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सोमवार, 04 जनवरी 2016 20:25

ईरान व सऊदी अरब, दो नदियां, एक सागर पर संगम कहां?

ईरान व सऊदी अरब, दो नदियां, एक सागर पर संगम कहां?

 

 विभिन्न प्रकार की समानताओं के बावजूद ईरान और सऊदी अरब के बीच दूरी का इतिहास, काफी पुराना है। बहुत से लोग इसकी एक वजह, धर्म को भी मानते हैं, ईरान, शिया बाहुल्य देश है और सऊदी अरब की आधारशिला की वह्हाबी मत पर है और इन दोनों मत एक दूसरे के विपरीत, विचारधारा रखते हैं इस लिए हर क़दम पर उनके हित एक दूसरे से टकराते रहते हैं और हितों के साथ साथ यह यह दोनों देश भी।

 

ईरान में इस्लामी क्रांति से पहले हालांकि धार्मिक सरकार नहीं थी और ईरान की शाही सरकार, सऊदी अरब की ही तरह, पश्चिमी हितों की रक्षक थी लेकिन उस वक्त भी एक ही टीम में खेलने वाले दो खिलाड़ियों की तरह दोनों में प्रतिस्पर्धा कभी कड़ी और कभी हल्की लेकिन जारी रहती थी मगर ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद खींच-तान बढ़ गयी और इसकी एक बड़ी वजह, ईरान की ही तरह, सऊदी अरब में भी राजशाही के खिलाफ आंदोलन से सऊदी शासकों का भय था। यही वजह थी कि ईरानी क्रांति को नाकाम करने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब देशों ने बहुत प्रयास किया और उनके इस प्रयास को पश्चिम का पूरा समर्थन प्राप्त था, यह ईरान और सऊदी अरब के मध्य टकराव की नयी शुरुआत थी।

 

सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब देशों ने इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम की मदद की और सद्दाम ने ईरान पर हमला कर दिया, आठ वर्षों तक यह युद्ध जारी रहा और इस पूरी अवधि में सऊदी अरब अपने अन्य साथियों के साथ सद्दाम के साथ रहा और ईरान से उसके संबंधों में तनाव बढ़ता गया।

 

    इस टकराव में कई पिछले तीन दशकों के दौरान कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन, एक धर्म और एक सभ्यता से संबंध रखने के बावजूद सऊदी अरब हमेशा, ईरान विरोधी खेमे में खड़ा नज़र आया, इसके पीछे, इस्लामी जगत के नेतृत्व की उसकी महत्वकांक्षा में ईरान की ओर से बाधा की आशंका भी एक वजह रही है। अलबत्ता जब सद्दाम ने कुवैत पर हमला किया और सऊदी अरब के शासकों की डर से रातों की नींद उड़ गयी लेकिन ईरान ने सद्दाम का साथ न देने का फैसला किया तो, ईरान से सऊदी अरब और उसके घटक अरब देशों के मध्य बर्फ पिघलती शुरु हो गयी किंतु ईरान के अत्यन्त प्रभावशाली नेता और भूतपूर्व राष्ट्रपति हाशमी रफसन्जानी की सऊदी अरब यात्रा से दोनों देशों में संबंधों की बहाली की नयी उम्मीद जागी और हज के दौरान होने वाले जनसंहार जैसी कई घटनाओं की कटुता कम होने लगी और फिर सऊदी अरब में अब्दुल्लाह बिन अब्दुलअज़ीज़ के सत्ता संभालने के बाद इस प्रक्रिया में तेज़ी का प्रभाव साफ नज़र आने लगा किंतु इराक और सीरिया में दाइश जैसे आतंकवादी गुटों के सिर उभारने और इन देशों में  सऊदी अरब की भूमिका के बाद एक बार फिर ईरान और सऊदी अरब एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आए और यह टकराव, यमन पर सऊदी अरब के हमले से अपने चरम पर पहुंच गया।

 

 

सऊदी अरब में सत्ता बदली नये खून और नये उत्साह किंतु अनुभव की कमी रखने वाले युवा शासकों को सत्ता मिली तो उसे सीरिया और इराक की नामकी अपमान लगी इस लिए उसका बदला लेने के लिए यमन में नया मोर्चा खोला मगर वहां भी विफलता की हाथ लगी। इतनी नाकामियों पर सऊदी अरब के अनुभवहीन युवा शासक अपने घाव चाट ही रहे थे कि अचानक, अमरीका और पश्चिमी देशों से ईरान के कड़वे संबंधों में रस घुलने लगा और फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मामला सुलझने और पश्चिमी देशों से डील पक्की होने जाने की खबर, एटम बम की तरह सऊदी अरब पर गिरी। इस के बाद सऊदी अरब ने इस समझौते को प्रभावहीन करने का व्यापक प्रयास आरंभ किया और "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है" का सही फार्मूला गलत जगह इस्तेमाल करते हुए ईरान के बढ़ते क़दम को रोकने के लिए इस्राईल से भी हाथ मिला लिया किंतु इसका भी कोई खास असर नहीं हुआ। अस्ल में सऊदी शासक यह भूल गये थे कि अगर इस्राईल, ईरान का कुछ बिगाड़ सकता तो वह पश्चिमी देशों के साथ बहुत पहले यह काम कर लेता किंतु यह नहीं हुआ और पश्चिमी देश, ईरान के साथ परमाणु समझौता करने पर मजबूर हो गये।

 

    अब बस कुछ ही दिनों में ईरान पर प्रतिबंध खत्म होने वाले हैं, ईरान की संपत्ति ईरान वापस होने वाली है जो कई सौ अरब डालर है आर्थिक प्रतिबंधों खत्म होने बाद ईरान के नये बाज़ार में कूदने के लिए युरोप व अमरीका की कंपनियां पर तौल रही हैं और इस मिलन को सऊदी शासक दूर खड़े देख रहे हैं। इसी लिए सऊदी अरब में शिया धर्मगुरु को मौत की सज़ा दिये जाने को बहुत से विश्लेषक, ईरान के लिए सऊदी अरब का आखिरी जाल कह रहे हैं।

 

सऊदी अरब के नौसिखिए शासक यह कोशिश कर रहे हैं कि ईरान को किसी तरह से भड़का दिया जाए और काबू से बाहर होकर ईरान वह सब कुछ करे जिससे उसकी सफल विदेश नीतियां प्रभावित हों किंतु ऐसा होना फिलहाल मुश्किल लग रहा है क्योंकि सऊदी अरब ने जो जाल ईरान के लिए बिछाया है, उससे ज़्यादा और मज़बूत जाल, सऊदी शासको के गुरुओं यानी अमरीका व पश्चिमी देश बहुत पहले बिछा कर दशकों इंतेज़ार  करके थक चुके हैं।

 

 

    अलबत्ता सऊदी अरब के शासक इस प्रकार से क्षेत्र में शिया सुन्नी युद्ध की भी कोशिश कर रहे हैं और ईरान और सऊदी अरब के मध्य तनाव को धार्मिक रंग देकर, अपने उद्देश्यों की पूर्ति चाह रहे हैं इस लिए ईरान को सऊदी अरब की इस साज़िश को नाकाम बनाने के लिए अपनी सूझबूझ के साथ क़दम बढ़ाना होगा जिसके लिए ईरानी अधिकारी मशहूर हैं और कूटनीति में ईरान की नीतियां का लोहा युरोपीय गलियारों ने भी  माना है और ईरान की सफल, प्रभावशाली व सूक्ष्म कूटनीति का एक ठोस उदाहरण, परमाणु मामले पर होने वाला समझौता है।

 

 

फिलहाल जो हालात हैं उससे तो यही लगता है कि ईरान और सऊदी अरब के मध्य संबंधों में कड़वाहट बढ़ेगी लेकिन यह कड़वाहट कब तक जारी रहेगी इस बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि  यह अनुमान लगाना बहुत मुश्मिल है कि सऊदी अरब का मौजूदा नेतृत्व कब तक आंतरिक कलह से बच कर सत्ता में रह पाएगा।

 क़मर शहज़ाद

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(लेखक के विचारों से रेडियो तेहरान का सहमत होना आवश्यक नहीं।)

Comments   

 
0 #1 Sanju Sanjuraja02@gm 2016-02-09 23:41
Masha Allah aap sab ko mubarak ho
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