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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015 20:52

क्या भारत कट्टरपंथी राष्ट्र बनेगा?

क्या भारत कट्टरपंथी राष्ट्र बनेगा?

 

 

भारत का रष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र है, और सम्राट अशोक ने 2300 साल पहले भारत में सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया था और कहा था कि "वह जो केवल अपने धर्म का सम्मान करता है और दूसरे धर्मों का अनादर करता है, वास्तव में अपनी ही आस्था को क्षति पहुंचा रहा होता है।” मगर अब भारत में आए दिन धार्मिक उन्माद के कारण जघन्य घटनाएं हो रही हैं।

 

जबकि अशोक से भी वर्षों पहले हिन्दुओं की पवित्र पुस्तक वेद में भी धार्मिक सहिष्णुता के बारे में मिलता है, जिसमें लिखा है कि “बुद्धिमान लोग एक ही सच को अलग रास्तों से समझाते हैं।”

 

इसके अतिरिक्त भारत के ऐतिहासिक भक्ती आंदोलन और सूफियों का एक बड़ा उद्देश्य समाज में सहिष्णुता पैदा करना था। भारत में आने वाले मुसलमान सूफियों ने भी अपने व्यवहार से मुसलमान और अन्य धर्मों के लोगों तक शांति और भाईचारे का संदेश पहुंचाया है। इसी के साथ भारत में कुछ ऐसे भी शासक गुज़रे हैं जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए धार्मिक सद्भाव को विकृत किया, विषेशकर वे लोग जो भारत पर हमलावर हुए, जबकि दूसरी तरफ़ ऐसे शासक भी गुज़रे हैं जो सहिष्णुता का उदाहरण बने।

 

लेकिन आज उसी धरती पर हमें सहिष्णुता धुंधली जबकि चरमपंथ और असहिष्णुता स्पष्ट होती दिखाई देती है, जहां का संविधान भी सेक्यूलर है और जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के लोग अपने विश्वासों के अनुसार जीवन जीने का अधिकार रखते हैं।

 

 

भारत की स्वतंत्रता से लेकर अब तक हिंदू कट्टरपंथियों की ओर से दंगे, भय और असहिष्णुता के लंबे अध्याय इतिहास की पुस्तक में हैं, जिनसे भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान को गंभीर क्षति पहुंची है।

 

कभी दलितों की बस्तियों को जलाना हो या कभी सिखों के पूजा स्थलों पर सशस्त्र हमला करना हो, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के ख़िलाफ़ क्रूर दंगे हों या कभी मौजूदा भारतीय प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में हिंदू-मुस्लिम दंगे हों, भारत के कट्टरपंथी हिन्दुओं का सैदव यह प्रयास रहा है कि देश में हिंदू धर्म के मानने वालों के अलावा हर धर्म के मानने वालों पर जीवन तंग कर दिया जाए।

 

गांधी जी की हत्या को भी एक वर्ग धार्मिक कट्टरपंथ का परिणाम समझता है, जिसके कारण भारत को अपना राष्ट्रपिता खोना पड़ा। कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी धर्मनिरपेक्षता को महत्व देती है और शायद इसी लिए वह अल्पसंख्यकों का विश्वास हासिल करने में सफल रही है जबकि भारतीय जनता पार्टी इससे बिल्कुल अलग है।

 

यहां पर हिंदू कट्टरपंथ का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक समझूंगा क्योंकि भारत में हिन्दू बहुमत में हैं, क्योंकि हिन्दू कट्टरपंथी भारत में धार्मिक सहिष्णुता का संतुलन बिगाड़ रहे हैं, जो न केवल भारत को नुक़सान पहुंचा रहा है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है और इसी तरह पड़ोसी देश पाकिस्तान को भी देखें तो वहां भी कुछ चरमपंथी धर्म का ढोंग करके कट्टरवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

 

 

हिन्दू कट्टरपंथ का अस्तित्व भारत के विभाजन से पहले भी था। यह विचारधारा एक धार्मिक कट्टरपंथी विचारधारा है जिसने हिन्दू राष्ट्रवाद को बल दिया। 1923 में विनायनक दामोदर सूर्यकार ने सबसे पहले हिंदुत्व शब्द अपनी एक पुस्तिका "हिंदुत्व: एक हिंदू कौन है?" में प्रयोग किया था और बाद में इस सिद्धांत को 1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनाया जिससे इस शब्द को राजनीतिक दिशा मिली।

 

 

भारत में आज सत्ताधारी दल भाजपा 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में अस्तित्व में आया था। इस पार्टी का गठन भारतीय जनसंघ से हुआ जो 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक की राजनीतिक शाखा थी। भाजपा ने अपने पहले कार्यकाल में हिंदुत्व की विचारधारा को मज़बूत किया और अल्पसंख्यकों के संयोजन से जुड़ी संस्कृति को एक जगह रख दिया गया जिसका प्रदर्शन भारत की मौजूदा भाजपा सरकार ने एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर परेड में किया जिसे भारतीय मीडिया के प्रतिनिधियों ने भी महसूस किया।

 

 

लेकिन चूंकि भारत अब डिजिटल हो रहा है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी कहा जाता है, इसलिए पूरे क्षेत्र पर उसका एक महत्व है। मगर आज जिस पार्टी को भारत वासियों ने मौक़ा दिया है, उसके कपड़े एक विशिष्ट शैली की सोच रखने वाले वर्ग से हैं, ऐसा न हो कि सेक्यूलर भारत कम्यूनल भारत बन जाए।

 

 

साथ ही हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत वास्तव में एक सेक्यूलर देश है क्योंकि यहां हिन्दू बहुमत में हैं और देश के अधिकतर हिन्दू सभी धर्मों के मानने वालों को समान अधिकार दिए जाने के समर्थक और हर तरह के चरमपंथ और कट्टरवाद के विरोधी हैं। भारतीयों ने गुजरात के औद्योगिक विकास से प्रभावित होकर मोदी को प्रधानमंत्री पद का पर बिठाया है, न कि गुजरात के हिंदू मुस्लिम दंगों में उनके कारनामे को देखकर। लेकिन अब लगता है कि भाजपा सरकार इतनी बड़ी संख्या को एक तरफ़ रख कर छोटी संख्या के हिन्दू चरमपंथियों को शक्तिशाली बनाना और भारत को एक कट्टरवादी राष्ट्र में बदलना चाहती है।

 

 

भारत के प्रधानमंत्री को चाहिए कि क्षेत्र में शांति के लिए सभी प्रकार के आतंकवाद के साथ-साथ भारत में बढ़ रहे हिंदू कट्टरपंथ के विरुद्ध भी ठोस क़दम उठाएं। राज्य स्तर पर चरमपंथ को बढ़ावा देकर वे वर्तमान में अपनी सरकार को मज़बूत तो कर लेंगे और अपने समर्थकों और विरोधियों दोनों में अपनी धाक भी बिठा लेंगे, लेकिन आने वाले समय में हिंदू चरमपंथ का यह दानव भारतीय समाज की नसों में ऐसा फैल जाएगा कि उससे निपटना किसी के बस की बात नहीं रहेगी। (RZ)

रविश ज़ैदी

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Comments   

 
0 #1 रणधीर सिंह सुमन 2015-11-21 22:12
हिंदू कट्टरपंथ के विरुद्ध भी ठोस क़दम उठाएं। नही हिन्दू धरम है और हिन्दुवत नागपुरी आतंकी विचारधारा है इसलिए हिन्दू की बजाय हिन्दुवत कट्टर पंथ लिखे
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