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सोमवार, 16 नवम्बर 2015 14:09

बूशहर प्रांत

बूशहर प्रांत

 

प्राप्त प्रमाणों से यह पता चलता है कि बंदरगाह और बंदरगाही गतिवधियों की दृष्टि से बूशहर क्षेत्र, तीन हज़ार वर्ष ईसापूर्व एक विकसित क्षेत्र था।  उस काल में यह ईलाम साम्राज्य का एक अति महत्वपूर्ण केन्द्र था।  हख़ामनशी काल में ईरान बीस प्रांतों में बंटा हुआ था और बूशहर, उसका एक महत्वपूर्ण केन्द्र था जो ज़ागरोस पर्वत के पश्चिम में स्थित था।  अर्दशीर बाबकान के काल में वर्तमान बूशहर से आठ किलोमीटर की दूरी पर “राम अर्दशीर” नामक एक नगर बनाया गया था।  वर्तमान समय में केवल उसके खण्डहर ही बाक़ी बचे हैं।  इस समय वह रीशहर के नाम से जाना जाता है।

 

सासानी शासनकाल में रीशहर, एक विकसित बंदरगाह था और उसको रीवशहर कहा जाता था।  रीशहर, इस्लाम के उदय के बाद भी शताब्दियों तक चहल-पहल वाला नगर था और 16वीं तथा 17वीं शताब्दी तक इसे व्यापार का महत्वपूर्ण केन्द्र माना जाता था।  सन 1310 हिजरी शमसी में रीशहर को ईरान की राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में पंजीकृत किय गया।

 

 

अपनी स्ट्रैटेजिक स्थिति और व्यापारिक दृष्टि से महत्व के कारण फ़ार्स की खाड़ी, शताब्दियों से विभिन्न देशों और सरकारों के लिए ज्ञान और धन के आदान-प्रदान का उचित स्थल रही है।  इस पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सन 1506 ईसवी में पुर्तगाल ने हमला किया था।  पुर्तगाल ने फ़ार्स की खाड़ी पर हमला, यह कहकर किया था कि वह मिस्री व्यापारियों के मुक़ाबले में अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करना चाहता है।  सन 1031 हिजरी क़मरी को शाह अब्बास सफ़वी ने फ़ार्स की खाड़ी से पुर्गालियों के प्रभाव को कम कर दिया था किंतु सफ़वी शासन श्रृंखला के अंत में ईरान के दक्षिणी भाग पर योरोपियों ने आक्रमण किया।  नादिर शाह अफशार ने फ़ार्स की खाड़ी की सुरक्षा और इसके द्वीपों के बीच संपर्क बनाए रखने के उद्देश्य से सन 1147 हिजरी क़मरी को अब्दुल लतीफ़ ख़ान को इस क्षेत्र के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।  उस समय से आजतक बूशहर को फ़ार्स की खाड़ी की एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में जाना जाता है।

 

करीम ख़ान ज़ंद के शासनकाल में बूशहर सहित फ़ार्स की खाड़ी और उसके द्वीपों पर ब्रिटेन का प्रभाव बढ़ने लगा।  उस काल में ब्रिटेन ने बूशहर में अपना व्यापारिक केन्द्र स्थापित करने की अनुमति प्राप्त कर ली।  ईरान में ज़ंदिये शासनकाल के बाद क़ाजारी श्रंखला सत्ता में आई जिसका फ़ार्स की खाड़ी पर अधिक प्रभाव नहीं था।  यही कारण है कि फ़ार्स की खाड़ी पर धीरे-धीरे ब्रिटेन का प्रभाव बढ़ने लगा।

 

 

सन 1812 में बूशहर में ब्रिटेन का काउंसलेटर फ़ार्स की खाड़ी पर शासन करता था।  ब्रिटेन का प्रतिनिधि स्वयं को इस क्षेत्र का स्वामी समझने लगा था।  सन 1857 में नासिरुद्दीन शाह के शासनकाल में ब्रिटेन ने हरात और अफ़ग़ानिस्तान में अपने अवैध हितों को ख़तरे में पड़ता देखकर दक्षिणी ईरान पर आक्रमण कर दिया।  इस आक्रमण के बाद ब्रिटेन ने ख़ार्क द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया।  इसके बाद ब्रिटेन की सेना ने बूशहर का अतिग्रहण कर लिया।

 

प्रथम विश्व युद्ध से पहले भी ब्रिटेन ने बूशहर पर पुनः हमला किया।  सन 1919 में ब्रिटेन के सैनिकों और स्थानीय जनता के बीच गंभीर युद्ध आरंभ हुआ।  इस युद्ध के दौरान रईसअली दिलवारी ने जनता के सहयोग से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  ब्रटेन के सैनिकों और रईसअली दिलवारी के नेतृत्व में होने वाला युद्ध ईरान के इतिहास में वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध का उदाहरण है।

 

 

अब जबकि आप बूशहर प्रांत के इतिहास से कुछ परिचित हो चुके हैं, तो उचित होगा कि आप बूशहर नगर के बारे में भी कुछ जानकारी प्राप्त कर लें जहां पर बंदरगाह स्थित है।  बूशहर बहुत प्राचीन नगर है।  कुछ लोगों का कहना है कि इसका संबन्ध सासानी काल से है।  इस बात की पुष्टि वे सिक्के करते हैं जो इमाम ज़ादे बूशहर के इर्दगिर्द की खुदाई में प्राप्त हुए हैं।  ईरान के अन्य नगरों की भांति बूशहर ने भी इतिहास में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं।  करीम ख़ान ज़ंद के काल में बूशहर, विशेष महत्व का स्वामी रहा है।  इसे इराक़ की बसरा बंदरगाह का प्रतिस्पर्धी समझा जाता था।  बूशहर उन गिने-चुने नगरों में से एक है जहां पर पहली बार लिथोग्राफ़ी या पाषाणलेखन की मशीन लगाई गई थी।  ईरान के अन्य नगरों की तुलना में बूशहर में ही पहले बर्फ के कारख़ाने लगे और बिजली आई।  राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अपने विशेष महत्व के कारण बूशहर में ही पहले विदेशी कंपनियों ने अपनी एजेन्सियां लगाईं और कुछ देशों के काउस्लेट भी यहां पर थे।

 

वर्तमान समय में बूशहर ईरान के महत्वपूर्ण विकसित नगरों में से एक है जो औद्योगिक नगर में परिवर्तित होता जा रहा है।  इस बंदरगाही नगर में बहुत सी जेटियां हैं जहां पर जहाज़ों में माल लादा जाता है।  बशहर में बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरें हैं जिनमें प्राचीन घर, क़ोवाम जल सेग्रह केन्द्र, रीशहर के खंण्डहर, शेख सादून जामा मस्जिद और दूसरे अन्य दर्शनीय स्थल।

 

 

बूशहर में पाए जाने वाले कुछ प्राचीन घर देखने में तो बहुत सादे हैं किंतु उनकी वास्तुकला बहुत ही आकर्षक है।  इन घरों की छतें सामान्यतः लकड़ी और मिट्टी की बनी हुई आयताकार हैं।  घर के आंगन में पानी का हौज़ होता है।  बूशहर में जो प्राचीन घर प्रसिद्ध तथा देखने योग्य हैं और जिनकी वास्तुकला बहुत मश्हूर है उनमें से ख़ानए क़ाज़ी, ख़ानए रईस अली दिलवारी और इमारते मलिक का नाम लिया जा सकता है।

 

इमारते मलिक, कांप्लेक्स जैसी बिल्डिंग है जो बूशहर नगर के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है।  इसको लगभग एक शताब्दी पहले बनाया गया था।  इसके निर्माण में ज़ंदिये काल के और क़ाजार काल के आरंभ में प्रचलित वास्तुकला का प्रयोग किया गया है।  ज्ञात रहे कि सन 1377 हिजरी शमसी में बूशहर की इमारते मलिक को ईरान की राष्ट्रीय धरोहर की सूचि में पंजीकृत किया जा चुका है।

ख़ानए रईस अली दिलवारी भी बूशहर प्रांत की प्रसिद्ध इमारतों में से एक है।  यह इमारत बूशहर से 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  अब इस इमारत की मरम्मत करके इसे एक सांस्कृतिक काम्पलेक्स में परिवर्तित कर दिया गया है।  इस समय यह संग्रहाल के रूप में मौजूद है जहां पर सांस्कृतिक गतिविधियां भी अंजाम दी जाती हैं।

 

बूशहर में विभिन्न ऐतिहासिक इमारतों के अतिरिक्त यहां पर जल संचित करने के कई प्राचीन भण्डार है।  प्राचीन काल में जल का भण्डार करने वाली यह इमारत नगर के मुख्य भाग में स्थित है।  यह 150 वर्ष से भी अधिक पुरानी इमारत है।  इसे क़ाजारिया काल में बनाया गया था जिसमें पारंपरिक भवन निर्माण में प्रयोग किये जाने वाली सामग्री प्रयोग की गई है।  इसका मुख्य ढांचा पत्थरों से बना हुआ है।  जल को एकत्रित करने के लिए जो हौज़ बनाया गया है उसमें दो मीटर की ऊंचाई तक पानी मौजूद है जबकि दो मीटर साठ सेंटीमीटर पानी भूमिगत है।  इसको बहुत ही मज़बूती से बनाया गया है। 

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