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बुधवार, 14 अक्तूबर 2015 17:04

शूश्तर-2

शूश्तर-2

शूश्तर में पुल, बांध, चक्कियां, झरने, नहरें और सुरंगे एक दूसरे से जुड़े पानी की आपूर्ति का विशाल नेटवर्क है। इस नेटवर्क को हख़ामनेशी शासन काल से सासानी शासन काल के बीच पानी के उपयोग के लिए बनाया गया था। चक्कियों और झरनों के समूह को कृत्रिम गरगर नदी के मार्ग पर बनाया गया है। यह अपने आप में प्राचीन समय की इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है। कृत्रिम गर्गर नदी को सासानी राजा अर्दशीर बाबकान ने बनवाया था। यह व्यवस्था बांध, सुरंगों, नहरों और पनचक्कियों पर आधारित, आर्थिक-औद्योगिक समूह के रूप में मौजूद है। इतिहास की किताबों में इसका बारंबार उल्लेख किया गया है।

 

 

पानी की यह व्यवस्था इस प्रकार बनायी गयी है की गर्गर नदी पर बांध बनाया गया है। पानी की सतह जब बढ़ती है तो वह तीन सुरंगों में बट जाता है। तीनों सुरंगों से पानी एक प्रतिष्ठान की ओर जाता है और वहां से अनेक नहरों में बट जाता है और पनचक्कियों के चलने के बाद झरनों के रूप में हौज़ की तरह बने एक प्रतिष्ठान में गिरते हैं। फ़्रांसीसी पुरातनविद मैडम जान ड्यूलाफ़ॉय ने इस प्रतिष्ठान को औद्योगिक क्रान्ति से पहले का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रतिष्ठान बताया है।

 

मीज़ान बांध, हाथ से खोदी गयी गर्गर नहर, पनचक्कियां, गर्गर झरने, बुर्ज अयार बांध, शादरवान पुल, सलासिल क़िला, दारयून नहर के दहाने पर बना प्रतिष्ठान, ख़ाक बांध और लश्कर पुलिस इस जल व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। मिसाल के तौर पर शापूरी बांध या मीज़ान बांध शूश्तर के पूर्वोत्तर में स्थित है। यह बांध कारून नदी के पानी को दो भागों में बांटता है। इस बांध को सासानी राजा शापूर प्रथम के दौर में बनाया गया था। शापूर प्रथम ने रूमी सम्राट वालरीन पर जीत के बाद यह बांध बनवाया था। इस बांध की विभिन्न दौर में मरम्मत की गयी है। शादरवान पुल भी सासानी शासक शापूर के दौर की निशानी है।

 

यह मीज़ान बांध से 300 मीटर की दूरी पर मीज़ान बांध के पश्चिम में स्थित है। यह पुल दस मीटर ऊंचा है। इस वक़्त इस पुल के सोलह निकास मार्ग बाक़ी बचे हैं इन निकास मार्गों में ताक़ बने हुए हैं। सलासिल क़िला भी सासानी काल की बची हुयी विशाल निशानी है। विगत में इस पुल में बहुत बड़ा आंगन, सैन्य प्रतिष्ठान, हम्माम, बुर्जें, सिपाहियों की बैरकें और पुल के चारों ओर ख़न्दक थी। इस वक़्त इसका बड़ा भाग ध्वस्त हो चुका है।  शूश्तर की पानी की आपूर्ति की व्यवस्था की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि यह शूश्तर शहर की ऐतिहासिक संरचना से मिली हुयी है। इस व्यवस्था से पानी के औद्योगिक दृष्टि से इस्तेमाल के इलावा, जिन दिनों पानी की कमी होती थी, इस व्यवस्था से आस-पास के लोगों की पानी की ज़रूरतों को पूरा किया जाता था।

 

 

जिस वक़्त पनचक्कियों से पानी झरने की तरह हौज़ की तरह बनी संरचना में गिरता है, उस वक़्त यह दृष्य अपनी ओर देखने वाले को सम्मोहित कर लेता है। इसी प्रकार बांध के पीछे के काम्पलेक्स का दृष्य भी जहां तीन सुरंगे बनी हुयी हैं, बहुत ही आकर्षक लगता है। इन सुरंगों से पनचक्कियों के पर को चलाने के लिए पानी की एक निर्धारित मात्रा की आपूर्ति की जाती है। इस व्यवस्था की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि न सिर्फ़ ईरान बल्कि दुनिया में इस अद्वीतीय व्यवस्था को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूचि में शामिल किया गया है।

 

 

पवित्र दर्शनीय स्थल शूश्तर के अन्य ऐतिहासिक अवशेष हैं। शूश्तर की हर गली, मोहल्ले, या सड़क पर मस्जिद या दर्शनीय स्थल दिखाई देते हैं। धार्मिक रीतियों में लोगों में बहुत ज़्यादा रूचि के कारण इस शहर को मोमिनों का घर कहा जाता है। शूश्तर की जामा मस्जिद शूश्तर की सबसे मशहूर मस्जिद है। यह मस्जिद 254 हिजरी क़मरी में बनी है। जामा मस्जिद की दीवार पर कूफ़ी लीपि प्लास्टर आफ़ पेरिस से लिखी गयी है। मस्जिद के उत्तरी भाग में एक के पीछे एक 12 खंबे और दक्षिणी भाग में 8 खंबे हैं। इनमें से हर खंबे लगभग 5 मीटर है। ताक़ और ऊंचे बरामदे इस इमारत के इस्लामी काल के आरंभ में बनने का पता देते हैं। मस्जिद को सासानी वास्तुकला के अनुसार बनाया गया है। मस्जिद में बहुत बड़ा आंगन है। मस्जिद के खंबे बहुत मज़बूत हैं। मस्जिद के खंबों की मज़बूती का अंदाज़ा इसके दायरे से लगाया जा सकता है। खंबों का दायरा डेढ़ मीटर है। मस्जिद को पत्थर और ईटों से बनाया गया है। मस्जिद में रखा हुआ मिम्बर ७०० साल पुराना है। मीनार की ऊंचाई निर्माण के वक़्त २६ मीटर थी किन्तु उसके ऊपरी भाग के टूट जाने के कारण अब यह ऊंचाई १८ मीटर रह गयी है।

 

 

शूश्तर की सबसे मशहूर इमारतों के नाम मुस्तौफ़ी और मुइनुत तुज्जार हैं। इन दोनों इमारतों को क़ाजारी काल की वास्तुकला के अनुसार बनाया गया है। इन इमारतों में प्लास्टर आफ़ पेरिस, पत्थर के काम और ईंट काम बहुत ही सुंदर ढंग से किया गया है जिसे देखने वाला देखता ही रह जाए। इन इमारतों के सामने कारून नदी बहती है जिससे बहुत ही सुंदर नज़ारा देखने में आता है। मुस्तौफ़ी इमारत के दो भाग हैं। एक भीतरी और दूसरा बाहरी। बाहरी भाग इस वक़्त सांस्कृतिक धरोहर संस्था की देखरेख में है। इस भाग में हश्ती, प्रवेश द्वार के पास स्थित गलियारे के चारों ओर कमरे, मेहमान के कमरे, शहनशीन, और वह सुंदर संरचना का भाग शामिल है जिसके सामने शादरवान पुल है।

 

 

मुइनुत तुज्जार दो मंज़िला गोल इमारत है और इसकी हर मंज़िल पर एक बरामदा है। इस घर में लकड़ी की खिड़कियां और दरवाज़े लगे हैं। अभी भी इस इमारत का कुछ हिस्सा बाक़ी बचा है।

 

इस इमारत की दीवार को ईंट के काम से सजाया गया है। दीवारों पर ज्यामितीय और वनस्पतियों के चित्र बने हैं। दरवाज़े के ऊपर चाइनीज़ नॉट के चित्र के साथ प्लास्टर आफ़ पेरिस का जालीदार काम किया गया है। यह दोनों इमारतें ईरान की राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल हैं।

शूश्तर शहर के एतिहासिक स्थलों को देखने के लिए पूरे साल देशी विदेशी पर्यटकों का तांता बंधा रहता है। इस शहर की एक ऐसी विशेषता जो इसके जैसे दिखने वाले शहरों से इसे अलग दर्शाती है वह शहर के भीतर बाग़ और खेत हैं। शहर के भीतर बाग़ और खेत बाक़ी रहने का कारण कारून नदी का अथाह पानी है जिससे शहर द्वीप की तरह दिखाई देता है।  क़ाजारी काल का ऐतिहासिक ख़ान नामक बाग़ शूश्तर के अहम बाग़ों में शामिल है। यह बाग़ गर्गर नदी के किनारे स्थित होने के कारण ईरान में शहरों के भीतर मौजूद सबसे सुदंर बाग़ों में से एक है।

 

 

ख़ान नामक बाग़ का क्षेत्रफल २०५०० वर्गमीटर है। ख़ान बाग़ ईरान के अन्य बाग़ों के विपरीत पारंपरिक रूप से वजूद में आया है। इस बाग़ में खजूर, बेर, नींबू, संतरा, केला, अंजीर, अनार, शहतूत, और सजावट के लिए लगाए जाने वाली बेलें और वनस्पतियां मौजूद हैं। इस बाग़ को पारंपरिक ढंग से नहरों के ज़रिए सींचा जाता है। 

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