और उसकी ऊंचाई 10 मीटर है। दीवारों की चौड़ाई एक मीटर है, इसमें एक अग्निकुंड बना हुआ है और उसके ऊपरी हिस्से में छेद हैं, जो संभवतः धुंआ निकलने के लिए हैं। इस इमारत के चारो ओर एक अहाता है, जो प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक कारकों की वजह से नष्ट हो चुका है। यह इमारत पत्थर, गारे और चूने से बनाई गई है।

 

 

पुरातत्विक अध्ययनों के मुताबिक़, इस इमारत के आस पास इस अग्निगुंड के काल की इमारतों के खंडहर एवं अवशेष पाये जाते हैं, जो संभवतः इस इलाक़े में लुप्त शहर आरयूहान के हो सकते हैं।

विलुप्त आरयूहान शहर ईलाम प्रांत का एक शहर था, जो ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, गंगीर नदी के किनारे स्थित था। इन अवशेषों और पुरातत्विक अध्ययनों से पता चलता है कि इस इलाक़े में एक ऐतिहासिक शहर स्थित था।

सासानी काल से संबंधित शीरीन व फ़रहाद मेहराब ईवान ज़िले के कूशक इलाक़े के चहल ज़रई गांव में स्थित है। इस इमारत में दो मेहराबें और एक प्रवेश द्वार है। इन दोनों मेहराबों को बहुत बड़े पत्थरों से बनाया गया है, जिनका निर्माण विशेष तरीक़े से और बिना गारे के किया गया है।

 

 

ईलाम प्रांत का एक ज़िला आबदानान है, जिसका केन्द्रीय शहर भी इसी नाम से है। इस इलाक़े में तेल, सल्फ़र और फिटकिरी की खाने हैं। इलाक़े में पर्याप्त पानी, जंगल और चरागाहों के कारण यहां की ज़मीन उपजाऊ है। इस इलाक़े में बड़ी संख्या में ऐतिहासिक एवं प्राचीन अवशेष इसके ऐतिहासिक होने का प्रमाण हैं। इनमें से गूर गबरान और क़लए करूदीत का नाम लिया जा सकता है। आबदानान ज़िले में कई पर्यटन स्थल हैं।

जुड़वा झीलें सियाह गाव इसी ज़िले में स्थित है, यह ईरान की एक आश्चर्यचकित कर देने वाली प्राकृतिक झील है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन स्थल बन सकती है। सियाह गाव नदी चट्टानों से गुज़रकर कबीरकोह पहाड़ की घाटी में आबदानान ज़िले के दक्षिण पूरब में 45 किलोमीटर की दूरी पर बहती हुई दो झीलों में परिवर्तित हो जाती है, पहली झील सतह के थोड़े से अंतर के साथ दूसरी झील के ऊपर स्थित है।

 

 

शीतल जल, रंगबिरंगी मछलियां, दोपहर में प्रकाश की चमक और उससे निकलने वाली विविध प्रकार की किरनों से अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो जाता है। इन दोनों झीलों की गहराई लगभग तीन मीटर है और यह एक प्राकृतिक 8 मीटर नाली द्वारा एक दूसरे से जुड़ती हैं।

हालांकि यह झील वसंत में और शीत ऋतु के अंत में ईलाम प्रांत और आबदानान के नागिकों का पर्यटन सथल होती है, लेकिन इस इलाक़े की जलवायु के कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि हर मौसम में पर्यटक इस सुन्दर इलाक़े की सैर के लिए पहुंचते हैं।

 

 

इस झील की अन्य विशेषताओं में विभिन्न प्रकार के नमक, गंधक, पानी और उबलते हुए सोते हैं।                     

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