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मंगलवार, 10 मार्च 2015 14:52

देश के लिए जान देने वाले के परिवार को यह कैसी सज़ा

देश के लिए जान देने वाले के परिवार को यह कैसी सज़ा

 

इधर कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें एक व्यक्ति का निर्वस्त्र शव एक टॉवर पर लटका है और वहां पर मौजूद लोग मोबाईल से उसकी वीडियो बना रहे हैं। ख़बर को पढ़ने पर पता चलता है कि यह मामला नागालैंड के दीमापुर का है।

 

जिस व्यक्ति का यह शव है उसका नाम सैय्यद फ़रीद ख़ान है और वह असम के करीमगंज का रहने वाला है उस पर कथित तौर से आरोप था कि उसने किसी लड़की के साथ बलात्कार किया है, दूसरा ‘देशद्रोही’ आरोप यह था कि वह बंग्लादेश का रहने वाला है और गैरकानूनी रूप से भारत में रह रहा है। बंग्लादेशी होने का आरोप नागा काउंसिल का है कि दोनों ही आरोप गंभीर हैं।

 

मगर क्या सच वही है जो दिखाया जा रहा है ? जिसे सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है, शायद नहीं मृतक के भाई के अनुसार तो बिल्कुल भी नहीं। बंग्लादेशी होने का आरोप तो यहीं खारिज हो जाता है कि फ़रीद ख़ान के भाई ईमामुद्दीन खान सेना में थे, और 1999 की करगिल लड़ाई में शहीद हो गए थे।

 

अब सवाल बचता है बलात्कार का क्या फ़रीद ने बलात्कार किया भी था अथवा नहीं ? मैडिकिल रिपोर्ट के अनुसार उस युवती के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं बल्कि उसे फंसाया गया था। अब वह युवती खुद कह रही है कि उसे इस घटना के बाद चुप रहने के लिये रुपयों की पेशकश की गई थी। जिस भीड़ ने फ़रीद को पीट – पीट कर मारा डाला आखिर उसका नेतृत्व कोई तो कर रहा होगा ? किसके इशार पर यह भीड़ यहां इकट्ठा हुई थी ? वे लोग कौन थे जिन्होंने 2000 लोगों की भीड़ को इस हत्या करने के लिये उकसाया ? जिस लड़की ने बलात्कार का आरोप लगाया था डॉक्टरी रिपोर्ट में उसके साथ बलात्कार हुआ ही नहीं फिर पुलिस ने अपनी कस्टडी से एक व्यक्ति को भीड़ के हाथों इतनी आसानी से क्यों सोंप दिया ? जब हजारों की भीड़ एक व्यक्ति को मार रही थी, उसके कपड़े उतारकर उस पर वार कर रही थी और फिर मारकर उसको टॉवर पर टांग रही थी तब पुलिस क्या कर रही थी ?

 

सवाल तो यह भी पैदा होता है कि क्या पुलिस भी इस सारे ‘खेल’ में खामोश रहकर उन हत्यारों का समर्थन कर रही थी जिन्होंने यह साबित होने से पहले ही मार दिया कि उसने बलात्कार किया भी था या नहीं ? ज़्यादा तर इस देश में महिलाओं की तरफ से बलात्कार के फर्ज़ी मामले किसी को फंसाने के लिये दर्ज कराये जाते रहे हैं।

 

फिर अदालत के फैसले का इंतजार क्यों नहीं किया गया ? क्यों क़ानून को ताक पर रखकर पुलिस की मौजूदगी में एक वय्क्ति की हत्या कर दी गई ? यह देश और समाज दोनों के लिये अच्छा संकेत नहीं है। इन सारे सवालो के जवाब तलाशना जरूरी है।

 

उस पर भी तुर्रा यह कि कि वह बंग्लादेशी और अवैध रूप से भारत में रह रहा था। यह कैसा अजीब कुतर्क है ? क्या बंग्लादेशी होना इस बात का प्रमाण होता है कि बंग्लादेशी है तो वह बलात्कारी होगा ? बलात्कार करने और बंग्लादेशी होने के आरोप उस वक्त ख़ारिज हो जाते हैं जब मैडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टी नहीं होती और मृतक फ़ारीद खान का परिवार का संबंध सेना से पाया जाता है।

 

1999 के कारगिल युद्ध में फ़रीद के भाई इमामुद्दीन शहीद हुऐ थे, फ़ारीद के भाई कमाल खान इस वक्त भारतीय सेना की असम रेजिमेंट में हैं। उनके पिता, सैयद हुसैन खान, भारतीय वायु सेना से रिटायर हुए थे और मां अभी उनकी पेंशन ले रही हैं। मगर ऐसी बेहिसी का आलम है कि जिस परिवार ने इस देश के लिये कुर्बानियां दीं उसके ही सदस्य को बंग्लादेशी और बलात्कारी बताकर मार दिया जाता है, और ऊपर से नागा काउंसिल के महासचिव जोएल नागा क़ानून की धज्जियां उड़ाने के बाद यह कहते नजर आते हैं 'असम सरकार की वोट बैंक पॉलिसी से हम गुस्से में हैं। सिर्फ 50 रुपए खर्च कर कोई भी भारत की नागरिकता हासिल कर सकता है और यहां नौकरी भी शुरू कर सकता है।

 

हम खान को अवैध बांग्लादेशी के रूप में ही देखते हैं, भले ही उसके पास डॉक्युमेंट्री प्रूफ क्यों न हों।' यह नज़रिया इस देश को फांसीवाद के रास्ते पर ले जा रहा है। क्या गोगा को इतनी भी जानकारी नहीं कि 50 रुपये खर्च करके नागरिकता प्रमाण पत्र तो बनवाया जा सकता है मगर उस प्रमाण को कैसे मिटाया जायेगा जिसमें फ़रीद का भाई कारगिल का शहीद है ? देश पर जान देने का ऐसा खामियाज़ा शायद ही किसी परिवार ने भुगता हो जैसा फ़रीद खान के परिवार को भुगतना पड़ा है।

 

बेहतर हो कि उस युवति जिसने बलात्कार का फर्ज़ी आरोप लगाया उसके खिलाफ कार्यावाही की जाये उस भीड़ के खिलाफ भी कार्यवाही की जाये जो इस तमाशे को अपने मोबाईल में कैद कर रही थी। किसी भी अपराध की सज़ा कानून तय करता है जनता के बनाए हुए संगठन और उनके लोग नहीं। (रविश ज़ैदी)

(आईआरआईबी का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

 

 

 

Comments   

 
0 #2 shekhawati sikar 2016-03-12 11:25
do inquiry before take any step
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0 #1 चुन्नीलाल कैवर्त 2015-03-12 12:27
इस निंदनीय घटना से सिद्ध हो जाता है कि असम में शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज़ नहीं है और देश फांसीवाद की तरफ जा रहा है l यह घटना कहीं कबीलियाई झगड़े का नतीजा तो नहीं है l
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