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मंगलवार, 01 दिसम्बर 2015 17:07

अबूसब्र और अबूक़ीर की कहानी

अबूसब्र और अबूक़ीर की कहानी

पुराने ज़माने में इस्कंदरिया नगर में एक नाई और एक रंगरेज़ साथ साथ रहा करते थे।  रंगरेज़ का नाम अबूक़ीर था जबकि नाई का नाम अबूसब्र था।  अबूक़ीर बहुत ही झूठा और मक्कार इंसान था।  हालांकि अबूक़ीर, को कपड़ों पर रंग करने का काम अच्छी तरह से आता था किंतु वह अपनी आदत से मजबूर था और झूठ के बिना उसका काम ही नहीं चलता था। 

 

जब भी कोई इंसान उसके पास कपड़े लेकर आता और उससे कहता कि इसको रंग दो तो वह कहता कि पहले रंगाई के पैसे मुझे दे दो और अपने कपड़े लेने कल आना।  जब अगले दिन वह व्यक्ति अपने कपड़े लेने आता तो अबूक़ीर कहता कि कल हमारे यहां मेहमान आ गए थे जिसकी वजह से तुम्हारा काम नहीं कर सका अच्छा तुम कल आना तुमको कपड़े मिल जाएंगे।  ग्राहक जब अगले दिन आता तो अबूक़ीर एक नई कहानी गढकर उसको वापस कर देता।  इस तरह से वह अपने गाहकों को टालता रहता था।  जब कोई गाहक बार-बार आकर थक जाता तो वह रंगरेज़ अबूक़ीर से कहता कि अच्छा बिना रंगा हुआ कपड़ा ही मुझको वापस कर दो।  ऐसे में अबूक़ीर कहता कि अब आपसे क्या छिपाना।  अस्ल में मैंने आपके कपड़े को तो पहले ही दिन रंग दिया था लेकिन उसी दिन मेरे घर में चोरी हो गई और चोर घर का सारा सामान ले गया जिसमें आपका कपड़ा भी था।  रंगरेज़ का जवाब सुनकर कुछ गाहक तो कुछ भी नहीं कहते और वहां से चले जाते थे जबकि कुछ का अबूक़ीर से झगड़ा भी हो जाता था।  इस तरह अकसर अबूक़ीर की दुकान पर शोर-शराबा रहा करता था।

 

  अबूक़ीर अब शहर में बदनाम हो चुका था।  लोगों ने उसकी दुकान पर आना छोड़ दिया था।  अबूक़ीर के पास अब काम नहीं रहता था इसलिए अधिकतर समय वह पड़ोसी अबूसब्र की दुकान पर बैठा रहता था।  अब वह घंटों गाहक का इंतेज़ार करता लेकिन कोई भी उसके पास नहीं आता था।

 

 

एक दिन नगर में एक व्यक्ति आया जो ताक़तवर तो था ही और झगड़ालू भी।  वह व्यक्ति अबूक़ीर की दुकान पर गया और उसने कहा कि मेरे इस कपड़े को रंग दो।  अबूक़ीर ने हमेशा की तरह रंगाई के पैसे पहले ले लिए और उससे कहा कि कल आकर अपने कपड़े ले जाना।  वह चला गया और अगले दिन आया लेकिन उसे दुकान पर अबूक़ीर नहीं दिखा।  इस तरह कई दिन गुज़र गए और नए गाहक को अबूक़ीर उसकी दुकान पर नहीं दिखा।  होता यह था कि जब कोई भी नया गाहक अबूक़ीर की दुकान की तरफ आ रहा होता तो वह भागकर अपने पड़ोसी अबूसब्र की दुकान में जाकर छिप जाया करता था।  इस बीच नया गाहक समझ चुका था कि उसे धोखा दिया गया है इसलिए उसने क़ाज़ी के पास जाकर अबूक़ीर की शिकायत की।  क़ाज़ी ने उसके साथ अपना एक आदमी भेजा ताकि रंगरेज़ को लाया जाए लेकिन उन्हें वहां वह नहीं मिला।  क़ाज़ी के आदमी ने अबूक़ीर की दुकान को सील कर दिया।  उसके बाद उसने पड़ोसियों को बुलाकर कहा कि अबूक़ीर से कह देना कि अगर उसको दुकान की चाभी चाहिए तो वह पहले इस आदमी के कपड़े वापस करे।  अबूक़ीर अपने पड़ोसी की दुकान में छिपा बैठा सबकुछ देखता रहा लेकिन कुछ बोल नहीं सका।  जब उसकी दुकान सील हो गई तो उसने अबूसब्र से कहा कि क्या करूं मेरी तो दुकान बंद कर दी गई।  अबूसब्र ने कहा कि जो कुछ हुआ वह तुम्हारी करनी का फल है।  तुम लोगों के कपड़े ले लेते हो और फिर उन्हें वापस नहीं करते।  इसपर रंगरेज़ ने कहा कि क्या करूं बाज़ार में काम ही नहीं है।  उसने अपने साथी अबूसब्र से कहा कि देखो तुम्हारा काम भी ठीक से चल नहीं रहा है क्यों न हम दोनों किसी दूसरे शहर चलें और वहां अपनी क़िस्मत आज़माएं?

 

 

 

दोनों ने यह तय किया कि हम शहर में जो कुछ भी कमाएंगे उसमें से आधा-आधा ख़र्च करेंगे और जो पैसा बचेगा उसे एक थैली में रखते जाएंगे।  जब वापस हम अपने शहर जाएंगे तो उसे आपस में बराबर से बांट लेंगे ताकि बाक़ी ज़िंदगी आराम से गुज़ार सकें।  वे दोनो चलते-चलते समुद्र के किनारे पहुंचे।  बाद में दोनों एक नाव पर सवार हुए जिसपर 120 लोग थे।  इत्तेफ़ाक़ से उस नाव पर अबूसब्र के अतिरिक्त कोई दूसरा नाई नहीं था।  अबूसब्र ने अपने साथ अबूक़ीर से कहा कि हमकों कुछ समय तक इस नाव पर रहना है।  इस दौरान हमें खाने-पीने की आवश्यकता होगी।  उसने कहा कि मैं नांव में देखूंगा कि अगर किसी को बाल कटवाने हों तों मैं उसके बाल काट दूंगा और जो कुछ मिलेगा उसे मिल बांटकर खा लेंगे।  अबूक़ीर ने कहा कि बात तो ठीक है जाओ तुम अपने काम पर निकलो।

 

 

  यह कहकर वह सो गया और अबूसब्र नाव पर गाहक ढूंढने निकला।  इसी बीच एक मुसाफ़िर ने उससे कहा कि वह उसके बाल काट दे।  बाल कटवाने के बदले में उसने अबूसब्र को एक सिक्का दिया।  अबूसब्र ने कहा कि अगर इस सिक्के के बदले में आप मुझको एक रोटी देते तो वह मेरे लिए अधिक अच्छा होगा।  उस आदमी ने सिक्का वापस ले लिया और उसे एक रोटी और थोड़ा सा पनीर दे दिया।  साथ ही उसने उसे पीने के लिए पानी भी दिया।  अबूसब्र बहुत खुश हुआ और वह अपने साथी अबूक़ीर के पास आया।  देखा कि वह सो रहा है।  उसने अबूक़ीर को उठाया और उससे कहा कि देखो मैं क्या लाया हूं।  अबूक़ीर उठा और उसने उसके साथ रोटी और पनीर खाया।  बाद में फिर सो गया।  अबूसब्र फिर गाहक की तलाश में चला गया और उसे दो अन्य गाहक मिल गए।  उसने उनके बाल काटे और एक से रोटी तथा दूसरे से पनीर लेकर आ गया।  इस तरह से अबूसब्रक को काम मिलता रहा और वह भी ईमानदारी से अपना काम करता रहा।  मुसाफ़िरों में एक मुसाफ़िर मिस्र का भी था जिसका नाम क़ुबतान था।  वह उस राजा के दरबार में काम करता था जिस शहर की ओर यह नाव जा रही थी।  क़ुबतान ने अबूसब्र को बाल काटने के लिए बुलाया।  अबूसब्र ने क़ुबतान के बाल काटना शुरू कर दिये। 

 

 

उसने बाल काटने के दौरान क़ुबतान को पूरी बात बताई कि वह किस तरह से अपने साथी के साथ शहर जा रहा है।  क़ुबतान ने अबूसब्र से कहा कि जबतक तुम नाव पर सवार हो उस समय तक अपने खाने की चिंता न करो।  तुम हर रात अपने साथी के साथ मेरे पास आओ और खाना हमारे साथ खाया करो।

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