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बुधवार, 29 अप्रैल 2015 16:17

ईरानी सिनेमा पहचान, संस्कृति और विचार के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन

ईरानी सिनेमा पहचान, संस्कृति और विचार के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन

आज के ज़माने में संस्कृति और विचारधारा के विस्तार के लिए सिनेमा एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस बीच ज़ायोनी निवेशकों द्वारा इस उद्योग में किया गया भारी निवेश उजागर हो गया है। जनसंपर्क संसाधनों के विस्तार के साथ ही ज़ायोनियों ने लोगों पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। उन्होंने विश्व भर में ज़ायोनी संस्कृति के प्रचार के लिए सिनेमा, टेलिवीज़न, रेडियो, इंटरनेट और समाचार एजेंसियों का प्रयोग किया। आज अमरीका में अधिकांश फ़िल्म निर्माता कंपनियां ज़ायोनियों की हैं। इनका मुख्य उद्देश्य, होलोकॉस्ट का अपने दृष्टिकोण के अनुसार प्रचार, फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध को बदनाम करना और इस्लमाफ़ोबिया को बढ़ावा देना है।

 

 

हालांकि पश्चिमी सिनेमा विशेष रूप से हॉलीवुड द्वारा ज़ायोनी विचारों के प्रचार के मुक़ाबले में स्वाधीन फ़िल्म निर्माता भी हैं। यह फ़िल्म निर्माता अपनी फ़िल्मों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आंदोलनों की वास्तविकता को विश्व वासियों के सामने लाते हैं।

पिछले कुछ दशकों में ईरानी सिनेमा ने आंतरिक पुर्निमाण के बाद वैश्विक मामलों की ओर रुख़ किया और मानवीय दृष्टि से मनुष्य की वर्तमान समस्याओं को पेश किया है।

जैसा कि आप जानते हैं कि ईरान की इस्लामी क्रांति का उद्देश्य फ़िलिस्तीनी जनता और फ़िलिस्तीनी संप्रभुता की रक्षा है। इसलिए क्रांति के आरम्भ से ही इस मुद्दे पर ख़ास ध्यान दिया गया और कभी भी उसका महत्व कम नहीं हुआ। ज़ायोनियों द्वारा फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़ा और फ़िलिस्तीनियों के कष्ट, विश्व के मानव प्रेमी और आज़ादी के रखवालों के दृष्टिगत महत्वपूर्ण मामलों में से हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस आज़ादी में सबसे अहम भूमिका ईरान की है।

 

 

ईरानी सिनेमा में फ़िलिस्तीनी जनता की महत्वकांक्षाओं पर कई महत्वपूर्ण फ़िल्में बन चुकी हैं। प्रत्येक फ़िल्म में इस समस्या को एक अलग आयाम से पेश किया गया है। सैफ़ुल्लाह दाद, जवाद अर्दकानी, मोहम्मद दुरमुनिश, परवेज़ शेख़ तादी और सईद सुल्तानी ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने फ़िलिस्तीन के विषय पर फ़िल्में बनाई हैं।

बाज़मांदे, फ़िल्म ईरान की एक बेहतरीन फ़िल्म है। इस फ़िल्म में फ़िलिस्तीन के विषय को इतिहास के झरोके से पेश किया गया है। सैफ़ुल्लाह दाद ने इस फ़िल्म को 1994 में बनाया था। इसे ईरान में फ़िलिस्तीनी विषय पर बनने वाली फ़िल्मों का आरम्भिक बिंदु क़रार दिया जा सकता है। फ़िल्म में फ़िलिस्तीनी समस्या को बहुत ही प्रभावी ढंग से पेश किया गया है।

फ़िल्म की कहानी एक जवान जोड़े की है, जो अपने शिशु के साथ बैतुल मुक़द्दस में जीवन व्यतीत करता है। ज़ायोनी वहां हमला करते हैं, परिणाम स्वरूप यह परिवार बिखर जाता है। उनके घर पर पोलैंड से पलायन करके अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन आने वाले एक यहूदी परिवार का क़ब्ज़ा हो जाता है। यहां तक कि फ़िलिस्तीनी परिवार के छोटे से बच्चे को भी उनके घर की भांति उस यहूदी परिवार के हवाले कर दिया जाता है। लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती है, बल्कि फ़रहान की दादी एक बच्चे की देखभाल करने वाली महिला के रूप में उस यहूदी के परिवार में प्रवेश करने में सफ़ल हो जाती है और वे ख़ामोशी से अपने पोते की सुरक्षा और उसे वापस हासिल करने के लिए प्रयास शुरू कर देती है। आख़िर में दादी ने अपने पोते को हासिल करने के लिए अपनी भावनाओं पर निंयत्रण करते हुए एक आंदोलनकारी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य शुरू करती है और ज़ायोनियों को चोट पहुंचाने के लिए एक बड़ी योजना को व्यवहारिक बनाती है।

 

 

बाज़मांदे फ़िल्म को एक फ़िलिस्तीनी कहानी को नज़र में रखकर बनाया गया है। ईरानी सिनेमा की व्यवसायिक प्रतिभाओं को प्रयोग करते हुए इसे एक यादगार फ़िल्म बनाया है। एक समाजशास्त्री की अनुभवी नज़रों ने इस फ़िल्म में वैश्विक एवं ऐतिहासिक समस्या को बहुत ही प्रभावी शैली में पेश किया है। सैफ़ुल्लाह दाद ने फ़िलिस्तीनी समाज का अच्छी तरह अध्ययन किया और इस समाज में विभिन्न धर्मों एवं समुदायों के संबंधों की समीक्षा करते हुए उन्हें फ़िल्म में पेश किया है।

इस फ़िल्म के निर्देशक सैफ़ुल्लाह दाद का 1955 में तेहरान में जन्म हुआ और 2009 में इसी शहर में उनका निधन हो गया। वे एक फ़िल्मनिर्माता, कहानीकार और एडिटर थे। वे कई वर्षों तक ईरान के सांस्कृतिक मंत्रालय में मुख्य अधिकारी के रूप में भी कार्यरत रहे। कुछ लोगों का मानना है कि उनके प्रबंधन का काल ईरानी सिनेमा के इतिहास में एक चमकता हुआ काल था।

सैफ़ुल्लाह दाद ने बाज़मांदे फ़िल्म के निर्माण और निर्देशन के अलावा कई दूसरी फ़िल्मों का निर्देशन किया और कहानी लिखी। ईरान पर इराक़ द्वारा थोपे गए युद्ध के विषय पर उनकी फ़िल्म कानी मांगा ने ईरानी सिनेमा के इतिहास में सबसे अधिक लम्बे समय तक पर्दे पर रहने का रिकॉर्ड अपने नाम किया।

 

 

जवाद अर्दकान के निर्देशन में बनने वाली फ़िल्म गन्नारी में फ़िलिस्तीनी मामले के सबसे महत्वपूर्ण आयाम यानी फ़िलिस्तीनी बच्चों के प्रतिरोध की कहानी पेश की गई है। इस फ़िल्म में एक छोटे फ़िलिस्तीनी बच्चे की कहानी है कि जो हकलाता है। इस बच्चे की इस समस्या के समाधान के लिए एक ईसाई पादरी बच्चे को एक कनारी चिड़िया भेंट में देता है और सिफ़ारिश करता है कि कनारी के लिए एक शांत वातावरण उत्पन्न करे। शांत वातावरण उत्पन्न करने में बच्चे को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस फ़िल्म में शत्रुओं के हमलों और शोरग़ुल के बीच शांत माहौल की खोज के लिए फ़िलिस्तीनी बच्चे के प्रयासों को दर्शाया गया है। वास्तव में कनारी चिड़िया फ़िलिस्तीनी बच्चे के शांति प्रेम का एक प्रतीक है।

दुश्मन के टैंक के सामने 10 से 12 साल के बच्चों का खड़ा हो जाना, बच्चों का ख़ून में लतपत हो जाना, घरों पर बमबारी जैसे कुछ ऐसे दृश्य हैं जो विवेक को झकझोर कर रख देते हैं। यह ऐसे दृश्य हैं जो केवल क़न्नारी फ़िल्म में पेश किए गए हैं।

ईरानी सिनेमा में फ़िलिस्तीन के बारे में बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालने से ज्ञात होता है कि राजनीतिक खींचतान और लड़ाई से कहीं अधिक इस मामले को मानवीय आयाम से पेश किया जाना चाहिए। वास्तव में इन फ़िल्मों में कोशिश की गई है कि फ़िलिस्तीन के अवैध अधिकरण प्यार मोहब्बत से जीने वालों के जीवन उजाड़ दिए हैं। यह फ़िल्में अपने दर्शकों को ज़ायोनी शासन द्वारा फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े के दुष्परिणामों से अवगत कराती हैं। यद्यपि इन फ़िल्मों में ज़ायोनी सैनिकों और फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधियों के बीच झड़पों के कुछ दृश्य भी पेश किए गए हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश में मानवीय और पारिवारिक संबंधों पर प्रकाश डाला गया है।

फ़िलिस्तीन के विषय पर बनने वाली फ़िल्मों में से परवेज़ शेख़ तादी के निर्देशन में बनने वाली शिकारची शंबे फ़िल्म सबसे हटकर है। इस फ़िल्म में इस विषय को एक बिल्कुल ही अलग आयाम से पेश किया गया है और एकदम नए अंदाज़ में अतिक्रमण और युद्ध को नज़र अंदाज़ करते हुए ज़ायोनी विचारधारा को पेश किया है। फ़िल्म में ज़ायोनी चरमपंथियों के विश्वासों, आस्थाओं और विचारधारा को पेश किया गया है।

 

 

फ़िल्म में बिनयामिन नामक एक बच्चा है जिसके अभिभावक उसके दादा हैं। उसके दादा एक ज़ायोनी रब्बी हैं। वे फ़िलिस्तीनियों के नरसंहार और नस्लकुशी को सही ठहराते हैं। फ़िलिस्तीनियों की हत्या उनकी दिनचर्या है और यही पाठ वे अपने पोते को भी होते हैं।

फ़िल्म में ज़ायोनी समाज में अमानवीय और भ्रष्ट रीति रिवाजों को उजागर किया गया है। दर्शक एक सादा से छोटे बच्चे को बर्बर हत्यारे में परिवर्तित होते हुए देखते हुए हैं।

शिकारची शंबे में ज़ायोनी समाज की जड़ों में मौजूद कुछ अनकही बातों को पेश किया गया है। इस फ़िल्म की विशेषताओं में से बेहतरीन सीन और उच्च श्रेणी का अभिनय है। पोते के हाथों दादा की हत्या की घटना पर फ़िल्म का अंत होता है।

इस फ़िल्म के निर्देशक, परवेज़ शेख़ तादी 1961 में ईरान के शहर आबादान में पैदा हुए। निर्देशन के अलावा कहानी भी उन्होंने ही लिखी है और ड्रेस की डिज़ाइनिंग की ज़िम्मेदारी भी संभाली है। उन्होंने ईरान पर थोपे गए युद्ध के विषय पर बनने वाली कई फ़िल्मों का भी निर्देशन किया है और इस विषय पर बनने वाली रोज़हाए ज़िदंगी उनकी बेहतरीन फ़िल्म है।

 

 

फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर बनने वाली एक और फ़िल्म चश्माने आबी ज़हरा है। यह वास्तव में एक धारावाहिक था जो आईआरआईबी की राष्ट्रीय एवं विदेशी सेवा से प्रसारित किया गया था। इस फ़िल्म में मानवीय प्रेम की दृष्टि से पीड़ित फ़िलिस्तीन की जनता के दुख और दर्द को बयान किया गया है। इस फ़िल्म के निर्देशक सईद सुल्तानी हैं। इस फ़िल्म का देश और विदेश में बहुत स्वागत हुआ लेकिन ज़ायानी गलियारों में उतना ही इसका विरोध भी हुआ। अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनल सहर से इस धारावाहिक के प्रसारण के कारण 2004 में फ़्रांस में इस चैनल पर प्रतिबंध लगा दिया गया।               

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