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रविवार, 12 अप्रैल 2015 16:07

सिनेमा में संगीत और गीतों का संबंध

सिनेमा में संगीत और गीतों का संबंध

पहले आप अली हातमी की फ़िल्म दिल शुदगान के संगीत का एक भाग सुनिए। यह फ़िल्म ईरानी संगीत और संगीतकारों के बारे में है। सन् 1991 में यह फ़िल्म बनी जिसे संगीत दिया ईरान के प्रसिद्ध संगीतकार हुसैन अलीज़ादे ने।

 

फ़िल्म संगीत एक ऐसा संगीत है कि जिस की रचना फ़िल्म को मद्देनज़र रखकर की गई है, जिसे संगीत कला में एक विशेष प्रकार का संगीत माना जाता है। यह संगीत पूर्ण रूप से फ़िल्म की स्टोरी से संबंधित है जो दर्शकों की भावनाओं को काफ़ी हद तक प्रभावित करता है। संगीत के कुछ भाग की रचना सिमफ़ोनी द्वारा होती है, जिसे इंस्ट्रूमेंटल म्यूज़िक या वाद्य संगीत कहा जाता है। हालांकि दुनिया भर में ऐसी फ़िल्में भी बनती हैं जिनमें गीतों के साथ संगीत होता है।

 

 

सिनेमा और फ़िल्म संगीत का इतिहास लगभग एक ही है। जिस दिन ल्यूमीयर बंधुओं ने 1895 में पहली फ़िल्म को प्रदर्शन के लिए पेश किया तो एक पियानो बजाने वाले को भी आमंत्रित किया ताकि फ़िल्म के प्रदर्शन के समय संगीत की धुनें बखेरे। मूक फ़िल्म का दौर समाप्त होने के साथ ही धीरे धीरे संगीत फ़िल्मों का अभिन्न अंग बन गया। फ़िल्मों में शुरू से ही संगीत को एक विशेष महत्व दिया जाता रहा है।   

 

 

सन् 1900 में नासिरुद्दीन शाह क़ाजार ने अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान सिनेमाटोग्राफ़ (cinematograph) देखा तो उसे बहुत पसंद किया। शाह क़ाजार ने एक सिनेमाटोग्राफ़ ख़रीद लिया और उससे कार्निवल त्योहार की फ़िल्म बनाई। शुरू कि फ़िल्में मूक और लगभग डॉक्यूमैंट्री थीं। लेकिन दुख़्तर लोर फ़िल्म के साथ ही ईरानी सिनेमा के नए दौर की शुरूआत हो गई। अब्दुल हुसैन सपंता ने फ़िरदौसी और शीरीन व फ़रहाद जैसी फ़िल्में बनाईं। शीरीन व फ़रहाद में डॉयलाग शेरों के रूप में पेश किए गए और वास्तव में यह संगीत पर आधारित एक फ़िल्म थी।

यह कहा जा सकता है कि ईरान में 1960 के दशक तक फ़िल्में केवल शेरो शायरी पर आधारित होती थीं जिनमें से अधिकांश का स्तर बहुत नीचा होता था। हालांकि इस बीच एक आधा ऐसी फ़िल्में भी बनीं कि जिनके संगीत की रचना अबुल हुसैन सबा जैसे प्रसिद्ध ईरानी संगीतकार ने की। लेकिन उनका संगीत दुनिया भर में आज प्रचलित फ़िल्मी संगीत से बहुत भिन्न था।

साठ के दशक के अंत में दारयूश मेहरजूई के निर्देशन में महत्वपूर्ण फ़िल्म गाव बनी। इसे संगीत दिया था होरमुज़ फ़रहत ने। इस फ़िल्म ने न केवल ईरानी सिनेमा पर बल्कि ईरान में फ़िल्म निर्माण की शैली पर भी प्रभाव डाला और इसे आम दर्शकों में लोकप्रिय बनाया। यह संगीत पूर्ण रूप से फ़िल्म की कहानी से मेल खाता था। फ़िल्म की लोकप्रियता में इस संगीत की भी अहम भूमिका थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ईरान में इस्लामी क्रांति तक बहुत ही कम ऐसी फ़िल्में बनीं जिनके संगीत ने अपनी अलग छाप छोड़ी हो, इन्हीं में से मसूद कीमियाई की क़ैसर फ़िल्म का नाम लिया जा सकता है।

 

 

अन्य कलाओं की भांति ईरान में क्रांति के बाद संगीत को भी अश्लीलता से मुक्ति मिल गई और एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। अश्लीलता से दूरी संगीत की प्रगति एवं विकास का कारण बनी और धीरे धीरे कुशल संगीतकारों ने अपना खोया हुआ मैदान पुनः हासिल कर लिया।

1980 के दशक में ईरानी सिनेमा ने तेज़ी से प्रगति की और संगीत ने भी उसके साथ साथ क़दम बढ़ाया और संगीतकारों ने सुन्दर एवं रचनात्मक संगीत की रचना की। ऐसा संगीत कि आज भी उसे सुनकर लोगों के ज़हन में उन फ़िल्मों की याद ताज़ा हो जाती है। इन फ़िल्मों में अज़ करख़े ता रायन, दिल शुदगान, बूए पीराहने यूसुफ़, रूज़े वाक़या और मरयमे मुक़द्दस व इमाम अली जैसे धारावाहिकों का नाम लिया जा सकता है।

ईरानी सिनेमा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक प्रसिद्ध संगीतकार का नाम मजीद इंतज़ामी है। 1947 में तेहरान में उनका जन्म हुआ। उन्होंने बचपन से ही संगीत की तालीम ली। युवावस्था में जर्मनी की राजधानी बर्लिन में कार्ल इश्ताईन जैसे गुरूओं से दिया की तालीम ली और इस दौरान बर्लिन आर्केस्ट्रा सिमफ़ोनिक एवं बर्लिन आर्केस्ट्रा फ़िलारमोनिक के साथ काम किया।

 

 

इंतज़ामी ने 1974 में तेहरान विश्वविद्यालय में संगीत की शिक्षा देना शुरू की और इस दौरान कई फ़िल्मों में संगीत किया। क्रांति के बाद उनके संगीत की अपनी अलग पहचान बनी जिसे बहुत लोकप्रियता प्राप्त हुई। अज़ करख़े ता रायन सन् 1992 में बनी जिसमें ईरान के ख़िलाफ़ सद्दाम द्वारा थोपे गए युद्ध के दौरान रासायनिक हमले के प्रिभावितों की कहानी है।

 

ईरान के फ़िल्म संगीत को प्रगति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक दूसरे संगीतकार हैं मुर्तज़ा हन्नाने। सन् 1989 में उनका निधन हो गया था। उन्होंने सन् 1953 में हज़ारे बू अली सीना समारोह से संगीत के मैदान में क़दम रखा। इस समारोह में बेहतरीन प्रदर्शन से उन्हें वैटिकन के उच्च संगीत केन्द्र में प्रवेश का मौक़ा मिला। उसके बाद वे रेडियो ईरान की संगीत की उच्च परिषद के सदस्य बन गए और उस समय उन्होंने फ़ाराबी आर्केस्ट्रा की स्थापना की।

हन्नाने ने 26 वर्ष की आयु में ईरान, काले सोने का देश नामक डॉक्यूमैंट्री के संगीत से फ़िल्मी संगीत के मौदान में क़दम रखा। उन्होंने लगभग 25 फ़िल्मों में संगीत दिया और उसके साथ ही संगीत और धुनों के संबंध में कई किताबें एवं लेख लिखे।

 

 

ईरान में फ़िल्म संगीतकारों की एक लम्बी सूची है। हुसैन अली ज़ादे इस सूची का एक महत्वपूर्ण नाम है। अली ज़ादे का जन्म 1951 में हुआ। उन्हें वर्तमान समय का सबसे रचनात्मक संगीतकार माना जाता है। उन्हें दुनिया के प्रसिद्ध पुरस्कार ग्रैमी अवार्ड समेत तीन पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अली ज़ादे को ईरान के प्रमुख संगीतकारों में गिना जाता है। उन्होंने दिल शुदगान, गब्बे, ज़िश्तो ज़ीबा, आवाज़े गुंजिश्कहा और मलके जैसी रचनाओं में संगीत दिया। उल्लेखनीय है कि ईरान के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह फ़ज्र में एक पुरस्कार संगीत से विशेष होता है। हुसैन अली ज़ादे और मजीद इंतज़ामी को अब तक चार बार पुरस्कृत किया जा चुका है। SM

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Comments   

 
0 #1 चुन्नीलाल कैवर्त 2015-04-15 15:32
कहानी के अनुसार कुछ ईरानी फिल्मों में भी गीत संगीत होते हैं -जानकर अच्छा लगा l रोचक और सूचनाप्रद जानकारी के लिए धन्यवाद l
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