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रविवार, 03 अगस्त 2014 18:06

ग़ज़्ज़ा पट्टी में इस्राईली जनसंहार और सऊदी नरेश का नीतिगत भाषण

ग़ज़्ज़ा पट्टी में इस्राईली जनसंहार और सऊदी नरेश का नीतिगत भाषण

सऊदी नरेश शाह अब्दुल्लाह ने कहा कि ग़ज़्ज़ा में जो कुछ हो रहा है वह सामूहिक नरसंहार और मानवता के विरुद्ध युद्ध है। उन्होंने सामूहिक नरसंहार का निशाना बनने वाले फ़िलिस्तीनियों से एकजुटता जताई और कहा कि यह मानवता के विरुद्ध युद्ध है किंतु उन्होंने इस बारे मे एक शब्द भी नहीं कहा कि यह नरसंहार करने वालों का मुक़ाबला किस प्रकार किया जा सकता है और यह कि इस बारे में उनके देश की क्या भूमिका है।

शुक्रवार को दोपहर बाद दिए गए बयान के बाद यह प्रतीक्षा रही कि अरब लीग या अरब रक्षा मंत्रियों अथवा सेना प्रमुखों की आपात बैठक की घोषणा की जाती या कम से कम अरब विदेश मंत्रियों की ही कोई बैठक बुला ली जाती किंतु प्रतीक्षा का कोई परिणाम नहीं निकला। शाह अब्दुल्लाह के बयान में अतिक्रमणकारी इस्राईल तथा उसके हाथों अंजाम पाने वाले सरकारी आतंकवाद का कोई उल्लेख नहीं किया गया। जिन लोगों ने यह बयान लिखा है शायद उन्होंने जान बूझकर इसकी उपेक्षा की है। हालांकि जिस समय यह बयान जारी हुआ और फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने दौड़कर इसका स्वागत किया, उस समय दक्षिणी गज़्ज़ा पट्टी के रफ़ह शहर की आवासीय इमारतों पर इस्राईली बम्बारी जारी थी जिसके नतीजे में 60 से अधिक आम नागरिक मारे गए जिनमें एक तिहाई बच्चे और शिशु थे। उत्तरी ग़ज़्ज़ा पट्टी में तो एक हमले में तीन बच्चे झुलस कर मर गए।

 

अरब सरकारों की ख़ामोशी से बढ़ रहे हैं इस्राईल के हौसले

हत्या, और विध्वंस की जो कार्यवाही इस्राईल पिछले चार हफ़्तों से कर रहा है इसके लिए इस्राईल को हौसला अरब देशों के उस मौन के कारण मिल रहा है जिसकी बात सऊदी नरेश ने की और जिसकी निंदा भी की। उन्होंने कहा कि इस ख़ामोशी का कोई औचित्य नहीं है और यह एसी पीढ़ी के सामने आने का कारण बनेगा जिसका हिंसा के अलावा किसी चीज़ में कोई विश्वास नहीं होगा और जो शांति को ख़ारिज कर देगी तथा सभ्यताओं के बीच बातचीत के बजाए टकराव की बात करेगी। लेकिन सऊदी नरेश ने स्वयं भी तो यह मौन नहीं तोड़ा। उन्होंने इस्राईल को तत्काल बिना शर्त हमले बंद करने के बारे में कोई चेतावनी नहीं दी और न ही तेल केहथियार को प्रयोग करने की धमकी दी जैसा कि उनके भाई शाह फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ ने वर्ष 1973 में किया था।

हमारी तो मनोकामना थी और आज भी है कि सऊदी नरेश काश परिवेष्टन और भुखमरी झेल रहे ग़ज़्ज़ा पर ज़ायोनी शासन के हमलों से होने वाले विध्वंस की व्यापकता को देखते या बम्बारी में क्षत विक्षत हो जाने वाले शिशुओं के शव देखते।

हम यह मानते हैं कि यह बयान जिसमें अरब सरकारों और विश्व समुदाय के मौन की निंदा की गई है चार हफ़्ते की देरी से आया है इस बीच हमने ग़ज़्ज़ा पट्टी में इस्राईल के हाथों होने वाले नरसंहार के बारे में इस्राईल का कोई औपचारिक बयान न देखा और न सुना सिवाए सऊदी अरब के पूर्व इंटेलीजेन्स प्रमुख तुर्की अलफ़ैसल के उस बयान के जिसमें उन्होंने फ़िलिस्तीन के प्रतिरोधक संगठनों की ही निंदा की।

 

ग़ज़्ज़ा संकट अरबों के माथे का कलंक

ग़ज़्ज़ा में जो कुछ हो रहा है  वह अरब दुनिया के माथे पर कलंक का टीका है जिसने इस मामले की ओर से मुंह फेर लिया है बल्कि कुछ अरब सरकारों ने तो इस्राईल से ही सांठगांठ तक कर ली है। यदि कुछ अरब सरकारों ने इस्राईल और उसकी सेना पर नाराज़गी दिखाई है तो इस कारण दिखाई है कि वह अपनी कार्यवाही को इतना लंबा क्यों खींच रहा है क्यों नहीं फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध अपने अभियान को जल्दी समाप्त कर रहा है।

 

अरबों से तो अच्छी हैं लैटिन अमेरिकी सरकारें

लैटिन अमेरिका के देशों ने जो ग़ज़्ज़ा से दसियों हज़ार किलोमीटर की दूरी पर बसे हैं और ईसाई धर्म के मानने वाले हैं इस्राईल में अपने दूतावास बंद कर दिए हैं और ज़ायोनी राजदूतों को अपने यहां से बाहर निकाल दिया है तथा घायल फ़िलिस्तीनी बच्चों की मेज़बानी और इलाज कर रहे हैं। हमने एक भी अरब नेता से इस प्रकार का कोई बयान नहीं सुना और न ही किसी अरब देश ने ग़ज़्ज़ा के घायलों को उपचार के लिए अपने यहां लाने हेतु कोई व्यवस्था की बल्कि इसके विपरीत उन्होंने मिस्र को उकसाया कि जहां तक हो सके सीमाओं का कड़ाई के साथ बंद रखे।

ग़ज़्ज़ा पट्टी के पास अपने प्रतिरोधक संगठन हैं और अपने जियाले योद्धा हैं जो ग़ज़्ज़ा की रक्षा करेंगे और यह क्षेत्र कदापि घुटने नहीं टेकेगा।

(यह अरबी समाचार पत्र अर्रायुलयौम में प्रसिद्ध अरब विश्लेषक अब्दुलबारी अतवान के आलेख का हिन्दी अनुवाद है। लेखक की राय से रेडियो तेहरान का सहमत होना आवश्यक नहीं है। )

समाचार पत्र  अर्रायुलयौम में छपे आलेख का लिंकः http://www.raialyoum.com/?p=130356

   

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