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शनिवार, 16 जनवरी 2016 12:14

क्षेत्र व दुनिया में चरपमंथ की जड़ों को राजनैतिक दृष्टि

क्षेत्र व दुनिया में चरपमंथ की जड़ों को राजनैतिक दृष्टि

इस्लामी क्रांति के वरिष्ट नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई के पश्चिम की युवा नस्ल के नाम पत्र में, दुनिया की वर्तमान संवेदनशील स्थिति के संबंध में एक समीक्षात्मक दृष्टि प्रस्तुत की है और इस संवेदनशील स्थिति का वर्णन भी है। यह पत्र क्षेत्र व दुनिया में चरपमंथ की जड़ों को राजनैतिक दृष्टि के अतिरिक्त, विभिन्न आयामों से पहचनवाता है। साथ ही यह पत्र सामाजिक व सांस्कृतिक मामलों को समझने का मार्ग समतल करता हैं जिससे ऐसी वास्तविकताओं की पहचान होती है जो वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होती हैं।

 

 

एक साल पहले वरिष्ठ नेता आयुल्लाहिल उज़्मा का यूरोपीय व अमरीकी युवा पीढ़ी के नाम पहला पत्र प्रकाशित हुआ था। यह ख़त उन्होंने फ़्रांस में शार्ली एब्दो मैग्ज़ीन के कार्यालय पर हुए आतंकवादी हमले के बाद लिखा था जिसमें वरिष्ठ नेता ने युवा पीढ़ी से सही इस्लाम को समझने पर बल दिया था और साथ ही मुसलमानों के संबंध में पश्चिम के दृष्टिकोण का उल्लेख किया था। वरिष्ठ नेता का दूसरा पत्र भी इसी विषय वस्तु पर आधारित है जिसमें दूसरे आयामों का उल्लेख किया है। इस पत्र में भी वरिष्ठ नेता ने पेरिस की हालिया दुखद आतंकवादी घटना का उल्लेख किया है। इसलिए वरिष्ठ नेता के पत्र को पढ़ते समय उन सभी तत्वों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिनका उल्लेख इसमें किया गया है। इसी प्रकार इस पत्र के परिप्रेक्ष्य में पश्चिम में पिछले कुछ बातों की घटनाओं को देखना चाहिए। पश्चिम का, दाइश जैसे आतंकवादी गुटों से निपटने के नाम पर, दिखावटी नारों के साथ सैन्य हथकंडे का प्रयोग करना, वह आयाम है जिसका इस ख़त में उल्लेख है।

अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और सीरिया के युद्धों में सैन्य हथकंडे की अनुपयोगिता ने यह दर्शा दिया कि युद्ध द्वारा ज़रूरी नहीं है कि पश्चिम अपने लक्ष्य तक पहुंच जाए बल्कि इसके विपरीत अगर सैन्य क्षमता का दुरुपयोग हुआ तो इससे सामूहिक सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है और इसके नतीजे में अलक़ाएदा और दाइश जैसी विचारधाराओं को पनपने का अवसर मिलता है। आज इन्हीं विचारधाराओं ने पश्चिम के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।

 

 

पश्चिम के आतंकवाद से मुक़ाबले के दावे में कोई सच्चाई नहीं है क्योंकि अमरीका और पश्चिम का अलक़ाएदा, दाइश और इन जैसे आतंकवादी गुटों को अस्तित्व प्रदान करने में मुख्य भूमिका रहा है और इन गुटों का पश्चिम ने अपने अवैध हितों को साधने के लिए समर्थन भी किया है। पश्चिमी जगत में, जो हिंसा व चरमपंथ के विरूद्ध लड़ाई का दावा किया जाता है, अशांति की जड़ों पर ध्यान नहीं दिया जाता, यही कारण है कि वहां हमेशा हिंसक व चरमपंथी विचार पनपते और उसके प्रभाव सामने आते हैं। पश्चिम सबसे पहले मुसलमानों पर चरमपंथ का आरोप मढ़ता है हलांकि आतंकवाद का न तो मुसलमानों से और न ही किसी धर्म विशेष से संबंध है।

पश्चिम में राजनैतिक व्यवहार व बयान में मुसलमानों पर चरमपंथी होने के आरोप लगाने की प्रक्रिया, अमरीका के चुनावी मंच पर भी पहुंच गयी है। अमरीका के अगले राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से प्रत्याशी डोनल्ड ट्रम्प का हालिया बयान, पश्चिम में इस्लाम से शत्रुता की संस्कृति को फैलाने का एक उदाहरण है। ट्रम्प का दावा है कि सारे मुसलमान अमरीका को नुक़सान पहुंचाना चाहते हैं इसलिए उन्हें अमरीका न आने दिया जाए। इसके साथ ही अमरीकी कॉन्ग्रेस ने भी एक बिल के ज़रिए बग़ैर वीज़े के अमरीका जाने वाले कुछ देशों के नागरिकों के प्रवेश की प्रक्रिया को बदलने की कोशिश की है। इस बिल के क़ानून का रूप धारण करने के बाद पिछले पांच वर्षों के दौरान जिस व्यक्ति ने ईरान, इराक़, सीरिया और सूडान की यात्रा की होगी, वे बग़ैर वीज़े के अमरीका में दाख़िल नहीं हो सकेंगे।

 

 

इस बात के दस्तावेज़ मौजूद हैं जिनसे अलक़ाएदा और दाइश जैसी विचारधाराओं के अस्तित्व में आने और क्षेत्र को बांटने की योजनाओं के लक्ष्य का पता चलता है। ये लक्ष्य क्रान्तिकारी आंदोलनों में फूट डालना और सही इस्लाम की छवि को ख़राब करना है। यह विनाशकारी प्रक्रिया पश्चिम और ज़ायोनी शासन के हस्तक्षेप तथा पैसों, हथियारों और तकफ़ीरी विचारधारा से जुड़े संगठनों के साथ अपनी पूरी क्षमता से सक्रिय है।

इसलिए वरिष्ठ नेता ने अपने पत्र में विरोधाभासों और इन विचारधाराओं की जड़ों की ओर संकेत किया है। इस ख़त में अंतर्राष्ट्रीय हालात के संबंध में पश्चिम के राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मानकों के रूप में जिन सूक्ष्म बिन्दुओं पर बल दिया गया है, उस पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है।

इस संदर्भ में एक विरोधाभास, ज़ायोनी शासन के अपराधों पर पश्चिम का मौन है। ज़ायोनी शासन और अमरीका एक सुनियोजित षड्यंत्र द्वारा, चरमपंथ का समर्थन व प्रचार कर रहे हैं ताकि इस तरह इस्लामी देशों की क्षमताओं को कमज़ोर करें। इसी प्रकार वे संकटों को इस प्रकार दिशा निर्देशित करना चाहते हैं कि क्षेत्र में प्रतिरोध के मोर्चे को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचे।

 

 

यह वह ख़तरा है जिसके सभी आयामों को इस्लामी जगत को पहचानना चाहिए। इसी प्रकार इस्लामी जगत को यह समझना चाहिए कि जो भी हिंसा व आतंकवाद का समर्थन कर रहा है, वह इस्लाम के दुश्मनों के राजनैतिक हित के लिए काम कर रहा है। इस षड्यंत्र के तीन लक्ष्य हैं। पहला लक्ष्य क्षेत्र में संकट पैदा करना है जो सीरिया में सुधार और राजनैतिक मांगों का समर्थन करने के बहाने, गृह युद्ध छेड़ कर शुरु हुआ। इस षड्यंत्र का दूसरा लक्ष्य मध्यपूर्व को बांटना है कि जिसके लिए वर्षों पहले अमरीका वृहत्तर मध्यपूर्व योजना के परिप्रेक्ष्य में कोशिश कर रहा है। तीसरा लक्ष्य इस्राईल से मिली सीरिया की सीमा को छोटा करना है कि जिसके लिए सीरिया में प्रतिरोध को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है। वास्तव में अमरीका के लिए आतंकवाद के ख़िलाफ़ गठजोड़ की आड़ में जो चीज़ महत्व रखती है वह दाइश से लड़ना नहीं बल्कि इस्राईल की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाना है जिसके लिए सीरिया, लेबनान और फ़िलिस्तीन में प्रतिरोध की कड़ी को कमज़ोर करने की कोशिश हो रही है।  

 

             

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि इस्लामी जागरुकता के बाद क्षेत्र की दशा और इस जागरुकता के परिणाम में क्षेत्र में पश्चिम पर निर्भर शासनों के पतन के बारे में अमरीका और विश्व ज़ायोनीवाद की चिंता का, इन विचारधाराओं व प्रक्रियाओं से संबंध का इंकार नहीं किया जा सकता। इस बीच मौजूदा हालात को भड़काने वाला एक तत्व उन विचारधाराओं व प्रक्रियाओं के बारे में अनभिज्ञता है जिसने अनजाने में या इस्लामी जगत में फूट डालने वाले षड्यंत्र को लागू करने की भुजा के रूप में शीया-सुन्नी सहित मुसलमानों को एक दूसरे के मुक़ाबिल में खड़ा कर दिया है। इस विनाशकारी प्रक्रिया को, जो ऊपर से धार्मिक नज़र आने वाले गुटों व संगठनों के रूप में मौजूद है, सलफ़ियों व तकफ़ीरियों की ओर से मज़बूत किया जा रहा है। अब यह प्रक्रिया व्यवहारिक रूप से इस्लामी जगत का विनाश करने वाला हथकंडा बन चुकी है।

इन वर्षों के दौरान धरती पर बहुत से निर्दोष फ़िलिस्तीनी बच्चों व महिलाओं का ख़ून बहाया गया और अपराधी ज़ायोनीवाद ने ग़ज़्ज़ा को बुरी तरह बर्बाद किया है किन्तु हिंसा व चरमपंथ से लड़ने का दावा करने वाले देश, अपने नस्लभेदी व एकपक्षीय क़दम से केवल इस्लाम को नुक़सान पहुंचाने में लगे रहे।

 

 

ऐसे हालात में पश्चिमी जगत विश्व जनमत को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि जो कुछ क्षेत्र और पश्चिम में घट रहा है उसका इस्लाम से संबंध है।

इस्राईल के सरकारी आतंकवाद को अमरीका की ओर से समर्थन और इस्लामी जगत पर हालिया वर्षों में चढ़ाई, पश्चिम के विरोधाभासी व्यवहार का नमूना है कि जिसका वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई के पत्र में उल्लेख हुआ है। वरिष्ठ नेता ने इस संदर्भ में इस्राईल के सरकारी आतंकवाद के समर्थन को पश्चिम की नीतियों में विरोधाभास का एक और उदाहरण बताया। उन्होंने यह सवाल किया कि आख़िर इस अपराधी शासन को उसके प्रभावी घटकों की ओर से फटकारा क्यों नहीं जाता या कम से कम स्वतंत्र व स्वाधीन होने का दिखाना करने वाले अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस्राईल की भर्त्सना क्यों नहीं करते?

 

 

इस संदर्भ में उन भयानक अपराधों व अत्याचारों का उल्लेख किया जा सकता है जिनका ग़ज़्ज़ा के बेगुनाह लोगों को कई साल से सामना है। 7 साल से ज़्यादा समय से इस्राईल ने ग़ज़्ज़ा की पूरी तरह नाकाबंदी कर रखी है और ग़ज़्ज़ा में जगह जगह पर फ़िलिस्तीन के पीड़ित राष्ट्र पर ज़ायोनी शासन के भयानक अपराधों के देखा जा सकता है। ग़ज़्ज़ा में बहुत सी इमारतें ढह चुकी हैं, बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं मलबों में दफ़्न हो गए और संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े के अनुसार, इस्राईल के अपराध की बलि चढ़ने वालों में 20 प्रतिशत बच्चे हैं। मूल संरचनाओं के ध्वस्त होने, पानी और बिजली तक पहुंच और स्वास्थ्य सुविधाओं और खाद्य पदार्थ के अभाव ने ग़ज़्ज़ा के 15 लाख से ज़्यादा लोगों के लिए ज़िन्दगी को बहुत कठिन बना दिया है।

सच्चाई यह है कि पश्चिम ने बीसवीं जीवन में प्रजातंत्र और मानवाधिकार की रक्षा के जिन नारों की आड़ में विश्व व्यवस्था की रूपरेखा तय्यार की थी, उनका प्रभाव तीसरी सहस्त्राब्दी में समाप्त हो गया है और इन नारों का विरोधाभास स्पष्ट हो चुका है। ग्वान्तानामो बे और अबू ग़रेब जेल में भयानक यातनाओं से भरी काली करतूतों और यूरोप में गुप्त जेलों से पर्दा उठने से यह बात साबित होती है कि सभी क्षेत्रों में पश्चिम ने जिन मूल्यों का दावा किया था, उनका खोखलापन एक एक करके सामने आ रहा है।

 

 

इस संदर्भ में इस बात में शक नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की कमज़ोर भूमिका भी ज़िम्मेदार रही है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद या सुरक्षा परिषद सहित ये संगठन व संस्थाएं बहुत से मामलों में पश्चिम की विरोधाभासी नीतियों की सेवा कर रही हैं और हिंसा की जड़ों की अनदेखी करते हुए हिसंक प्रक्रियाओं के फैलने का कारण बन रही हैं।

इस प्रक्रिया में क्षेत्र के देशों के हालात के संबंध में सबसे बड़ा विदेशी खिलाड़ी अमरीका है।

इस बात के बहुत से प्रभाव हैं जिनसे इस बात का पता चलता है कि अलक़ाएदा और दाइश को अस्तित्व प्रदान करने और क्षेत्र को बांटने के षड्यंत्र का लक्ष्य, क्रान्तिकारी आंदोलनों को दिगभ्रमित करना और सही इस्लाम की छवि को ख़राब करना रहा है। यह भी एक सच्चाई है कि इस संकट को जन्म देने में तुर्की, सऊदी अरब और क़तर सहित क्षेत्र के अन्य खिलाड़ियों का बहुत बड़ा रोल रहा है। ये देश इराक़, सीरिया और लेबनान में दाइश का समर्थन करके, क्षेत्र को बांटने के षड्यंत्र में लिप्त हैं।

 

 

इस बीच अमरीका के क्षेत्रीय घटक के रूप में सऊदी अरब ने इस पैदा किए गए संकट को भड़काने के लिए शीया विरोधी तकफ़ीरी विचारधारा को प्रयोग करने की कोशिश की। इस संदर्भ में सऊदी अरब ने अपने और ज़ायोनी शासन के बीच काम बांट लिया है। सऊदी अरब दाइश की पैसों और हथियारों से सहायत कर रहा है और ज़ायोनी शासन उसका वैचारिक दिशा निर्देशन कर रहा है।

इस षड्यंत्र का मुख्य लक्ष्य मध्यपूर्व को फिर से बांटना है जिस पर अमरीका वर्षों से वृहत्तर मध्यपूर्व योजना के तहत काम कर रहा है।

इसलिए वरिष्ठ नेता ने पश्चिम की युवा पीढ़ी के नाम ख़त में, पश्चिम के व्यवहार में मौजूद इन विरोधाभासों का उल्लेख किया और इस युवा पीढ़ी को सच्चाई तथा दुनिया में युद्ध, हिंसा और चरमपंथ की जड़ को समझने के लिए ख़ुद से विचार व शोध करने का निमंत्रण दिया है। 

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