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बुधवार, 06 मई 2015 13:29

तथ्यपरक फिल्में

तथ्यपरक फिल्में

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ईरानी सिनेमा ने अपने समाज से संबंधित विषयों पर ध्यान देने के अतिरिक्त पड़ोसी देशों और मुसलमानों पर भी ध्यान दिया। समाचारिक हल्कों का कहना है कि जहां युद्ध होता है वहां पत्रकारों और अभिनेताओं की भी सामग्री व ख़ुराक होती है। अतः ईरानी अभिनेताओं व फिल्म निर्माताओं ने प्रथम चरण में मानवीय दायित्व, अपनी रुचि और आज के विश्व की परिस्थित के आधार पर इन विषयों पर ध्यान दिया और कुछ ने ध्यान योग्य फिल्में भी बनायीं हैं। अफ़गानिस्तान में युद्ध, ईरान में लंबे समय तक अफगान शरणार्थियों की उपस्थिति उन महत्वपूर्ण विषयों में से है जिसे ईरानी फिल्म निर्माताओं ने ध्यान दिया है और इस संबंध में उन्होंने विभिन्न फिल्में भी बनायीं हैं। तथ्यपरक फिल्मों में जो तस्वीरें दिखायी गयीं हैं वे दुःख व पीड़ा से भरी हुई हैं और यही बातें इस बात का कारण बनीं हैं कि आरंभ में बनने वाली फिल्मों में इसी तरफ ध्यान दिया गया है।

 

 

अफगानिस्तान के संबंध में जो पहली ईरानी फिल्म बनायी गयी है उसका नाम “दिलम बराये पेसरम तंग शुदे अस्त” है। फिल्म की कहानी एक बूढ़े मुजाहिद की है। यह बूढ़ा मुजाहिद पूर्व सोवियत संघ की सेना के विरुद्ध युद्ध में कई बार घायल हो जाता है। वह भूख- प्यास की स्थिति में मरुस्थल पार करता है और काफी समस्याओं व कठिनाइयों का सामना करने के बाद वह ईरान पहुंचता है। ईरान के सीमा सुरक्षा बल उसे देश की सीमा में लाते हैं और हास्पीटल में नर्स के हवाले कर देते हैं। नर्स सफेद वस्त्र पहने होती है और वह घायल और अपने पीड़ित पड़ोसी का उपचार करती है। बूढ़े अफगानी और उपचार करने वाली नर्स के मध्य गहरा आत्मिक संबंध स्थापित हो जाता है। घायल बूढ़ा अफगानी नर्स से अपने देश के बारे में बताता है और उसे यह बताता है कि किस प्रकार रूसियों की वजह से उसकी जिन्दगी बर्बाद हो गयी है। अंततः बूढ़ा अफगान मुजाहिद मर जाता है और उसे ईरान में ही दफ्न कर दिया जाता है परंतु वह अपने जीवन के अंतिम क्षणों में नर्स से कहता है” मेरा दिल बेटे के लिए बहुत परेशान है”

 

इस फिल्म के बाद जो फिल्में बनाई गयी हैं उनमें अधिकांश में फिल्म निर्देशक अत्याचारग्रस्त अफगानी जनता की ओर से वकालत करते हैं और अफगान लोगों को अपना भाई बताते हैं। अलबत्ता कुछ फिल्मों में युद्ध से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की ओर संकेत भी किया गया है। “हैरान” “मन बिन लादेन नीस्तम” “अरूसे अफगान” “जुमा” “तेहरान साअते हफ्त सुब्ह” “रूबाने क़िरमिज़” “आख़ेरीन मलकये ज़मीन” प्रसिद्ध फिल्में हैं जो अफगानिस्तान के बारे में हैं।

 

 

“अरूसे अफगान” फिल्म को अबूल क़ासिम तालेबी ने बनाया है। इस फिल्म की कहानी एक अफगानी जवान के इर्द गिर्द घुमती है जिसका नाम गुल मोहम्मदी होता है। तालेबान के शासन काल में वह विवाह के लिए कुछ धन जुटाने पाकिस्तान जाता है और वहां पर वह कठिन कार्य करता है। गुल मोहम्मद जब अफगानिस्तान पलटता है तो तालेबान का शासन खत्म हो चुका होता है और उसे बताया जाता है कि जिस लड़की से वह विवाह करना चाहता था उसका विवाह हो गया है। गुल मोहम्मद दुःखी मन से घर वापस जाता है परंतु बाद में उसे पता चलता है कि जिस लड़की से वह विवाह करना चाहता था वह नहीं बल्कि उसकी बहन का विवाह हुआ है और जिस लड़की से वह विवाह करना चाहता था वह अब भी उसकी प्रतीक्षा में है और इस बात से वह प्रसन्न हो जाता है। इस फिल्म में अफगान जनता की परम्परा एवं संस्कृति पर ध्यान दिया गया है और दर्शक को युद्धग्रस्त स्थिति में जीवन बिताने वालों के हालात से परिचित कराया गया है।  

उसके बाद ईरान आकर शरणार्थी का जीवन बिताने वाले अफगानों पर फिल्म बनाई जाती है लेकिन फिल्म का अस्ल विषय बेघर होने वाले अफगान लोगों की समस्या थी।

धीरे- धीरे ईरानी समाज और ईरानी सिनेमा इस बात का फैसला करते हैं कि ईरान में शरण लेने वाले अफगानों पर अधिक गम्भीरता से ध्यान दिया जाये। “जुमा” और “बारान” फिल्म को इसी संबंध में बनाया गया है। जुमा फिल्म में एक जवान मज़दूर अफगानी एक ईरानी लड़की को चाहने लगता है और संयोग से दोनों फिल्मों में ईरानी लड़की और अफगानी लड़के का विवाह नहीं हो पाता और दोनों को एक दूसरे से अलग भविष्य का सामना करना पड़ता है।

 

 

मजीद मजीदी के निर्देशन में “बारान” फिल्म वर्ष २००० में बनी और उसे अच्छी फिल्म का नाम दिया जा सकता है कि जो ईरान में अफगान लोगों के  बारे में बनी है। यह फिल्म, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफगान राष्ट्र के बारे में लोगों के दृष्टिकोणों को परिवर्तित करने में काफी सीमा तक सफल रही है।

फिल्म की कहानी इस प्रकार है कि एक मीनार का निर्माण हो रहा है और उसमें कुछ अफगानी मज़दूर कार्य कर रहे हैं। एक मज़दूर के घायल हो जाने पर उसके स्थान पर उसका बेटा काम पर आता है। वह धीरे धीरे दूसरे मज़दूर का स्थान ले लेता है और जिस मज़दूर का स्थान ले लेता है वह उसे सताने की सोचता है परंतु एक दिन वह समझ जाता है कि अफगानी मज़दूर “बारान” नाम की एक लड़की है जो मजबूरी के कारण पुरुषों के मध्य अपने घायल पिता के स्थान पर कार्य करती है। यह विषय इस बात का कारण बनता है कि वह उससे प्यार करने लगता है और काम करने में उसकी सहायता करता है। जब ईरानी मज़दूर उन लोगों के जीवन की कठिन परिस्थिति को देखता है तो अपनी सारी जमापूंजी उस अफगानी परिवार को दे देता है परंतु कुछ समय के बाद बारान और उसका परिवार सदैव के लिए ईरान से स्वदेश जाने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

 

 

वर्ष २००० के बाद अफगानिस्तान के अंदर कई छोटी और डाक्युमेन्ट्री फिल्में बनी हैं जिनके महत्वपूर्ण भाग का निर्माण ईरानी अभिनेताओं व निर्देशकों ने किया है। यह विषय इस बात का कारण बना कि फिल्म में अफगान जनता का जो चित्र पेश किया गया है वह वास्तविकता के बहुत निकट है।

“ख़ाक व मरजान” नाम की एक अन्य फिल्म है जिसे अफगानिस्तान में बनाया गया है। इस फिल्म में अफगान जनता की पारम्परिक जीवन शैली को छोड़कर उसके जीवन की नई शैली को दर्शकों के लिए पेश किया गया है। इस फिल्म में एक अफगानी व्यक्ति की कहानी है जो यह सोचता है कि युद्ध में उसकी पत्नी मर गयी है। वह अपनी लड़की के विवाह का जश्न आयोजित करना चाहता है कि उस समय उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी अभी ज़िन्दा है और यह बात उसके जीवन में बहुत से परिवर्तन का कारण बनती है। इस फिल्म में एक अफगानी परिवार के जीवन को दिखाया जाता है। इसी प्रकार इस फिल्म में अफगानी जनता की संस्कृति के एक भाग को भी दिखाया जाता है। उदाहरण स्वरूप पिता के अपनी बेटी से प्रेमपूर्ण संबंध की ओर संकेत किया जा सकता है और यह तस्वीर उस तस्वीर से बिल्कुल भिन्न है जो अफगानी लोगों के बारे में दुनिया में पेश की गयी है।

हालिया वर्षों में अफगानिस्तान के बारे में ईरान में जो फिल्में बनी हैं उनमें जीवन और मानवीय संबंधों को दिखाया गया है। साथ ही ये फिल्में युद्ध और अतिग्रहण विरोधी हैं। इसी प्रकार इन फिल्मों में अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर सैनिक हमले की भर्त्सना की गयी है। ईरानी और अमेरिकी फिल्म निर्माताओं में यही अंतर है। क्योंकि जो फिल्में हालवुड में बनती हैं उनमें अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति और अमेरिकी हमले का औचित्य दर्शाया जाता है और यही स्क्रिप्ट का आधार होता है जबकि ईरान में बनने वाली फिल्मों में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले की भर्त्सना की जाती है और अपने देश की रक्षा को अफगान जनता का अधिकार बताया जाता है। अफगानिस्तान के बारे में जो फिल्में बनाई गयी हैं उनमें अफगानी शैली में बात चीत और अंदाज़ अधिक है और कुछ लोकेशन अफगानिस्तान के अंदर के दिखाये गये हैं।

 

 

अफगानिस्तान के बारे में “गुलचेहरा” नामक एक अन्य फिल्म है जो वहीद मूसाइयान के निर्देशन में बनायी गयी है। इस फिल्म में अफगान लोगों को एक अलग दृष्टिकोण से दिखाया गया है।

 

इस फिल्म में काबुल के एक सिनेमा मालिक अशरफ ख़ान की जिन्दगी को दिखाया गया है। नजीब की सरकार समाप्त होने और मुजाहेदीन का काबुल पर नियंत्रण हो जाने के बाद अशरफ ख़ान अपने सिनेमा का पुनरनिर्माण करना चाहता है परंतु काबुल पर मुजाहेदीन की सरकार मज़बूत नहीं हो पाती है कि दोबारा काबुल के खंडरों से गृहयुद्ध आरंभ हो जाता है और यह युद्ध अफग़ानिस्तान के संवेदनशील स्थानों तक पहुंच जाता है। इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि लोग अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ अपनी संस्कृति को बचाने के प्रति भी चिंतित हैं। इसी प्रकार इस फिल्म में दर्शक को यह दिखाया जाता है कि रुढ़िवादी लोगों द्वारा किस प्रकार अफगानिस्तान की संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है।

इस फिल्म को भारत और जार्जिया जैसे देशों में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्मी मेलों में कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। MM

 

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