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सोमवार, 29 जून 2015 18:15

क्या फिर भारत की अफगान नीति में बदलाव होगा?

क्या फिर भारत की अफगान नीति में बदलाव होगा?

क़मर शहज़ाद

      

अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई के दौर में, भारत-अफगानिस्तान संबंधों का स्वर्णिम दौर था जो अब गुज़र चुका है किंतु  यह वापस भी आ सकता है कम से कम हालिया घटनाओं से तो यही अंदाज़ा होता है।

 

     हामिद करज़ई के युद्ध में भारत और अफगानिस्तान के मध्य संबंधों में जो प्रगाढ़ता आयी थी उसे नये राष्ट्रपति अशरफ गनी में पाकिस्तान को तरजीह देने की नीति रूचि ने पिघला दिया और भारत, अफगानिस्तान से दूर होता प्रतीत होने लगा और यह वही चीज़ थी जिसे इस्लामाबाद की दिली ख्वाहिश और अफगानिस्तान से अहम मांग कहा जाता है।

 

     पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने बहुत पहले कहा था कि अफगानिस्तान से अमरीकी सैनिकों की वापसी के बाद यह देश पाकिस्तान और भारत के मध्य प्राक्सी वार का अखाड़ा बन जाएगा।

 

     फिलहाल भारत, अफगानिस्तान के अखाड़े से दूर होता प्रतीत हो रहा है किंतु अफगानिस्तान  ने चीन के साथ एक बड़े प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर करके एक बार फिर आईएसआईए को नाराज़ कर दिया है क्योंकि सिल्क रोड से संबंधित इस बड़े प्रोजेक्ट से चीन को तो फायदा होगा ही अफगानिस्तान को भी भारी आर्थिक लाभ मिलने वाला है किंतु पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आईएसआई को इस प्रोजेक्ट से कुछ नहीं मिलने वाला है और अफगानिस्तान में काफी अंदर तक घुसी इस संस्था की नाराज़गी के लिए यही काफी है किंतु आईएसआई की यह नाराज़गी अफगानिस्तान में हिंसा व झड़प की नयी लहर के रूप में जल्द ही नज़र आ सकती है।

 

     कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि अभी पिछले दिनों अफगानिस्तान के संसद पर हमला इसी नाराज़गी का परिणाम है। यह भी खबरें आयी हैं कि इस हमले के पीछे आईएसआई के एक अफसर का हाथ है, उसके नाम की भी घोषणा कर दी गयी है।

 

      इन परिस्थतियों में यह भी महसूस हो रहा है कि अशरफ ग़नी का पाकिस्तान से  मोहभंग हो रहा है, वैसे कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अशरफ ग़नी ने पाकिस्तान को एक मौक़ा दिया था जिसे उसने गवां दिया।

 

     इन हालात में अफगानिस्तान में जंग का मैदान दक्षिण के बजाए उत्तर हुआ और वल्ख प्रान्त के प्रमुख तथा उप राष्ट्रपति जनरल दोस्तम के मध्य सुरक्षा के लिए गठजोड़ की खबरें आयीं तो काबुल में भारत के राजदूत बल्ख प्रान्त के प्रमुख से मिलने गये।

 

      यह मुलाकात़ अफगानिस्तान में भारत की “वापसी” के अर्थ में भी हो सकती है।

 

(रेडियो तेहरान का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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