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बुधवार, 07 अक्तूबर 2015 12:09

शूश्तर

शूश्तर

शूश्तर का क्षेत्रफल लगभग 3500 वर्ग किलोमीटर है। प्राकृतिक नज़र से देखें तो जिस जगह ज़ाग्रूस पर्वत श्रंख्ला का छोर ख़त्म होता है वहां शूश्तर की पूर्वी सीमा है और जबकि इसकी पश्चिमी सीमा देज़ नदी से शुरु होती है। समुद्र की सतह से शूश्तर की औसत ऊंचाई 150 मीटर है। शूश्तर के सामने फ़िदलक पहाड़ स्थित है जो ख़ूज़िस्तान के चौरस भाग में ज़ाग्रुस पर्वत श्रंख्ला की प्राकृतिक सिलवटों का अंत समझा जाता है। अहवाज़ से शूश्तर की दूरी 85 किलोमीटर जबकि राजधानी तेहरान से शूश्तर की दूरी 831 किलोमीटर है। शूश्तर शहर भी ईरान के दूसरे शहरों की तरह बहुत से मूल्यवान ऐतिहासिक धरोहरों से संपन्न है।

 

शूश्तर की जलवायु ख़ूज़िस्तान के दूसरे ज़िलों की तरह गर्म है और गर्मी के मौसम में कभी कभी शूश्तर में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। सर्दी के मौसम में अच्छी जलवायु रहती है। शूश्तर की अहम चोटियों में कूहे तफ़्त, कूहे सियाह और कूहे चाल उल्लेख्नीय हैं। शूश्तर ज़िले में बहने वाली सबसे अहम नदी कारून है जिसका उद्गम बख़्तियारी पर्वत श्रंख्ला है। कारून नदी शूश्तर में दो भाग उत्तर और पश्चिमोत्तर में बट जाती है। शूश्तर के पूर्वोत्तर से गुज़रने वाले भाग में कई सुंदर झरने पड़ते हैं। कारून नदी के दोनों भाग पचास किलोमीटर आगे जाकर फिर एक हो जाते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कारून और उसकी शाखाओं ने शूश्तर को एक द्वीप की तरह घेर लिया है। किसी भी तरफ़ से शूश्तर में दाख़िल होने के लिए नदी पर बने पुल से गुज़रना पड़ता है। चूंकि शूश्तर ख़ूज़िस्तान प्रांत के चौरस भूमि के भाग में पड़ता है, इसलिए यह ज़िला भूमिगत जलस्रोत की नज़र से बहुत मालामाल है जिससे शूश्तर बहुत आकर्षक हरियाली से संपन्न है। ख़ूज़िस्तान प्रांत की सबसे उपजाऊ ज़मीन का लगभग 50 फ़ीसद भाग और इसी प्रकार इस प्रांत के कुल पानी का एक तिहाई भाग अकेले शूश्तर के पास है। शूश्तर खेती की नज़र से बहुत अहम क्षेत्र है। शूश्तर में गेहू, जौ, चावल, लोबिया, मूंग, तिल, चुक़न्दर, गन्ना, विभिन्न प्रकार की सब्ज़ियों और तरकारियों की खेती होती है।

 

 

शूश्तर ज़िले की जलवायु शुष्क व गर्म है इसलिए इस इलाक़े में गर्म व मरुस्थलीय इलाक़ों में उगने वाली वनस्पतियां पायी जाती हैं। शूश्तर में विलो, बेर, यूक्लिप्टस और झाऊ के पेड़ पाए जाते हैं।

 

शूश्तर में खेती पुराने और आधुनिक दोनों तरीक़ों से की जाती है। शूश्तर शहर से 12 किलोमीटर पश्चिम में कारुन उद्योग व खेती काम्पलेक्स है जिसमें आधुनिक तरीक़े से खेती की जाती है। कारून उद्योग व खेती काम्पलेक्स के पास कारूर गन्ना कारख़ाना है। यह कारख़ाना मध्यपूर्व में गन्ने के सबसे बड़े कारख़ानों में शामिल है। आपको यह भी बताते चलें कि हालिया कुछ दशकों से ख़ूज़िस्तान प्रांत में जलचर प्राणियों को पाला जा रहा है। पूरे ख़ूज़िस्तान प्रांत में कुल जलचर प्राणियों के 35 फ़ीसद भाग की पैदावार शूश्तर में होती है। मछलियों का एक भाग लोग अपने इस्तेमाल में लेते हैं और बाक़ी भाग को आसपास के शहरों, प्रांत से बाहर यहां तक कि कुवैत निर्यात किया जाता है।

 

 

पशुपालन ही शूश्तर की जनता की आय एक अहम स्रोत है। इस इलाक़े में पशुपालन भी दो तरीक़ों से किया जाता है एक पारंपरिक ढंग और दूसरा आधुनिक ढंग। ख़ूज़िस्तान प्रांत की चरागाहें सर्दी के मौसम में गर्म इलाक़ों वाली हैं। इसलिए सर्दी के मौसम में हरी भरी रहती हैं।

 

विशाल बख़्तियारी बंजारे क़बीले, पतझड़ के शुरु में ख़ूज़िस्तान की ओर पलायन करते हैं और शूश्तर के आस-पास की चरागाहों के पास रहते हैं और बसंत ऋतु के शुरु के दिनों तक शूश्तर के उपनगरीय इलाक़ों की चरागाहों में अपने जानवर चराते हैं। शूश्तर के ग्रामवासी दुग्ध उत्पाद के लिए गाय और भैंस पालते हैं।  पारंपरिक पशुपालन के मुक़ाबले में आधुनिक पशुपालन की शैली भी इस इलाक़े में प्रचलित है कि इसका लक्ष्य स्थानीय जानवरों की जाति में सुधार करना और उनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। इसलिए शूश्तर में आधुनिक पशुपालन शैली की अनेक इकाइयां मौजूद हैं। शूश्तर में घोड़ा भी पाला जाता है। पूरे ख़ूज़िस्तान प्रांत के लगभग 30 फ़ीसद घोड़े शूश्तर में पाए जाते हैं।  शूश्तर अपनी प्राकृतिक संभावनाओं के कारण वहां हिरन, जंगली बिल्ली, लोमड़ी, सियार, भेड़िये,सेबल और जंगली सूअर पाए जाते हैं। गुतवन्द चोटी पर जो शूश्तर ज़िले के पश्चिमोत्तरी भाग में स्थित है, बकरी और मेढ़ा पाए जाते हैं। सर्दी के मौसम में शूश्तर ज़िले में मुर्ग़ाबी, हंस, बत्तख़, हुदहुद,सारस, टिकरा पक्षी, वाइट इयर्ड बुलबुल और मैना पाए जाते हैं। इसी प्रकार गर्मी के मौसम के अंत से बारिश शुरु होने तक बाज़ और शिकरे जैसे शिकारी परिन्दे भी दिखायी देते हैं।

 

 

इतिहास में शूश्तर की स्थापना की तारीख़ स्पष्ट नहीं है लेकिन ईरानी दन्तुकथाओं के अनुसार राजा हूशंग पीशदादी ने शूश्तर को बसाया था। सबसे पुराने दस्तावेज़ के अनुसार, सासानी शासन काल में शूश्तर शहर बसा हुआ था। शूश्तर में ऐतिहासिक इमारतों और पुरातात्विक खुदाई में मिलने वाले अवशेष से पता चलता है कि विगत की शताब्दियों के शासक शूश्तर पर ध्यान देते थे। शादरवान और मीज़ान नामक बांध, सलासिल व रुस्तम क़िलों का निर्माण, शूश्तर के झरने और ऐतिहासिक इमारतों से इस दावे को बल मिलता है। इतिहास की किताबों के अनुसार शूश्तर का नाम इसकी उपजाउ ज़मीन और पानी की बहुतायत के कारण शूश्तर पड़ा जिसका अर्थ होता है बेहतर। विगत में शूश्तर कारून नदी के ज़रिए भारत और फ़ार्स खाड़ी के तटवर्ती देशों के संपर्क में रहा है और यह शहर बंदरगाह का रोल अदा करता था। क़ाजारी शासन काल के अंतिम वर्षों तक शूश्तर में रोज़गार की संभावनाएं बहुत थीं। ये संभावनाएं खेती, पुशपालन और हस्तकला उद्योग के कारण थी। शूश्तर ज़िले में बहुत से विद्वान और कवि पैदा हुए हैं। शूश्तर की प्रशंसा में मोरक्को के मशहूर पर्यटक इब्ने बतूता ने अपने प्रसिद्ध यात्रावृत्तांत में लिखा है, “तुस्तर (मौजूदा शूश्तर) बहुत बड़ा व सुंदर शहर है। अच्छे खेतों और बाग़ों से समृद्ध है।

 

यह प्राचीन शहरों में है और इसके बाज़ार भरोसे के लायक़ हैं। नदी के दोनों ओर बाग़ हैं। तुस्तर में फलों की भरमार रहती है। इस शहर में भलाई ज़्यादा हैं और इसके बाज़ार अच्छाई की नज़र से बेजोड़ हैं।”

 

इब्ने बतूता ने अपने यात्रावृत्तांत में इब्ने ख़लदून की तरह ईरान की संस्कृति और नगरीय संस्कृति की बहुत तारीफ़ की है यहां तक कि उन्होंने तबरीज़ और शूश्तर में ऐसे विद्वानों से मुलाक़ात की जो अपने ज़माने के प्रचलित सभी ज्ञान में दक्ष थे। उन्होंने शूश्तर के धर्मगुरुओं को महाविद्वान कहा है।

 

 

अरब पर्यटक अबू अब्दिल्लाह मोहम्मद बिन अहमद मुक़द्दसी ने ही अपनी किताब अहसनुत तक़ासीम फ़ी तअरेफ़तिल अक़ालीम में लिखा है, “इस पूरे भूभाग पर शूश्तर से अच्छा कोई स्थान नहीं। उसके चारों ओर एक नदी चक्कर काटती है, खजूर और फलों के बाग़ फैले हुए हैं। इस शहर में रूई और दीबा के बुनकर बहुत हैं जो सभी शहरों के बुनकरों से बेहतर हैं।”

 

आपको यह भी बताते चलें कि शूश्तर का इतिहास कम से कम सासानी शासन काल से मिलता है और बहुत से इतिहासकारों व पर्यटकों ने शूश्तर के हाथ से बुने कपड़ों की दुनिया भर में शोहरत का उल्लेख किया है। शूश्तर में कपड़े की बुनाई का उद्योग क़ाजारी शासन काल में पतन का शिकार हुआ। आज शूश्तर शहर में सीमित स्तर पर हस्तकला उद्योग के सीमित स्तर पर कारख़ाने मौजूद हैं जिनमें चूक़ा जैसे ऊन के मोटे कपड़े और मौज बाफ़ी और नमाज़ की विशेष दरी बुनी जाती है। आज भी शूश्तर के क़ालीन और गेलीम नामक ऊनी कपड़ों की मांग है।

                

शूश्तर में बांध और चक्की जैसे अनेक पुराने प्रतिष्ठान मौजूद हैं जिससे यह शहर पानी को नियंत्रित करने वाले एक सुदंर म्यूज़ियम की तरह लगता है। शूश्तर के बाधं यह दर्शाते हैं कि ईरानी पानी को नियंत्रित करके उसके उपयोग के बारे में कितना समझदार थे। जैसे मीज़ान और शापूरी बांध की मिसाल ले लें।  2009 में शूश्तर के झरने और चक्कियों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूचि में शामिल किया है। 

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