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बुधवार, 02 सितम्बर 2015 14:52

ज़िगोरात चुग़ाज़म्बील

ज़िगोरात चुग़ाज़म्बील

प्राचीन शूश नगर से 40 किलोमीटर की दूरी पर विश्व धरोहर की सूचि में शामिल एक उपासना स्थल है जो ‘ज़िगोरात चुग़ाज़म्बील’ के नाम से मशहूर है। यह इंसान के हाथों बनी बहुत ही अद्भुत कलाकृति है। यह कलाकृति वर्षों से ईरानी और विदेशी शोधकर्ताओं के ध्यान का केन्द्र बनी हुयी है। चुग़ाज़म्बील अब तक के जिन उपासना स्थलों के अवशेष मिले हैं, उनमें सबसे बड़ा उपासना स्थल है। ईरान का यह पहला ऐतिहासिक अवशेष है जिसे 1979 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर की अपनी सूचि में शामिल किया और विश्व समुदाय इस जगह की अहमियत को मानता है। ज़िगोरात सूमरी ज़बान में ऐसे उपासना स्थल को कहते हैं जो सीढ़ी के रूप में कई मंज़िला होता है। ताज़ा शोध के अनुसार चुग़ाज़म्बील को 1250 वर्ष ईसापूर्व में ऊनताश गाल ने बनवाया था। यह उपासना स्थल ईलामी काल की निशानी है।

 

 

वास्तुकला की नज़र से चुग़ाज़म्बील पिरामिड की तरह दिखने वाली पांच मन्ज़िला इमारत है। किसी ज़माने में इसकी ऊंचाई 50 मीटर से ज़्यादा थी लेकिन अब इसकी आधी ऊंचाई रह गयी है। इसकी दीवारों को कच्ची ईंटों से बनाया गया है और दीवारों की बाहरी सतह को ईंट से कवर किया गया है।

पुरातात्विक खुदाई के अनुसार, इस इमारत का बड़ा भाग रहने के लिए इस्तेमाल होता था। इमारत की बाहरी चहारदीवारी लगभग 100 हेक्टर पर फैली हुयी थी। इमारत के आंगन के चारों ओर ज़्यादातर कमरे चौकोर हैं। इन कमरों में किचन, हम्माम जैसी सुविधा मौजूद है। इनमें से हर एक कमरा किसी व्यक्ति या परिवार से विशेष था। इस उपासना स्थल के पास एक और आकर्षक सुविधा पानी पहुंचाने के प्रतिष्ठान की है जिसकी निशानियां आज भी मौजूद हैं। पानी पहुंचाने के प्रतिष्ठान में पानी की सफ़ाई के लिए अनेक हौज़ बने हैं और इस उपासना स्थल तक पानी पहुंचाने के लिए इन हौज़ों को बहुत ही हिसाब से बनाया गया है। ईलाम शासन काल के अन्य शहरों की तरह चुग़ाज़म्बील भी 640 वर्ष ईसापूर्व में आशूरियों के हाथों आधा तबाह हो गया।

 

 

शूश ज़िले में एक और ऐतिहासिक व धार्मिक इमारत देअबल बिन ख़ुज़ाई का मक़बरा है। देअबल मशहूर शायर, साहित्यकार, मोहद्दिस और धर्मगुरु थे। उनका मक़बरा प्राचीन शूश शहर के उत्तरी भाग में इस शहर के प्राचीन क़ब्रस्तान में इमामज़ादे अब्दुल्लाह बिन अली के मक़बरे के बग़ल में स्थित है। हसन बिन अली उर्फ़ देअबल ख़ुज़ाई 148 हिजरी क़मरी में पैदा हुए और 246 हिजरी क़मरी में उनका स्वर्गवास हुआ। वह दूसरी और तीसरी हिजरी शताब्दी में पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से श्रद्धा रखने वाले प्रतिष्ठित लोगों में हैं। उन्होंने अपनी समझदारी से शीयों को सम्मान दिलाया। उनके दौर में अब्बासी शासकों के हाथ में शासन था। ज़्यादातर अब्बासी शासक शेर शायरी पसंद करते थे और ऐसे शेर बहुत पसंद करते थे जो उनकी प्रशंसा में कहे जाते थे। उन दिनों ऐसे शायरों की भरमार थी जो अब्बासी शासकों की प्रशंसा में शेर कह कर हज़ारों ईनाम पाते थे। ऐसे माहौल में देअबल ख़ुज़ाई ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से श्रद्धा पर आधारित शेर कह कर व्यवहारिक रूप से अब्बासी शासन का विरोध किया।          

कार्यक्रम के इस भाग में देज़फ़ूल ज़िले से आपको परिचित कराएंगे। यह वह इलाक़ा है जहां के बच्चों और औरतों समेत आम बेगुनाह लोग इराक़ के सद्दाम शासन की ओर से मीसाईल के हमलों में शहीद हुए । इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम शासन द्वारा ईरान पर थोपी गयी आठ साल की जंग में देज़फ़ूल को तोपों से निशाना बनाए जाने के अलावा इस ज़िले पर कम से कम 160 बार मीसाइल के हमले हुए। यही कारण है कि फ़ार्स खाड़ी के तटवर्ती देश देज़फ़ूल को बलदुस्सवारीख़ के नाम से याद करते हैं। अरबी भाषा में बलदुस्सवारीख़ का मतलब होता है मीसाइलों का शहर। जंग के बाद इस शहर के प्रतिरोध के मद्देनज़र देज़फ़ूल को आदर्श शहर घोषित किया गया। जंग के दौर की देज़फ़ूल के आस-पास मौजूद निशानियां इस इलाक़े की जनता की वीरता की गाथा सुनाती हैं।

 

 

देज़फ़ूल ज़िला अहवाज़ से 145 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इसका क्षेत्रफल 4700 वर्गकिलोमीटर है। इस ज़िले में सर्दी के मौसम में संतुलित सर्दी पड़ती है जबकि गर्मी का मौसम बहुत गर्म होता है। देज़फ़ूल ज़िला दो भाग में बटा हुआ है। एक पहाड़ी और दूसरा मैदानी व चौरस भूमि वाला भाग। देज़फ़ूल ज़िले का उत्तरी भाग पहाड़ी इलाक़ा है जबकि मैदानी व चौरस भूमि का इलाक़ा इस ज़िले का दक्षिणी और केन्द्रीय भाग है। देज़फ़ूल में अहम नदियां बहती हैं जिनके नाम देज़ और कर्ख़े हैं। इन दोनों नदियों और देज़ बांध से इस इलाक़े में खेती को बहुत फ़ायदा पहुंचता है।  इस बात का ज़िक्र भी ज़रूरी लगता है कि खेती की नई शैली और मेकैनिकल साधनों के इस्तेमाल से इस इलाक़े के विकास में मदद मिली है। यही कारण है कि देज़फ़ूल को ख़ूज़िस्तान प्रांत के खेती के केन्द्रों में गिना जाता है। देज़फ़ूल ज़िले की अर्थव्यवस्था खेती, पशुपालन और उद्योग पर निर्भर है। खेती का उत्पादन में योगदान ज़्यादा है और ज़्यादातर देज़फ़ूलवासी खेती से जुड़े हुए हैं। विभिन्न प्रकार के अनाज, शकर बनाने के लिए विशेष चुक़न्दर, सिट्रस फ़ूड, सूरजमुखी, पत्तागोभी, गाजर, ज़ैतून, अंगूर, सजावट में इस्तेमाल होने वाले फूल, जानवरों की खाल, ऊन, दुग्ध उत्पाद, और कुछ दूसरे औद्योगिक उत्पाद देज़फ़ूल में उत्पादित होते हैं जिनके इज़ाफ़ी भाग को ईरान के दूसरे क्षेत्रों के बाज़ारों में भेज दिए जाते हैं।

देज़फ़ूल शहर अपनी ऐतिहासिक संरचनाओं के मद्देनज़र ईंट की इमारतों के म्यूज़ियम के नाम से मशहूर है। शहर के बीच से स्वच्छ पानी वाली देज़ नदी गुज़रने और सिट्रस फूड के सुगंधित हरे भरे बाग़ के वजूद से बसंत ऋतु में इस शहर की सुंदरता निखर जाती है। अच्छी जलवायु के कारण बसंत ऋतु में सैलानियों का तांता बंधा रहता है।

देज़फ़ूल का नाम इतिहास के अनुसार पहले अन्ताबलस। देज़फ़ूल का नाम उसके वजूद में आने के वक़्त से अब तक कई बार बदल चुका है और समय के साथ इसका नाम अब देज़फ़ूल हो गया है। इसके हज़ारों साल पुराने वजूद की गाथा वह पुल सुनाता है जो सासानी शासन काल में 260 ईसवी में बना था और आज यही पुलस देज़फ़ूल और अन्दीमिश्क को जोड़ता है। इस पुल में 14 मुहाने बने हैं और मौजूदा दौर में परिवहन के साधनों के इस पर गुज़रने की नज़र से यह दुनिया का सबसे पुराना पुल है। अज़ुदुद्दौला दैलमी, सफ़वी और क़ाजारी शासन काल में इस पुल की कई बार मरम्मत हो चुकी है। पुल के पास और नदी के किनारे  प्राचीन ज़माने की चक्कियों के अवशेष दिखाई देते हैं।

 

 

इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों की लब ख़न्दक़ और देज़फ़ूल जामा मस्जिद, चुग़ाबनूत टीला, ईरानी कमान्डर याक़ूब लैस का मक़बरा, सब्ज़क़ुबा, मोहम्मद बिन जाफ़र, शाह अबुल क़ासिम, शाहरुक्नुद्दौला के मक़बरे देज़फ़ूल ज़िले के अन्य पर्यटन स्थल हैं जिसे देखने के लिए हर साल हज़ारों पर्यटक पहुंचते हैं। पुरातात्विक खुदाई से पता चलता है कि चुग़ाबनूत टीला देज़फ़ूल से 30 किलोमीटर पूरब में स्थित है। यह टीला मिट्टी के बर्तन बनने की कला विकसित होने के दौर से पहले का है और लगभग 10 हज़ार साल पुराना है। टीले पर हुयी खुदाई में पैलियोलिथिक काल की पत्थर के नाज़ुक ब्लेड मिले हैं। आपको यह भी बताते चलें कि देज़फ़ूल की प्राचीन संरचना के पास इस शहर का प्राचीन बाज़ार भी दर्शनीय है।

 

देज़फ़ूल के हस्तकला उद्योगों में क़ालीन, ऊनी कपड़े गेलीम, मोटे कपड़े जाजीम, मिट्टी और लकड़ी की बनी चीज़ें उल्लेखनीय हैं। कपूबाफ़ी अर्थात डलिया की बुनाई भी देज़फ़ूल के महत्वपूर्ण हस्तकला उद्योग में शामिल है और हर साल इसके विभिन्न प्रकार के उत्पाद ईरान के भीतर और विदेश में निर्यात किए जाते हैं। कपू में छोटी टोकरी, फल की टोकरी और सजाने के लिए इस्तेमाल होने वाले छोटे डिब्बे शामिल हैं। इसे खजूर के पत्तों और क्षेत्र की विशेष वनस्पति के पत्तों से बुना जाता है। देज़फ़ूल का एक और उद्योग मिश्रित धातु के बर्तन भी है। देज़फ़ूल में मिश्रित धातु के बर्तन के कारख़ाने मौजूद हैं।

 

 

वर्शूसाज़ी में चाय का पानी गर्म करने वाला बर्तन समोवर,सीनी और फ़ायरपैन बनाए जाते हैं। सोने-चांदी के बर्तनों पर नक़्क़ाशी और सुनारी का काम भी देज़फ़ूल में प्रचलित है। (MAQ)

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