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सोमवार, 07 सितम्बर 2015 18:09

मैं अरब होने पर शर्मिंदा हूं! अब्दुलबारी अतवान

मैं अरब होने पर शर्मिंदा हूं! अब्दुलबारी अतवान

समुन्द्र में डूब कर मरने वाले तीन साल के सीरियाई बच्चे ईलान कुर्दी का चेहरा हमने नहीं देखा, क्योंकि लगभग सभी संचार माध्यमों ने समुन्द्र के किनारे औंधे मुंह पड़ी उसकी लाश का ही फोटो दिखाया लेकिन उसके साथ ही उसका वह फोटो भी दिखाया गया जिसमें वह जिंदा अपने बड़े भाई के साथ मुस्कराता नज़र आता है। इस पूरे प्रकरण में मेरे लिए सब से आश्चर्य की बात स्वीडेन की विदेशमंत्री के आंसू थे जो अस्ल में हमारी भावनाओं को प्रकट कर रहे थे।

 

 

 

बच्चों की इस तरह के फोटो, पहले भी इतिहास का रुख़ बदल चुके हैं और वर्षों तक लोगों के मन व मस्तिष्क पर छाए रहे और निश्चित रूप से इस तीन वर्षीय बच्चे का चित्र भी ऐसा ही होगा। जैसे सन 1972 अमरीकी बमबारी में डर से निर्वस्त्र भागती हुई 9 वर्षीय वियतनामी लड़की का फोटो,या फिर फिलिस्तीनी बच्चे मुहम्मद अद्दूरा जो सन 2000 में इस्राईली सैनिकों की फायरिंग में उस समय मारा गया था जब उसके पिता, उसे अपनी गोद में लिये, फायरिंग से बचाने का प्रयास कर रहे थे।

 

 

गार्डियन समाचार पत्र में ईलान के चित्र पर अपने विचार लिखते हुए एक ब्रितानी महिला ने कहा है कि मुझे ब्रिटिश होने पर शर्म महसूस होती है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने सीरियाई शरणार्थियों के लिए अपने देश के दरवाज़े बंद कर रखे हैं।

 

 

 

मुझे नहीं मालूम कि हमारे अरब नेताओं की जो इस युद्ध की आग भड़का  रहे हैं , इस तीन साल के बच्चे के शव का फोटो देख कर क्या भावनाएं रही होंगी?

 

 

 क्या स्वीडेन की विदेशमंत्री की तरह उनकी आंखों से भी आंसू निकल पड़े? और क्या उनकी आंखों से कभी आंसू बहते भी हैं?

 

 

 

हमें बड़ा दुख होता है जब हम कुछ अरब विश्लेषकों और विचारकों को यह कहते देखते हैं कि सीरियाई पलायनकर्ताओं की समस्या पर चर्चा के लिए अरब संघ की बैठक बुलायी जानी चाहिए और जब हम अरब संघ के महासचिव नबील अलअरबी की यह बात सुनते हैं कि सीरियाई पलायनकर्ताओं की समस्या, अरब संघ के बस से बाहर की बात है तो हमारा दुख और बढ़ जाता है। सवाल यह है कि इसी अरब संघ ने जब सीरिया की सदस्यता भंग की थी और जब लीबिया में सैन्य हमले का फैसला किया था तो क्यों नहीं सोचा था कि यह फैसले अरब संघ के बस के नहीं हैं?

 

 

 

दुख की बात यह है कि सीरिया ने जब बीस लाख इराकी पलायनकर्ताओं को अपने यहां स्वीकार किया था तो उसने अरब संघ से बैठक की मांग नहीं की थी।

 

 

 

हमारा दुख और बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि अरब जगत और विशेषकर सऊदी अरब, सीरिया के अरब भाइयों के लिए अपने देश के दरवाज़े बंद रखे हैं और उन्हें समुन्द्र की मछलियों और सड़क के कुत्तों के सामने डाल रहे हैं।

 

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सीरिया के लोग बहुत अधिक परिश्रमी होते हैं उनकी मेहनत की एक मिसाल मिस्र के एक नगर में देखने को मिली जहां उन्होंने पहुंचते ही कई होटल खोले, दसियों दुकानें शुरु कीं और नगर को स्वर्ग में बदल दिया तथा बहुत से मिस्री नागरिकों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा किये और यही काम उन्होंने तुर्की, संयुक्त अरब इमारात और जार्डन में भी किया तो फिर अरब देशों के धनी शासक उनसे क्यों मुंह फेर रहे हैं?

 

 

 

पांच अरब देश, अरब पलायनकर्ताओं को समुद्र में, युरोपीय रेलेवे स्टेशनों और जंगलों में भटकने पर विवश कर रहे हैं जब कि यह सारे पलायनकर्ता, पश्चिम की उस साज़िश का शिकार हुए हैं जिसे अरब शासकों ने व्यवहारिक बनाया है।

 

 

 

लीबिया को तबाह करके उसके नागरिकों को ट्यूनेशिया और अल्जीरिया की ओर भागने पर विवश करने वाले कौन लोग हैं?

 

 

इराक पर हमला करके उस पर क़ब्ज़ा करने वाले और इस देश के नागरिकों को बेघर करने वाले कौन लोग हैं?

 

यमन पर हमला करके इस देश को तबाह करने वाले कौन लोग हैं?

 

 

 

 अल्लाह तीन साल के ईलान कुर्दी, उसके भाई और उसकी मां पर कृपा करे और हर उस अरब बच्चे पर दया करे जो देशों की राजनीति की भेंट चढ़ें हैं या चढ़ेंगे।

 

 

 

अल्लाह जानता है अगर मेरे पास इससे अधिक प्रभावी शब्द होता तो मैं उसे प्रयोग करता किंतु फिलहाल यही कहना चाह रहा हूं कि मुझे एक अरब होने पर शर्म आ रही है, बल्कि एक इन्सान होने पर शर्म आ रही है!

 

शर्मिंदा होने के अलावा हम कर भी क्या सकते हैं? (Q.A.)

 

( अब्दुलबारी अतवान, रायुलयौम, लंदन)

 

 

 

 

 

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