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बृहस्पतिवार, 31 मार्च 2016 17:00

एफिल टॅावर का रंग पाकिस्तानी झंडे जैसा क्यों नहीं?

 एफिल टॅावर का रंग पाकिस्तानी झंडे जैसा क्यों नहीं?

यह बड़ा मुश्किल सवाल है और इसका जवाब भी मुश्किल तो नहीं मगर लंबा और दुखदायी ज़रूर है। एक छत पर दो मौसम फारसी की एक कहावत है और किसी की तरफ से दोहरा रवैया अपनाए जाने पर इस्तेमाल की जाती है।

इस कहावत की याद अस्ल में यह खबर पढ़ कर गयी कि पेरिस की नगरपालिका ने इस मांग को मानने से इन्कार कर दिया है कि लाहौर हमले में मारे जाने वालों की याद में एफिल टॅावर का रंग पाकिस्तानी झंडे की तरह कर दिया जाए।

 

 

लाहौर में हालिया आंतकवादी हमले के बाद फ्रांस में बहुत से लोगों ने खासकर फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर पेरिस की नगरपालिका से यह मांग की थी लेकिन मेयर ने इसे मानने से इन्कार कर दिया।

 

यह मांग इस लिए की गयी थी क्योंकि अभी कुछ दिन पहले की ब्रसल्स में होने वाले आतंकवादी हमले के बाद एफिल टॅावर को बेल्जियम के झंडे के रंग में दिखाया गया था। अलबत्ता यह काम लाइटिंग की मदद से किया गया था।

 

लोगों ने सोचा कि लाहौर में भी तो आतंकवादी हमला हुआ है, वहां भी तो इ्न्सान मरे हैं और उनका खून भी तो ब्रसल्स वालों की तरह लाल रंग का था। लेकिन वह यह भूल गये कि लाहौर वालों की चमड़ी, गोरी नहीं थी।

 

पेरिस के मेयर ने कहा कि ब्रसल्स हमला हमारे लिए खास था क्योंकि बेल्जियम से हमारे खास संबंध हैं इस लिए हम ने एफिल टॅावर को बेल्जियम के झंडे की तरह कर दिया।

 

वैसे यह काम पूरे युरोप में किया गया था और युरोपीय देशों ने अपने नगरों की पहचान समझी जाने वाली इमारतों की बेल्जियम के झंडे जैसी लाइटिंग की थी लेकिन लाहौर हमलों पर एेसा नहीं किया।

 

बेल्जियम के हमलों पर दुबई को भी बहुत दुख हुआ था और वहां बुर्जुल खलीफा की प्रसिद्ध इमारत को बेल्जियम के झंडे के रंग में दिखाया गया लेकिन लाहौर हमले के बाद एेसा नहीं हुआ।

 

 

वैसे यह कोई नयी बात नहीं है, युरोप के किसी भी देश में दस लोग मारे जाते हैं हैं तो पूरी दुनिया को बहुत ज़्यादा अफसोस होता है लेकिन तीसरी दुनिया समझे जाने वाले देशों में सौ लोग भी मारे जाते हैं कि उन्हें सिर्फ मीडिया में जगह मिलती है।

 

पेरिस में हमले होते हैं तो दुनिया भर के नेता , प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति दौड़े चले जाते हैं, सड़क पर एक दूसरे का हाथ थाम कर आतंकवाद से लड़ने का संकल्प ज़ाहिर करते हैं और फिर अपने अपने देशों में जाकर इस बात पर विचार करते हैं कि सीरिया और इराक में लड़ने वालों की मदद कैसे की जाए़?

 

आतंकवाद, आतंकवाद है, इन्सान , इन्सान हैं, किसी भी इन्सान की मौत दुखदायी है पूरब- पश्चिम नहीं होना चाहिए। यह बात जिस दिन दुनिया की समझ में आ गयी, आतंकवाद का सफाया हो जाएगा।

 

सांप को दूध पिला कर पड़ोसी के घर में छोड़ने वाले को यह नहीं समझना चाहिए कि वह उसके घर में नहीं आएगा। यही कुछ हाल युरोप का हुआ है, सीरिया और इराक की सरकारों से नाराज़ थे इस लिए वहां आतंकवादी भेजे लड़ने के लिए और उन्हें स्वतंत्रता प्रेमी का खिताब दिया, उनके समर्थन में सम्मेलन किये, धन व प्रशिक्षण देने की वकालत की और यह सब कुछ किया भी और जब वह अपने- अपने देश वापस लौटे तो आतंकवादी हो गये।

 

अगर कोई चरमपंथी, सीरिया या इराक़ में बम धमाका करता है या पुलिस और सरकारी संस्थानों पर हमले करता है तो वह इन पश्चिमी देशों की नज़र में स्वतंत्रता प्रेमी और सरकार के अत्याचार व अन्याय से तंग आया हुआ होता है जिसे पश्चिम के आशीर्वाद की ज़रूरत होती है लेकिन अगर वही व्यक्ति किसी पश्चिमी देश में यही काम कर देता है तो आतंकवादी हो जाता है और वह भी बहुत खतरनाक आतंकवादी और अमरीका व पश्चिमी देशों को यह लगता है कि इस आतंकवाद से निपटने के लिए पूरी दुनिया को उनका साथ देना चाहिए।

 

अब आप खुद ही बताएं क्या एेसे खत्म होगा आतंकवाद?

 

 

(क़मर शहज़ाद , लेखक के निजी विचार हैं। )

 

 

 

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