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मंगलवार, 09 फ़रवरी 2016 17:50

तो क्या सचमुच सऊदी अरब सीरिया पर हमला कर देगा?

तो क्या सचमुच सऊदी अरब सीरिया पर हमला कर देगा?

 

सीरिया का संकट एक ऐसी गुत्थी बन चुका है जिसे सुलझाते- सुलझाते कई देश एक दूसरे से ही उलझ गये हैं।

 

 

सीरिया में वर्ष 2011 में कुछ नगरों में सरकार की नीतियों के विरुद्ध प्रदर्शन क्या हुए, उस की घात में बैठे देशों को मौक़ा मिल गया और कुछ ही दिनों में विरोध प्रदर्शन करने वाले पीछे रह गये और उनकी जगह ले ली आधूनिक हथियारों से लैस लड़ाकों ने। भांति भांति के नाम से कई सशस्त्र गुट बने और बश्शार असद की सरकार के खिलाफ "सशस्त्र आंदोलन" आरंभ हो गया।

 

 

फिर सऊदी अरब और क़तर जैसे देश बड़े- बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सीरिया में " प्रजातंत्र " की स्थापना के लिए इन सशस्त्र गुटों को हथियार सहित हर प्रकार की सहायता देने की वकालत करने लगे अलबत्ता वह पहले से ही यह कर चुके थे किंतु उसे कानूनी बनाना चाह रहे थे।

 

 

अमरीका सहित पश्चिम की कुछ बड़ी शक्तियों को सीरिया में "प्रजातंत्र" स्थापित करने के लिए सऊदी अरब और क़तर की कोशिशों में शायद " सच्चाई" दिखायी दी वर्ना वह खुल कर ऐसे सशस्त्र गुटों को हथियार व मदद देने की इजाज़त क्यों देते जिन्हें बहुत से देश आतंकवादी कहते हैं?  यह और बात है कि अमरीका और पश्चिमी देशों ने इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा कि  सीरिया में  "प्रजातंत्र " के लिए कोशिश करने वाले सऊदी अरब और क़तर में खुद पुश्तैनी राजशाही व्यवस्था है।

 

 

 

बहरहाल सीरिया में कई देशों ने सशस्त्र गुटों को हथियार व मदद दी वह ताक़तवर हुए तो कुछ देशों और गुटों ने सीरिया सरकार की मदद आरंभ कर दी और इस तरह से सीरिया में  " मिनी वर्ल्ड वॉर "  आरंभ हो गयी और इस  नाजायज़ जंग की कोख से अत्याधिक भयानक आतंकवादी संगठन आईएसआईएस या दाइश ने जन्म लिया, अमरीका ने इस संपोले को कुचलने के लिए विश्व भर के देशों के साथ मिल कर संयुक्त सेना बनायी और सीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ  " हमले "  शुरु कर दिये किंतु उनके हमलों के बाद भी यह संपोला, अजगर बन गया और सीरिया के अधिकांश क्षेत्रों को निगल गया।

 

 

 

अब तक रूस अखाड़े से बाहर रह कर सीरियाई सरकार का साथ दे रहा था मगर फिर वह भी ताल ठोंक कर अखाड़े में कूद पड़ा तो " अजगर "  को चढ़ावा देने वालों के होश उड़ गये। अमरीका और उसके दोस्तों को सीरिया में  रूस के हमलों में  " नागरिकों "  के मारे जाने की चिंता होने लगी और सऊदी अरब और तुर्की सहित कई देश रूस के हमलों को रोकने का प्रयास करने लगे। इसके लिए सऊदी अरब के भावी नरेश और सऊदी अरब के शक्तिमान रक्षा मंत्री मुहम्म्द बिन सलमान कई दूतों को भेजने के बाद खुद पुतीन से मिलने गये और बड़े बड़े  " आफर " दिये जिसे पुतीन ने रद्द कर दिये।

 

 

 

रूस के  हवाई हमले जारी रहे और ज़मीन पर सीरिया के  " दोस्त " इस अजगर का फन कुचलने के लिए आगे बढ़ते रहे और एक-एक क्षेत्र उसके हलक में हाथ डालकर निकालने लगे, सीरिया कई अधिकांश क्षेत्र दाइश से आज़ाद हो गये और आतंकवादी सरगनाओं को सिर छुपाने की जगह ढूंढते- ढूंढते लीबिया तक जाना पड़ा, अजगर फिर संपोला बन गया तो सऊदी अरब को न जाने क्या हुआ कि वह भी दाइश से लड़ने के लिए मचलने लगा और एलान किया कि वह अपन सैनिक सीरिया भेजेगा।

 

 

 

सऊदी अरब की सेना के प्रवक्ता जनरल अहमद अलउसैरी ने  पिछले गुरुवार को जब यह कहा कि अमरीका के नेतृत्व के दाइश के खिलाफ बनने वाले गठजोड़ की सहमति की दशा में सऊदी अरब अपने सैनिक सीरिया भेजेगा तो रूस ने इसे एलाने जंग कहा, ईरानी सैन्य कमांडर ने कहा कि सऊदी अरब में इतनी हिम्मत ही नहीं जबकि सीरिया के विदेशमंत्री ने कहा कि सऊदी अरब के सैनिक अपने पैरों पर आएंगे मगर लकड़ी के ताबूत में वापस जाएंगे।

 

 

 

 तो क्या सऊदी अरब सचमुच अपने सैनिक सीरिया भेज देगा? और अगर भेज दिया तो क्या होगा?

 

 

कहा जा रहा है कि सऊदी अरब अपने कुछ मित्र देशों की मदद से डेढ़ लाख सैनिक सीरिया भेजने की तैयारी कर रहा है और यह सैनिक, तुर्की की सीमा से सीरिया में घुसेंगे।

 

 

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान ने अपने देश की सीमाएं और हवाई अड्डे कभी सीरिया जाकर लड़ने वाले दाइश के आतंकवादियों के लिए खोले थे और अब वह दाइश के इन्ही आंतकवादियों से लड़ने के लिए  सऊदी सैनिकों के लिए तुर्की की सीमाएं खोलने वाले हैं।

 

 

       सीरिया में सैनिक भेजने की यह योजना अस्ल में गत सितम्बर को अमरीकी सेनेटर लिंडे ग्राहम की उस घोषणा का व्यवहारिक रूप है जिसमें उन्होंने कहा था कि दाइश से लड़ने के लिए एक लाख सैनिक सीरिया भेजे जांएगे जिनमें से 90 हज़ार अरब देशों के सैनिक होंगे।

 

 

 

लंदन से प्रकाशित होने वाले अरब समाचार पत्र रायुलयौम के मुख्य संपादक और प्रसिद्ध अरब समीक्षक अब्दुलबारी अतवान ने अपने एक लेख में कहा है कि हमें यह नहीं मालूम कि सऊदी अरब ने किस वजह से एक साथ दो- दो युद्धों में हिस्सा लेने का फैसला किया है, एक यमन में जिसे एक साल होने को आया है और दूसरा अब सीरिया में।

 

 

      यमन में तो सफलता मिली नहीं लेकिन सीरिया में सेना भेजने पर सऊदी अरब तैयार है, अब्दुल बारी का कहना है कि हमें यह नहीं पता कि अचानक सऊदी अरब में इतना शौर्य और युद्ध प्रेम कहां से पैदा हो गया क्योंकि गत साठ वर्षों में इस्राईल के खिलाफ तो हमें उसमें इस प्रकार का साहस नहीं दिखायी दिया!

 

 

 

      सऊदी अरब यमन में एक हूसी नामक एक गुट से नहीं जीत पाया, इस गुट के पास न तो युद्धक विमान हैं, न पर्याप्त हथियार और न ही युद्धक विमानों को मार गिराने वाला कोई हथियार फिर भी ग्यारह महीने गुज़रने के बाद भी सऊदी अरब एक सफलता के लिए तरस रहा है तो फिर सीरिया में उसका क्या हाल होगा? जहां रूस अपनी पूरी शक्ति से मौजूद है, जहां की सेना पिछले पांच वर्षों में आतंकवादियों से मुक़ाबल की आग में तप कर कुंदन हो चुकी है और जहां सीरिया के कुछ "खास मित्र" उसके लिए जान हथेली पर रख कर लड़ रहे हैं।

 

 

 

एक और बात यह भी है कि सऊदी अरब अपने सैनिकों को दाइश से लड़ने के लिए सीरिया भेज रहा है और सऊदी सेनिक औ दाइश के आतंकवादी दोनों की वह्हाबी विचार धारा रखते हैं  और दाइश में सऊदी अरब के नागरिकों की बड़ी संख्या मौजूद है तो अगर यह सरकारी सैनिक भी दाइश से जाकर जुड़ने लगे तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेगा?

 

 

 

अमरीका के प्रसिद्ध पत्रकार थामस फ्रेडमैन ने दो महीने पहले सऊदी अरब की यात्रा की थी इस दौरान वह सऊदी नरेश, उनके उत्तराधिकारी, सऊदी रक्षा मंत्री सहित बड़े बड़े लोगों से मिल। रियाज़ से लौटने के बाद उन्होंने न्यूयार्क टाइम्ज़ को अपने एक इंटरव्यू में कहा कि सऊदी अरब के नेताओं की सब से बड़ी चिंता यह है कि दाइश कहीं इस्राईल पर हमला न कर दें क्योंकि अगर वह हमला कर देता है तो वह जो सुन्नी गठजोड़ का सपना देख रहे हैं वह बिखर जाएगा। वह कहते हैं कि उनकी पूरी यात्रा में किसी भी सऊदी नेता ने अरब- इस्राईल संघर्ष की बात नहीं की यहां तक कि एक बार भी नहीं !

बाकी बातें जाने दें आप लोग खुद ही  समझदार हैं! (क़मर अब्बास आले हसन)

(यह लेखक के निजी विचार हैं। )

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