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बृहस्पतिवार, 08 जनवरी 2015 19:28

शार्ली एब्डो पर हमला "बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती"

शार्ली एब्डो पर हमला "बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती"

कुछ दिन पहले तुर्की में उसके बाद सऊदी अरब में और अब फ्रांस में होने वाले आतंकवादी हमलों से यह साफ हो गया है कि आतंकवाद, उन देशों में दस्तक दे रहा है जिन्होंने अपने कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस सांप को दूध पिलाया था।

 

 

सीरिया के अधिकारियों और नेताओं ने आरंभ में ही इस सदंर्भ में चेतावनी दी थी और बश्शार असद ने कहा था आज सीरिया में आतंकवाद की आग भड़काने वाले जान लें कि इस आग की लपटें उन्हें भी जला देंगी, तुर्की, सऊदी अरब और अब फ्रासं में , सीरिया की आग की गर्मी महसूस की जा रही है।

 

 

सीरिया के नेताओं ने कहा था कि इन आतंकवादियों की कार्यवाहियां केवल सीरिया तक ही सीमित नहीं रहेगीं और आज हम देख रहे हैं कि तुर्की, सऊदी अरब और अब फ्रांस में  आतंकवाद सिर उभार रहा है।  

 

 

फ्रांस में एक पत्रिका के कार्यालय पर हमला निश्चित रूप से निंदनीय है और किसी भी दशा में किसी मनुष्य की हत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता भले ही उसका अपराध कितना ही भयानक क्यों न हो। सज़ा देने का अधिकार, कानूनी संस्थाओं को है किंतु फिर भी पेरिस में जो हुआ है वह एक साधारण घटना नहीं है।

 

 

इस लिए नहीं कि इस हमले में १२ सफेद चमड़ी वाले मारे गये हैं बल्कि इस लिए कि यह एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है।

 

हालांकि व्यवहारिक रूप से एसा ही समझा जा रहा है। फ्रांस में १२ लोग एक आतंकवादी घटना में मारे गये तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया, हर देश ने आलोचना की, विश्व के न जाने कितने देशों के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों ने फ्रांस को शोक संदेश दिया किंतु यही पश्चिमी देश, जिनमें फ्रांस भी शामिल है, तीसरी दुनिया के किसी भी देश की सरकार बदलने के लिए जब आतंकवादियों को प्रशिक्षण देते हैं, उन्हें हथियार देते हैं और उनकी मदद करते हैं और वह आतंकवादी एक दिन में बारह बारह सौ लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं तो कुछ नहीं होता।

 

 ऐसा क्यों है? इसका जवाब तो शायद ही किसी के पास हो मगर होता ऐसा ही है। सीरिया, इराक और अफगानिस्तान में यही सब कुछ हो रहा है।

 

 

अफगानिस्तान में अमरीकी हमले में दसियों आम नागरिक मर जाते हैं तो पश्चिमी देशों का संगठन नेटो इसे गलती बताता है और अफसोस प्रकट करता है किंतु यदि किसी अफगान सैनिक का दिमाग़ उलट जाता है और वह अंधाधुंध फायरिंग करके एकाध अमरीकी को मार देता है तो पूरी दुनिया में तहलका मच जाता है एसा क्यों है? 

 

 

फिलहाल फ्रांस की बात चल रही है, फ्रांस में शार्ली एब्डो की जिसके कार्यालय पर चरमपंथियों ने आक्रमण करके १२ लोगों की हत्या कर दी।

बहुत से संचार माध्यमों ने बड़े स्पष्ट रूप से यह खबर छापी है कि शार्ली एब्डो के स्तंभकार पैट्रिक पेलू ने  कहा है कि पत्रिका अगले हफ़्ते बुधवार को फिर निकलेगी ताकि बताया जा सके कि ''बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती''

 

पेलू ने कहा, "यह बहुत मुश्किल है. हम सभी दुखी हैं और डरे हुए हैं लेकिन हम इसे इसलिए छापेंगे क्योंकि बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती."

 

वैसे यह फैसला भी अभी होना बाकी है कि बेवकूफी किसने की?

 

शार्ली एब्डो पत्रिका ने बार बार पैगम्बरे इस्लाम का कार्टून छापा और डेढ़ अरब मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया, दुनिया के भर के मुसलमानों ने प्रदर्शन किया, मुस्लिम देशों ने आपत्ति की, कुछ चरमपंथी तत्वों ने धमकियां भी दीं मगर इस पत्रिका ने आग्रह के साथ बार बार यह कार्टून छापे, और यह कह कर कि जितना विरोध होगा उतना छापेंगे क्यों?

 

क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और इस स्वतंत्रता को ज़बरदस्ती छीना नहीं जा सकता।

 

यह पत्रिका उस फ्रांस में छपती है जहां यहूदियों को हिटलर द्वारा मारे जाने पर अध्ययन नहीं किया जा सकता, अगर कोई संदेह भी प्रकट कर दे कि हिटलर ने कितने यहूदियों को मारा था तो वह फ्रांस में दंडनीय अपराध है।

 

इसी फ्रांस में व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध इस पत्रिका ने शायद ही किसी का मज़ाक न उड़ाया हो, अलबत्ता होलोकॉस्ट या यहूदियों को भट्टियों में जलाए जाने की घटना के अलावा। अगर किसी ने शार्ली एब्डो का इस विषय पर कोई कार्टन देखा हो तो कृपा करके मुझे बता दे। वैसे आशा नहीं है कि फ्रांस की कोई पत्रिका चाहे वह शार्ली एब्डो ही क्यों न हो ऐसी बेवकूफ़ी कर सकती है क्योंकि इस पत्रिका के ज़िम्मेदारों को मालूम है कि "बेवकूफ़ी नहीं जीत सकती" (क़मर शहज़ाद)

(आईआरआईबी का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

Comments   

 
0 #1 mariyam 2015-01-10 16:58
thank u
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