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बुधवार, 09 सितम्बर 2015 15:39

आबादान

आबादान

आबादान त्रिकोण की तरह दिखने वाला द्वीप है। यह फ़ार्स की खाडी के पश्चिमोत्तर में स्थित है और इसका क्षेत्रफल लगभग 2800 वर्ग किलोमीटर है। आबादान शहर समुद्र से 5 मीटर ऊंचाई पर स्थित है और तेहरान से इसकी दूसरी 1066 किलोमीटर है। इतिहासकार याकूत हमवी ने आबादान को अर्वन्द रूद और कारून नदियों के बीच स्थित एक बड़ा द्वीप कहा है। इतिहासकारों व भूगोलशास्त्रियों के अनुसार आबादान किसी ज़माने में नौका विहार और पर्यटन के लिए मशहूर था। हुदूदुल आलम किताब में आबादान को नदी के किनारे एक छोट बसा हुआ शहर कहा गया है।

 

 

मोरक्को के इतिहासकार व भूगोलशास्त्री इब्ने बतूता ने आबादान को एक बड़ा गांव और भूगोलशास्त्री इब्ने हौक़ल ने नदी के किनारे आबादी का छोटा क़िला कहा है। विगत में आबादान को अब्बादान कहा जाता था। चौदहवीं हिजरी शम्सी के शुरु में इस महत्वपूर्ण बंदरगाह का नाम आबादान हो गया।

आबादान ख़ूज़िस्तान प्रांत के दक्षिणी छोर पर स्थित ज़िला है और यह ईरान के गर्म क्षेत्रों में से एक है। अर्वन्द रूद और कारून नदियों के पड़ोस तथा फ़ार्स की खाड़ी के क़रीब स्थित होने के कारण इस ज़िले में गर्मी के मौसम में आर्द्रता के साथ तापमान ज़्यादा रहता है जबकि सर्दी का मौसम संतुलित रहता है। इस इलाक़े में चार तरह की हवाएं बहती हैं। मौसमी हवा, उत्तर में बहने वाली स्थानीय हवा, आर्द्र क्षेत्र में बहने वाली हवा और गर्म आर्द्र हवा। मौसमी वाली हवा सर्दी के मौसम में ठंडी बहती है जबकि गर्मी के मौसम में बहुत ही गर्म होती है। स्थानीय हवाओं में उत्तरी हवा गर्मी के मौसम में शुष्क होती है जबकि सर्दी के मौसम में तूफ़ान का रूप ले लेती है। आर्द्र हवा भारी होती जिससे लोग तकलीफ़ महसूस करते हैं जबकि साम हवाएं सऊदी अरब की ओर से चलती हैं और यह हवा अपने साथ मिट्टी और रेत  लाती है। साम हवा भी बहुत शुष्क और झुलसाने वाली होती है। हालिया वर्षों में साम हवा ज़्यादा चलने के कारण आबादान के लोगों को सांस लेने में मुश्किल होने लगी है।

 

 

मरुस्थल की जलवायु गर्म और शुष्क होती है। आबादान की मिट्टी खेती के लिए बहुत अनुकूल है। आबादान के कृषि उत्पाद में सबसे ज़्यादा खजूर होती है। आलू, प्याज़, लौकी, अनार, कीवी, तरबूज़, ख़रबूज़ा, गन्ना, फूल, इत्यादि अन्य कृषि उत्पाद हैं। इन उत्पादों को आबादान और चूइब्दे की बंदरगाहों से क़तर, कुवैत, संयुक्त अरब इमारात, ब्रिटेन, कैनडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, और दक्षिण अफ़्रीक़ा निर्यात किया जाता है।

 

ख़ूज़िस्तान प्रांत के इलाक़े मस्जिद सुलैमान में तेल की खोज होने के बाद आबादान का विकास हुआ। अर्वन्द रूद और कारुन नदियों के तट पर स्थित होने और तेल को विदेश निर्यात करने की संभावना के मद्देनज़र आबादान में बहुत बड़ी रिफ़ाइनरी लगायी गयी। इस रिफ़ायनरी में 1912 ईसवी में तेल शोधन का काम शुरु हुआ। आबादान की रिफ़ाइनरी दुनिया की बड़ी रिफ़ाइनरियों में और पूर्वी गोलार्ध में तेल उत्पाद के निर्यात का महत्वपूर्ण केन्द्र समझी जाती है। ख़ूज़िस्तान प्रांत के ज़्यादातर इलाक़ों से तेल पाइप लाइन से आबादान पहुंचता है जिसे रिफ़ाइन करने के बाद निर्यात किया जाता है। रिफ़ाइनरी लगने से ईरान के नज़दीक और दूर स्थित शहरों से विशेषज्ञ और मज़दूर इस नए औद्योगिक केन्द्र की ओर चल पड़े जिसके नतीजे में आबादान में सांस्कृतिक विविधता वाला समाज वजूद में आया और आबादान की आर्थिक स्थिति भी बहुत तेज़ी से सुधरी। 1355 हिजरी शम्सी में आबादान की शहरी आबादी ख़ूज़िस्तान के दूसरे शहरों की तुलना में सबसे ज़्यादा थी और यह उद्योग व वाणिज्य की नज़र से ईरान के महत्वपूर्ण शहरों में शामिल है। इसके इलावा आबादान रिफ़ाइनरी के पास एक पेट्रोकेमिकल प्रतिष्ठान स्थापित हुआ है जिसका नाम है आबादान पेट्रोकेमिकल शेयर कंपनी। यह सात कारख़ानों पर आधारित कंपनी है। एथलिन, क्लोरिन, कास्टिक सोडा, पोलिवाइनल क्लोराइड, क्लोराइड जैसे पेट्रोकेमिकल उत्पाद पैदा होते हैं। 1348 हिजरी शम्सी में इस कंपनी की स्थापना की गयी। आबादान पेट्रोकेमिकल का क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और रोज़गार सृजन की नज़र से अहम योगदान है।

 

 

ईरान के ख़िलाफ़ 22 सितंबर 1980 को इराक़ के सद्दाम शासन की ओर से थोपी गयी जंग शुरु होते ही, आबादान शहर पर इराक़ी सेना ने ज़मीन और हवाई हमले किए जिससे इस शहर को बहुत ज़्यादा जानी और माली नुक़सान हुआ। इस जंग से रिफ़ाइनरी, तेल के प्रतिष्ठान, बंदरगाहों, हवाई अड्डे सहित अन्य औद्योगिक व आर्थिक केन्द्र, वाटर सप्लाई के नेटवर्क, बिजली के प्रतिष्ठान और शहर की आबादी वाले इलाक़ों को बहुत नुक़सान पहुंचा, शहर की आबादी काफ़ी कम हो गयी और आर्थिक गतिविधियां रुक गयीं। इस प्रकार आबादान जंग के शुरु के एक साल तक इराक़ के बासी शासन की अतिक्रमणकारी सेनाओं की नाकाबंदी में था किन्तु आबादान की जनता की वीरता और इस्लामी जियालों के प्रतिरोध ने दुश्मन के मन से इस शहर का अतिग्रहण करने का ख़्याल निकाल दिया। अंततः इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के इस आदेश पर कि आबादान की नाकाबंदी टूटनी चाहिए, सितंबर 1981 के अंतिम दिनों में एक बड़ी कार्यवाही के ज़रिए आबादान की नाकाबंदी तोड़ी गयी और दुश्मन दुम दबाकर भागने पर मजबूर हुआ। नाकाबंदी टूटने के बाद भी काफ़ी समय तक यह शहर दुश्मन की अंधाधुंध फ़ायरिंग से सुरक्षित नहीं था जिसके नतीजे में इस शहर में कोई स्थान सुरक्षित नहीं था। इसी प्रकार सद्दाम की सेना ने रासायनिक हथियार से हमला करके आबादान शहर के वातावरण को रासायनिक दृष्टि से दूषित कर दिया था जिसके कारण लोग अपना घर बार छोड़ कर दूसरे स्थान की ओर पलायन करने पर मजबूर हुए।

 

 

जंग ख़त्म होने के बाद इस्लामी गणतंत्र ईरान की सरकार ने आबादान को पहले की स्थिति में लाने के लिए कमर कस ली और तबाही के असर को बहुत हद तक ख़त्म करने में कामयाब रही।  आपको यह बताते चलें कि आबादान भी ईरान के प्राचीन शहरों में से एक है जो प्राकृतिक, ऐतिहासिक, व्यापारिक, आध्यात्मिक और पर्यटन के आकर्षणों से समृद्ध है। अर्वन्द रूद नदी का सुंदर तट और उसके द्वीप शिकार की जेटियों पर शिकार का दृष्ट, आबादान के आकर्षण हैं। सर्दी के मौसम के अंतिम दिनों और बसंत ऋतु के शुरु में उचित तापमान के कारण पूरे ईरान से सैलानियों का तांता बंधा रहता है। इसके इलावा आबादान के म्यूज़ियम, इस शहर के बाज़ार, मस्जिदों और आर्मीनियों के गिरजाघर आबादान के इतिहास और पर्यटन की नज़र से अन्य आकर्षण हैं।

आबादान के म्यूज़ियम को 1328 हिजरी शम्सी में ईरान की पारंपरिक वास्तुकला की शैली के अनुसार बनाया गया। इसकी इमारत का गुंबद शूश में ईश्वरीय दूत हज़रत दानियाल के मक़बरे के गुंबद जैसा है। इस म्यूज़ियम में इतिहासपूर्व और उसके बाद के काल से क़ाजारी शासन काल तक के अवशेष मौजूद हैं। इसी प्रकार ईरान की पारंपरिक कलाओं के नमूने भी आबादान के म्यूज़ियम में रखे हुए हैं। फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती देशों के पड़ोस में स्थित होने तथा जहाज़ के ज़रिए चीज़ों का निर्यात व आयात होना और उचित क़ीमत पर विविधतापूर्ण चीज़ों का मिलना वे कारण है कि ईरान के अन्य शहरों और प्रांतों से लोग  से भरा ख़रीदारी और पर्यटन के लिए आबादान जाते हैं जिससे आबादान के बाज़ारों में रौनक़ रहती है।

 

 

1319 हिजरी शम्सी में सूर्त गैरापिट नामक गिरजाघर बनाया गया जिसे आबादान की ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है। इराक़ की ओर से ईरान पर थोपी गयी जंग के दौरान इस गिरजाघर को नुक़सान पहुंचा था जिसकी जंग ग्रस्त क्षेत्रों की मरम्मत के लिए गठित संस्था ने मरम्मत करायी। आबादान के ग्रेगोरियम आर्मिनियों के गिरजाघर को आबादान के आर्मीनियों के इकट्ठा होने का सबसे बड़ा केन्द्र समझा समझा जाता है। इसके गिरजाघर की दीवार बहबहानियों की मस्जिद की दीवार से मिली ही है और यह धार्मिक आज़ादी और ईरान की संस्कृति व कला का सुंदर नमूना पेश करता है।

 

आबादान और ख़ुर्रमशहर का आध्यात्मिक आकर्षण इस शहर से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल ईरानी नववर्ष नौरोज़ के क़रीब आते ही दसियों लाख ईरानी क़ाफ़िलों के रुप में उन मोर्चों को देखते हैं जिन पर ईरानी वीर सद्दाम के हमले के वक़्त डटे हुए थे। अर्वन्द किनार के तट ईरान के सीमावर्ती शहर अर्वन्द किनार और इराक़ के फ़ाउ शहर के बीच स्थित है, पवित्र प्रतिरक्षा की यादें ताज़ा करने के लिए बहुत ही अह्म स्थान है। हर साल इन स्थानों पर नुमाइशें लगती हैं और यह शहर हर रोज़ दसियों हज़ार पर्यटकों का स्वागत करता है।

 

क़ालीन, चटाई, गेलीम नामक ऊनी कपड़े और हज के विशेष कपड़े एहराम की बुनायी जैसे हस्तकला उद्योग, मछली के शिकार के लिए जाल की बुनायी, मिट्टी के बर्तनों का निर्माण और उन पर चित्रकारी और क़ुल्लाब बाफ़ी अर्थात ऊन से विशेष बुनायी जैसे उद्योग प्रचलित हैं। 

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