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शुक्रवार, 25 सितम्बर 2015 20:19

सऊदी गठबंधन, यमन के बजाए मस्जिदुल अक़्सा को क्यों नहीं बचाता?

सऊदी गठबंधन, यमन के बजाए मस्जिदुल अक़्सा को क्यों नहीं बचाता?

सऊदी अरब, कई महीनों से यमन पर हमले कर रहा है जिसमें अब तक कई हज़ार लोग मारे जा चुके हैं। सऊदी अरब इसे आज़ादी की लड़ाई कहता है और इस युद्ध में यमनी सेना के हाथों मारे जाने वाले अपने सैनिकों को शहीद कहता है किंतु हालिया दिनों में बैतुलमुक़द्दस में मुसलमानों के लिए अत्याधिक पवित्र स्थल, मस्जिदुल अक़्सा पर इस्राईली सैनिकों और यहूदी चरमपंथियों के आक्रमणों पर उसने कोई व्यवहारिक क़दम नहीं उठाया।

 

लदंन से प्रकाशित समाचार पत्र रायुलयौम ने अपने संपादकीय में यह सवाल उठाया है कि सऊदी गठबंधन, यमन के बजाए मस्जिदुल अक़्सा को क्यों नहीं बचाता?

 

अरब जगत के प्रसिद्ध पत्रकार और रायुलयौम के संपादक अब्दुलबारी अतवान लिखते हैं कि यदि हौसियों  ने जिन्हें राफेज़ी और मजूसी कहा जाता है और जिन्हें ईरान से मदद मिल रही है मस्जिदुलअक़सा पर हमला किया होता और वहां मौजूद  फिलिस्तीनियों और  पहरेदारों को मारा- पीटा होता तो  तो शायद हम यह देखते कि अरब देशों  के अमेरिकी कारखानों में बनने वाले अत्याधुनिक लड़ाकू विमान उड़ान भरते और उनके साथ हजारों सैनिक आगे बढ़ते और मुसलमानों के पहले  किबले की मदद की जाती। लेकिन समस्या यह है कि अलअक़सा मस्जिद पर  जिन्होंने हमला किया है वह चरमपंथी यहूदी हैं और वे ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध में अरबों का सामरिक भंडार हैं।

 

 

इसीलिए अरब देशों की प्रतिक्रिया केवल ज़बानी आलोचना तक सीमित है। मस्जिदुलअक़सा पर यहूदियों का हमला कुछ खास नहीं है, इस मस्जिद का उपयोग समय और स्थान के आधार पर विभाजित करने की कोशिशें भी कोई बड़ी बात नहीं है, नमाज़ियों  पर हमले पर भी एक त्वरित प्रतिक्रिया की आवश्कता नहीं है, इस प्रकार की बातें शायद अरब लीग के प्रमुख नबील अल-अरबी कहना चाहते हैं।

 

 

 वे कहते हैं कि आगामी रविवार को न्यूयॉर्क में महासभा के अधिवेशन के अवसर पर अरब देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी जिसमें इस्राईइल की ओर से जारी उल्लंघनों पर चर्चा की जाएगी । नबील अल-अरबी साहब यह बैठक न्यूयॉर्क में क्यों हो रही है?  काहिरा या फिलिस्तीन में क्यों नहीं , अल्जीरिया और मोगादीशो में क्यों नहीं? नबील अल-अरबी का जवाब हो यह सकता है  कि इस समय विदेश मंत्री न्यूयॉर्क जाने की तैयारियों में व्यस्त हैं। तो सवाल यह है कि क्या ये लोग ऊंटनी पर बैठक कर  न्यूयार्क जाने का इरादा रखते हैं?

 

जॉर्डन में पचास सांसदों ने एक बयान जारी कर इस्राईल दूतावास बंद करने की मांग की है और इस्राईल के साथ होने वाले समझौतों पर पुनर्विचार पर जोर दिया है। क्या जॉर्डन के नरेश इस मांग पर ध्यान देंगे और कोई व्यवहारिक कदम उठाएंगे।

 

 

 हम नहीं समझते कि अरबों की ओर से दिए जाने वाले बयानों पर कोई अमल होगा, लेकिन यह खाली बयानबाज़ी इसी तरह तब तक जारी रहेगी जब तक मामला ठंडा नहीं हो जाता या इस्राईल प्रधानमंत्री नेतनयाहू खुद ही इन अरब नेताओं को इस मुश्किल से बचाने का रास्ता न निकाल लें।

 

 

हम यहाँ फिलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास की अनदेखी भी नहीं कर सकते जिनके सुरक्षा बल के अधिकारी केवल फिलीस्तीनी प्रदर्शनकारियों पर गुर्राना जानते हैं और उनमें मस्जिदुल अक़सा के में प्रवेश करके वहां हंगामा मचाने वाले चरमपंथी ज़ायोनियों की दाढ़ी का एक बाल भी उखाड़ने का साहस नहीं है।

 

 

 किसी ने भी अरब लीग के विदेश मंत्रियों की बैठक की मांग नहीं की और न ही ओआईसी के सामने ऐसी कोई मांग रखी गयी है इसलिए हम इन अरब नेताओं से यही कहेंगे कि आप यमन जाइए, सीरिया जाएं या इराक जांए ! अलअक़सा मस्जिद उन फिलिस्तीनियों पर ही छोड़ दीजिए जो उसकी रक्षा कर रहे हैं, लड़ रहे हैं और अपने खून और अपनी जान की कुर्बानी पेश कर रहे हैं। आप अरब नेता उसकी रक्षा के योग्य ही नहीं हैं। (Q.A.)   

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